मुहम्मद बिन तुगलक (Muhammad bin Tughluq ) जिन्हें अक्सर गलत तरीके से अधूरे नाम के साथ मुहम्मद तुगलक लिखा जाता है, दिल्ली सल्तनत के सबसे शिक्षित, रहस्यमयी और विवादास्पद शासकों में से एक थे। वे तुगलक वंश के दूसरे सुल्तान थे, जिन्होंने 1325 से 1351 ई. तक शासन किया। उन्हें उउनके महत्वाकांक्षी सुधारों, नवाचारी नीतियों और दुर्भाग्यपूर्ण असफलताओं के लिए मध्यकालीन इतिहास में जाता है। यह लेख उनके जीवन, योजनाओं, चरित्र, परिवार और विरासत का विस्तृत विश्लेषण करता है।

Muhammad bin Tughluq Intro: मुहम्मद तुगलक का परिचय
मुहम्मद बिन तुगलक ने 1325 ई. में अपने पिता गयासुद्दीन तुगलक (तुगलक वंश के संस्थापक) की रहस्यमयी परिस्थितियों में मृत्यु के बाद गद्दी संभाली। वह राजकुमार जौना खान के रूप में जन्म और उच्च शिक्षित, बहुभाषी, दर्शन, गणित तथा युद्धकला में एकदम निपुण था। वह अपने समय का सबसे शक्षित सुल्तान था। उसके शासन में दिल्ली सल्तनत ने अपने चरमोत्कर्ष को छुआ, जो भारतीय उपमहाद्वीप के अधिकांश हिस्से तक विस्तारित था, लेकिन आंतरिक विद्रोह और दुर्भग्यवश असफल नीतियों ने इसे खंडित कर दिया।
इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी और इब्न बतूता उनके शासन के समय के सबसे प्रामाणिक स्रोत हैं। तुग़लक़ के दरबारी इतिहासकार बरनी ने उसकी विद्वता की प्रशंसा की लेकिन कठोर निर्णयों की आलोचना भी की। मोरक्कन यात्री इब्न बतूता ने सुल्तान के दरबारी जीवन का प्रत्यक्ष विवरण प्रस्तुत किया है। मुहम्मद तुगलक का युग भारतीय इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह खलजी और बाद के मुगल प्रभावों के बीच सेतु का काम करता है, जो विविध साम्राज्य में केंद्रीकरण के प्रयासों को दर्शाता है।
उसकी नीतियां, यद्यपि नवाचारी थीं, अक्सर व्यावहारिक वास्तविकताओं को नजरअंदाज करती थीं, जिससे अकाल, विद्रोह और आर्थिक अराजकता ने जन्म लिया। फिर भी, आधुनिक विद्वान उनकी एकीकृत भारत की दृष्टि की सराहना करते हैं। “मुहम्मद तुगलक सुधार” खोजने पर पता चलता है कि उसकी विचारधारा ने बाद की प्रशासनिक प्रणालियों को प्रभावित किया।
| मुगल सम्राट अकबर: जीवनी, प्रारम्भिक संघर्ष, | मुहम्मद बिन कासिम: भारत पर आक्रमण करने वाला प्रथम |
| औरंगज़ेब का इतिहास: प्रारम्भिक जीवन, | मुहम्मद गौरी का इतिहास: प्रारम्भिक जीवन, तराइन के युद्ध, |
| विवरण | तथ्य |
|---|---|
| पूर्ण नाम | मुहम्मद बिन तुगलक (मूल: जौना खान) |
| जन्म | लगभग 1290 ई. |
| पिता | गयासुद्दीन तुगलक |
| माता | मखदूमा-ए-जहाँ |
| पत्नी | नाम ज्ञात नहीं |
| संतान | ज्ञात नहीं |
| शासनकाल | 1325–1351 ई. (26 वर्ष) |
| उपनाम | पागल सुल्तान, विवेकी मूर्ख |
| प्रमुख नीतियां | दौलताबाद को राजधानी स्थानांतरण, सांकेतिक मुद्रा का प्रचलन |
| साम्राज्य | दक्षिण भारत तक विस्तार |
| मृत्यु | मार्च 1351, सिंध (सोंडा) |
मुहम्मद बिन तुग़लक़ की योजनाएं
