Social Life of Harappan Civilization-हड़प्पा सभ्यता (Indus Valley Civilization) विश्व की सबसे प्राचीन नगरीय सभ्यताओं में से एक है, जो अनुमानित तौर पर 3300 ई.पू. से 1300 ई.पू. तक फली-फूली। इसका विस्तार पंजाब, सिंध, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा तक था। 1921 में दयाराम साहनी द्वारा हड़प्पा और 1922 में राखाल दास बनर्जी द्वारा मोहनजोदड़ो की खोज ने इस सभ्यता को विश्व पटल पर लाया। हड़प्पा का समाज समानतावादी, शांतिप्रिय और उन्नत शिल्पकला वाला था। इस लेख में हम हड़प्पा सभ्यता के सामाजिक जीवन के बारे में जानेंगे।

Social Life of Harappan- सामजिक जीवन का आधार,परिवार
हड़प्पा सभ्यता में परिवार सामाजिक जीवन की मूल इकाई था। “हड़प्पावासी सुखी और सुविधापूर्ण जीवन व्यतीत करते थे”। परिवार मातृसत्तात्मक प्रवृत्ति वाला था, जिसका प्रमाण मातृदेवी की मूर्तियाँ और महिलाओं की स्वतंत्रता से मिलता है। संयुक्त परिवार की संभावना थी, क्योंकि बड़े घरों में कई कमरे और साझा आंगन मिले हैं। बच्चे खिलौनों (जैसे बैलगाड़ी, पशु मूर्तियाँ) से खेलते थे, जो बाल्य-प्रेम और परिवारिक सौहार्द को दर्शाता है। कोई पर्दा प्रथा या लिंग-भेद के साक्ष्य नहीं मिले, जिससे स्पष्ट है कि महिलाएँ घरेलू और सामाजिक दोनों कार्यों में सक्रिय और पूर्णतया सवतंत्र जीवन जीती थीं।
सामाजिक व्यवस्था (Social Structure of Indus Valley)
हड़प्पा सभ्यता का सामाजिक और आर्थिक ढांचा अत्यंत सुव्यवस्थित और एकीकृत था, जो नगरीय नियोजन, व्यापार, और सामुदायिक जीवन में स्पष्ट दिखता है। समाज में विविध नस्लों का मिश्रण था – ऑस्ट्रलॉइड, भूमध्यसागरीय, मंगोलॉइड और अल्पाइन – जो सांस्कृतिक समन्वय को दर्शाता है। मोहनजो-दारो की जनसंख्या लगभग 35,000 अनुमानित है, जो इसे उस काल का एक विशाल नगरीय केंद्र बनाती है।
सामाजिक संरचना में अमीर-गरीब का स्पष्ट भेदभाव नहीं था; घरों का आकार और सुविधाएँ समान थीं। व्यवसाय आधारित वर्गीकरण था – किसान, शिल्पकार, व्यापारी, पुरोहित। महिलाओं को व्यापक स्वतंत्रता प्राप्त थी; वे शिल्प, व्यापार और धार्मिक कार्यों में सक्रिय थीं। परिवार संयुक्त और मातृसत्तात्मक प्रवृत्ति वाला था। कोई राजा-महल या दास प्रथा के साक्ष्य नहीं – संभवतः लोकतांत्रिक या गण-व्यवस्था।

शिक्षा और साक्षरता (Education & Literacy in Harappa)
हड़प्पा सभ्यता में शिक्षा व्यवस्था थी, यद्यपि कोई स्कूल या ऐसा औपचारिक भवन नहीं मिला जिससे सिद्ध हो कि शिक्षा सामजिक जीवन की प्रमुख इकाई थी। चित्रलिपि (400+ चिन्ह) मुहरों पर मिली है, जो साक्षरता का प्रमाण है। व्यापारिक लिपि का उपयोग होता था। पुरोहित वर्ग शिक्षा देता रहा होगा। बच्चों के खिलौने और ज्यामितीय आकृतियाँ गणितीय शिक्षा की ओर इशारा करती हैं। मुहरों पर लेखन व्यापारिक शिक्षा को दर्शाता है। कोई औपचारिक गुरुकुल नहीं, पर व्यावहारिक शिक्षा (शिल्प, कृषि, व्यापार) प्रचलित थी। लिपि अभी तक पढ़ी नहीं गई, पर इसका होना उन्नत बौद्धिक स्तर को सिद्ध करता है।