मुहम्मद तुगलक की योजनाएं महत्वाकांक्षी थीं लेकिन दुर्भाग्यवश ज्यादातर असफल रहीं। उसने साम्राज्य को मजबूत करने के लिए कई सुधार किए, जैसे राजधानी स्थानांतरण, सांकेतिक मुद्रा, और कृषि सुधार। इन योजनाओं ने अर्थव्यवस्था और प्रशासन को प्रभावित किया, लेकिन खराब समय पर क्रियान्वयन के कारण विद्रोह हुए।
| नीति का नाम | शुरूआत का वर्ष |
|---|---|
| राजधानी दौलताबाद स्थानांतरण | 1327 ई. |
| सांकेतिक मुद्रा का प्रचलन | 1329-1330 ई. |
| दोआब में कर वृद्धि | 1330 के दशक |
| खुरासान अभियान | 1330 के दशक |
| कृषि सुधार | पूरे शासनकाल |
1. राजधानी दिल्ली से दौलताबाद राजधानी परिवर्तन (1327 ई.):
मुहम्मद बिन तुगलक ने 1327 ई. में दिल्ली सल्तनत की राजधानी दिल्ली से दौलताबाद (वर्तमान महाराष्ट्र) स्थानांतरित करने का महत्वाकांक्षी निर्णय लिया, जिसका मुख्य उद्देश्य मध्य भारत में केंद्रीय शासन स्थापित करना, मंगोल आक्रमणों से सुरक्षा और दक्षिणी विजित क्षेत्रों पर बेहतर नियंत्रण था। उसने दरबार, अधिकारियों, विद्वानों और आम जनता को जबरन 1,100 किमी का कठिन सफर करवाया, लेकिन अपर्याप्त तैयारी, जलवायु परिवर्तन और संसाधनों की कमी के कारण रास्ते में हजारों लोग भूख, बीमारी और थकान से मर गए, व्यापार ठप हो गया और कई क्षेत्रों में विद्रोह भड़क उठे।
अंततः 1335 ई. में यह योजना पूरी तरह असफल सिद्ध हुई और तुगलक को दिल्ली लौटना पड़ा; इतिहास इसे उनकी बौद्धिक प्रतिभा के बावजूद अव्यवहारिक निर्णय का क्लासिक उदाहरण मानता है।
2. संकेतिक मुद्रा का प्रचलन (1329-1330 ई.):
मुहम्मद बिन तुगलक ने 1329-1330 ई. में संकेतिक मुद्रा (Token Currency) प्रचलित करने का साहसी प्रयोग किया, जिसमें सोने-चाँदी की जगह पीतल और ताँबे के सिक्कों को कानूनी मुद्रा घोषित किया गया, ताकि खजाना बचाया जाए और विदेशी व्यापार बढ़े। सिक्कों पर शासकीय मुहर लगी थी, पर जनता को जाली सिक्के बनाने की खुली छूट मिल गई क्योंकि कोई सुरक्षा व्यवस्था नहीं थी; घर-घर में नकली सिक्के ढाले जाने लगे, बाजार में अविश्वास फैला और अर्थव्यवस्था चरमरा गई।
मात्र दो वर्षों में योजना विफल हो गई, तुगलक को पुराने सिक्के वापस लेने का आदेश देना पड़ा, जिससे खजाने पर भारी बोझ पड़ा और इसे दिल्ली सल्तनत के सबसे महंगे प्रशासनिक असफलताओं में गिना जाता है।
3. दोआब क्षेत्र में कर वृद्धि: 1330 ईस्वी
मुहम्मद बिन तुगलक ने 1330 ई. में दोआब क्षेत्र (गंगा-यमुना के बीच का उपजाऊ भूक्षेत्र) में भू-राजस्व कर 10 गुना तक बढ़ाने का आदेश जारी किया, ताकि खजाने की कमी पूरी हो और सैन्य अभियानों के लिए धन जुटाया जा सके। किसानों पर अचानक भारी बोझ पड़ा, सूखे और अकाल के समय भी कर वसूली कठोर रही, जिससे जनता में असंतोष भड़क उठा।
विद्रोह फैलने लगे, किसान खेत छोड़कर भागे और कई क्षेत्रों में सशस्त्र बगावत हुई; अंततः तुगलक को 1332 ई. के आसपास कर वृद्धि वापस लेनी पड़ी, लेकिन तब तक दोआब की अर्थव्यवस्था और प्रशासनिक विश्वसनीयता को गहरा नुकसान हो चुका था।
4. खुरासान और इराक अभियान 1335 ई.
मुहम्मद बिन तुगलक ने 1335 ई. के आसपास खुरासान और इराक (मध्य एशिया) पर विशाल सैन्य अभियान की योजना बनाई, जिसका उद्देश्य मंगोल साम्राज्य के अवशेषों को जीतकर दिल्ली सल्तनत का विस्तार करना और इस्लामी साम्राज्य की प्रतिष्ठा बढ़ाना था। इसके लिए लाखों सैनिकों की भर्ती की गई, भारी धनराशि खर्च हुई और दिल्ली से सिंध तक सेना एकत्रित की गई, लेकिन अपर्याप्त रसद, लंबी दूरी और कठिन भौगोलिक दशाओं के कारण अभियान शुरू होने से पहले ही विफल हो गया।
सैनिक भूखे-प्यासे भटकते रहे, धन बर्बाद हुआ और यह योजना 1336 ई. तक रद्द कर दी गई; इतिहासकार इसे तुगलक की अतिमहत्वाकांक्षी लेकिन अव्यवहारिक विदेश नीति का सबसे बड़ा उदाहरण मानते हैं।
4. कृषि सुधार: 1333 ई.
मुहम्मद बिन तुगलक ने 1333 ई. के आसपास कृषि सुधार की एक महत्वाकांक्षी योजना शुरू की, जिसमें दीवान-ए-कोही (कृषि विभाग) स्थापित किया गया ताकि बंजर भूमि को उपजाऊ बनाया जाए, किसानों को सरकारी ऋण दिए जाएँ और नई फसलें उगाई जाएँ। इसके लिए 60 किलोमीटर क्षेत्र में सिंचाई, बीज वितरण और खेती की निगरानी की व्यवस्था की गई, लेकिन अधपात्र अधिकारियों की नियुक्ति, भ्रष्टाचार और अपर्याप्त जल प्रबंधन के कारण मात्र तीन वर्षों में योजना असफल हो गई।
खर्च किया गया करोड़ों का धन व्यर्थ गया, भूमि फिर बंजर हो गई और किसान कर्ज में डूब गए; इसे तुगलक की सैद्धांतिक रूप से उत्तम परंतु व्यावहारिक रूप से विफल कृषि नीति का प्रतीक माना जाता है।
मुहम्मद तुगलक को किस इतिहासकार ने पागल कहा?
ज़ियाउद्दीन बरनी (समकालीन इतिहासकार) ने मुहम्मद तुगलक को “पागल” (mad) की संज्ञा दी थी। अपनी किताब तारीख-ए-फिरोजशाही में बरनी ने राजधानी स्थानांतरण और संकेतिक मुद्रा जैसे असफल प्रयोगों को “पागलपन की हद” बताया, हालाँकि आधुनिक इतिहासकार इसे अति-महत्वाकांक्षी लेकिन अव्यवहारिक मानते हैं, न कि वास्तविक पागलपन। हालांकि, बरनी ने स्पष्ट रूप से “पागल” शब्द नहीं इस्तेमाल किया; उन्होंने उनकी योजनाओं को “अजीब” और “असामान्य” कहा।
आधुनिक इतिहासकार जैसे सर वोल्सली हैग ने अपनी किताब “Cambridge History of India” में उन्हें “mad” या “half-mad” कहा, उनकी नीतियों की विफलता के कारण। कुछ ब्रिटिश इतिहासकारों ने औपनिवेशिक पूर्वाग्रह से उन्हें “The Mad Sultan” का उपनाम दिया। लेकिन भारतीय इतिहासकार जैसे इरफान हबीब उन्हें एक दूरदर्शी लेकिन दुर्भाग्यशाली शासक मानते हैं।
“मुहम्मद तुगलक पागल” खोजने पर पता चलता है कि यह लेबल मुख्य रूप से पश्चिमी इतिहासलेखन से आया, जबकि प्राथमिक स्रोत जैसे इब्न बतूता ने उनकी बुद्धिमत्ता की प्रशंसा की।
मुहम्मद तुग़लक़ की पत्नी और संतान
मुहम्मद बिन तुगलक (जौना खान) के माता-पिता गयासुद्दीन तुगलक (तुगलक वंश के संस्थापक) और मखदूमा-ए-जहाँ (माता, जो अपनी दानशीलता और परोपकारिता के लिए प्रसिद्ध थीं, जिन्होंने कई अस्पताल स्थापित किए) थे।
इतिहासकारों के अनुसार, मुहम्मद तुगलक की पत्नी के बारे में कोई स्पष्ट या प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है; न तो कोई नाम दर्ज है और न ही कोई उल्लेखनीय विवरण। संभवतः यह मध्यकालीन इतिहास में राजघराने की महिलाओं के बारे में सामान्य गोपनीयता के कारण हो।