खान-पान (Diet & Food Habits in Harappa)
हड़प्पा वासियों का खान-पान संतुलित और विविध था। “भोजन में अनाज, दूध, मांसाहार का प्रचुर उपयोग”। मुख्य अनाज थे – गेहूं, जौ, चावल। दूध-दही पशुपालन से मिलता था। मांसाहार में भेड़, बकरी, गाय, मछली, मुर्गी शामिल थे। सब्जियाँ जैसे मटर, तिल भी खाई जाती थीं। दो फसलें – नवंबर में बुआई, अप्रैल में कटाई। कोई भुखमरी के साक्ष्य नहीं – अर्थात् खाद्य सुरक्षा थी। भोजन साफ-सुथरे बर्तनों में पकाया जाता था। हड़प्पा से मिले बड़े-बड़े अन्नागार या कोठार इस बात के साक्ष्य हैं कि हड़प्पावासी आनाज संग्रह से परिचित थी।
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वस्त्र (Clothing in Harappa)
हड़प्पा सभ्यता में वस्त्रों के प्रत्यक्ष साक्ष्य बहुत कम हैं, क्योंकि कपड़े प्राकृतिक रूप से नष्ट हो जाते हैं। मूर्तियों में लोग बिना वस्त्र दिखाए गए हैं, पर धातु की वस्तुओं पर चिपके कपड़े के सूक्ष्म टुकड़े बताते हैं कि हड़प्पावासी सूती कपड़ा बुनते थे। कपास की खेती यहाँ सबसे पहले हुई थी। सन (flax) की खेती भी होती थी, शायद रेशे या तिलहन के लिए। रेशम का उपयोग संभवतः देशी कीटों (जो बाद में दक्षिण भारत में पाए गए) से होता था, पर चीनी रेशम से कम गुणवत्ता वाला। ऊनी भेड़ें पालने का स्पष्ट प्रमाण नहीं, पर मेसोपोटामिया व्यापार से ऊनी कपड़े मिलते रहे होंगे। चमड़ा भी वस्त्रों में इस्तेमाल होता था।
रंगाई की सुविधाएँ (जैसे मोहनजो-दारो में पाए गए कुंड) दर्शाती हैं कि सूती कपड़ों को रंगा जाता था। एकमात्र बचा लाल रंग का टुकड़ा मजीठ (madder) से रंगा था। नील और हल्दी भी रंगों में प्रयुक्त हो सकते थे।
मूर्तियों से वस्त्र शैली:
- पुरुष: कमर पर धोती जैसा कपड़ा, जो पैरों के बीच से गुजरकर पीछे टका जाता था। कुछ में बाएँ कंधे पर लंबा चोगा (दायाँ कंधा खुला)। कुछ पगड़ी पहने।
- महिलाएँ: घुटने तक की स्कर्ट।
आभूषण: दोनों लिंग पहनते थे – पुरुष: बालों की पट्टी, मोतियों की माला, चूड़ियाँ; महिलाएँ: चूड़ियाँ, झुमके, अंगूठियाँ, पायल, बेल्ट, पेंडेंट, चोकर, कई हार, जटिल केशविन्यास और हेडड्रेस।
रिचर्ड मीडो के अनुसार, वस्त्र शैली कपड़े की लंबाई और लपेटने के तरीके पर आधारित थी। लिनन, सूती, ऊन या चमड़ा प्रयोग होता था। खाल ठंड में और तरकश, बेल्ट बनाने में। सरकंडे की चटाई से जूते बनते होंगे। रेशम के प्रारंभिक रूप का उपयोग मोती पिरोने और तांबे के हार लपेटने में होता था (स्रोत: गुड, केनोयर, मीडो, 2009)।
गहने (Jewellery in Harappa)
गहने हड़प्पा समाज की सौंदर्य प्रियता के प्रतीक थे। पेज 40 के अनुसार: “सोने-चांदी, हाथीदांत के आभूषणों का प्रचुर प्रमाण”। गहनों में शामिल थे – कंगन, हार, कर्णफूल, नाक की कील, हंसुली, माथे की बिंदी। सीप, मनके, ताम्र से भी गहने बनते थे। महिलाएँ और पुरुष दोनों गहने पहनते थे। मोहनजो-दारो से मिले सोने के गहने उन्नत शिल्पकला दिखाते हैं।
सजावट (Decoration in Harappa)
सजावट में घरों की स्वच्छता, मूर्तियाँ, दीवार चित्र शामिल थे। घरों में स्नानघर, कुएँ, जल-निकास सजावट और स्वच्छता दोनों के लिए थे। नर्तकी की कांस्य मूर्ति (मोहनजो-दारो) सजावट कला का उत्कृष्ट नमूना है। मुहरों पर पशु-मानव चित्र सजावटी थे। मिट्टी के बर्तन पर ज्यामितीय डिज़ाइन सजावट का हिस्सा थे। पीपल वृक्ष पूजा में फूलों से सजावट संभव थी।
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बर्तन और औजार (Utensils & Tools in Harappa)
बर्तन मिट्टी, ताँबा, कांस्य के थे। मिट्टी के बर्तन चमकदार, लाल-काले रंग के। औजार: ताँबा-कांस्य के – कुल्हाड़ी, छेनी, आरी, सूई, मछली पकड़ने का काँटा। तलवार, भाला, बाण भी मिले (पेज 40)। माप-तौल की ईंटें मानकीकृत थीं। चक्की, ओखली अनाज पीसने के लिए। मुहरें व्यापारिक औजार थीं।

आमोद-प्रमोद (Entertainment in Harappa)
पेज 41 के अनुसार: “नृत्य, संगीत, जुआ, शिकार – सामाजिक एकता के साधन”। नृत्य: कांस्य नर्तकी मूर्ति इसका प्रमाण। जुआ: पासे, बिसात मिले। शिकार: भाला, बाण से। संगीत: वाद्ययंत्र संभव (हड्डी की बांसुरी मिली)। बच्चों के खिलौने: बैलगाड़ी, पशु। समुदायिक उत्सव होते थे।
हड़प्पा सभ्यता में मिली प्रमुख वस्तुएं
| वस्तु / चिन्ह | कहाँ से मिला? | प्रमाण / स्रोत |
|---|---|---|
| लिपस्टिक (Lipstick) | चन्हुदड़ो (Chanhudaro) | लाल रंग की छड़ी – सौंदर्य प्रसाधन |
| नर्तकी की कांस्य मूर्ति | मोहनजोदड़ो | कांस्य की नर्तकी – नृत्य कला |
| पशुपति मुहर | मोहनजोदड़ो | शिव जैसी आकृति – धर्म |
| मातृदेवी मूर्तियाँ | मोहनजोदड़ो , हड़प्पा | मिट्टी की मूर्तियाँ – मातृ पूजा |
| सोने के गहने | मोहनजोदड़ो | कंगन, हार – शिल्पकला |
| तलवार | मोहनजोदड़ो , हड़प्पा | कांस्य तलवार – पेज 40 (K.C. श्रीवास्तव) |
| पासे / जुआ | मोहनजोदड़ो , लोथल | मनके के पासे – मनोरंजन |
| बैलगाड़ी खिलौना | मोहनजोदड़ो , चन्हुदड़ो | बच्चों के खिलौने |
| मुहरें (Seals) | मोहनजोदड़ो , हड़प्पा, लोथल | व्यापारिक मुहरें – लिपि के चिन्ह |
| कपास के अवशेष | मोहनजोदड़ो | सूती कपड़े – विश्व का पहला प्रमाण |
निष्कर्ष
हड़प्पा सभ्यता का सामाजिक जीवन समानता, सौंदर्य, और सुविधा पर आधारित था। तलवार का साक्ष्य आत्मरक्षा दिखाता है, पर शांतिप्रियता प्रमुख थी। हमें प्राचीन भारत की उन्नत जीवनशैली का दर्शन कराती है।
Disclaimer– फोटो AI से सिर्फ सांकेतिक दृष्टि से बनाये गए हैं।
स्रोत- विकिपीडिया