संतान के विषय में भी कोई प्रमाणित स्रोत नहीं मिलता—न पुत्र, न पुत्री का जिक्र है। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि उनकी कोई संतान न होने या उनके शासनकाल के दौरान उनके व्यक्तिगत जीवन पर ध्यान न देने के कारण यह जानकारी अस्पष्ट रही। सम्भवतः इसी कारण उनकी मृत्यु (1351 ई.) के बाद, तुग़लक वंश का सिंहासन उनके चचेरे भाई फ़िरोज़ शाह तुगलक को मिला।
मुहम्मद बिन तुगलक के दरबार की जानकारी
मुहम्मद बिन तुगलक (1325-1351 ई.) का दरबार दिल्ली सल्तनत के सबसे बौद्धिक और विविधतापूर्ण दरबारों में से एक था। वे स्वयं एक विद्वान शासक थे, जो फारसी, हिंदी, अरबी, संस्कृत और तुर्की सही 8 भाषाओं में निपुण थे। दर्शन, गणित, चिकित्सा, ज्योतिष, तर्कशास्त्र और कविता में उनकी गहरी रुचि थी। उनका दरबार विद्वानों, कवियों, सूफी संतों और विदेशी यात्रियों का केंद्र था, जहाँ वे धार्मिक सहिष्णुता दिखाते थे।
हिंदू, जैन और इस्लामी विद्वानों को संरक्षण दिया जाता था। उनका वजीर (मुख्य मंत्री) ख्वाजा-ए-जहां अहमद अयाज था, जो प्रशासनिक निर्णयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था। दरबार में सख्त धार्मिक अनुशासन था – सुल्तान पाँचों नमाज़ पढ़ते थे और रमज़ान में रोज़ा रखते थे। वे सूफी संत निज़ामुद्दीन औलिया के अनुयायी थे और जैन भिक्षुओं के प्रति सम्मानजनक थे।
हालांकि, उनकी पैरानॉइया (संदेहपूर्ण स्वभाव) के कारण दरबारी उन्हें “सबसे बुद्धिमान मूर्ख” (Wisest Fool) कहते थे। दरबार में बहसें तीखी होती थीं, लेकिन विद्वान सुल्तान की विद्वता से डरते थे। इब्न बतूता जैसे यात्री ने दरबार के वैभवपूर्ण वर्णन लिखे, जहाँ न्याय और विद्या का मिश्रण था।
विद्वानों का केंद्र: दरबार में फारसी, अरबी, संस्कृत और तुर्की विद्वान, कवि, दार्शनिक और वैज्ञानिक एकत्र थे। इब्न बतूता (मोरक्को से) को दिल्ली का काजी बनाया गया, ज़ियाउद्दीन बरनी इतिहास लेखक थे, और नख्खास जैसे कवि प्रशंसा गान करते थे।
बहुभाषी वातावरण: सुल्तान स्वयं 8 भाषाएँ (फारसी, अरबी, तुर्की, संस्कृत आदि) बोलते थे; दरबार में वैदिक, इस्लामी और जैन विचारों की चर्चा होती थी।
संगीत-कला: अमीर खुसरो की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए नौबत, ध्रुपद और कव्वाली का आयोजन होता था।
भोज और विलास: हज़ारों व्यंजन, सोने-चाँदी के बर्तन, विदेशी फल और शराब परोसी जाती थी।
भय का माहौल: असफल योजनाओं (जैसे दौलताबाद) के बाद दरबारियों की हत्याएँ, जहर देना और अचानक सज़ाएँ आम थीं; कई विद्वान भाग गए या छिप गए।
प्रशासनिक सुधार: दीवान-ए-विज़ारत, दीवान-ए-कोही जैसे नए विभाग दरबार से ही चलते थे।
उनके दरबार के प्रमुख विद्वान
मुहम्मद बिन तुगलक के दरबार में कई प्रमुख विद्वान और बुद्धिजीवी थे, जिन्हें उन्होंने आकर्षित किया। वे विद्वानों को उच्च वेतन और सम्मान देते थे। प्रमुख नाम निम्न हैं:
| दरबारी विद्वान | विवरण |
|---|---|
| ज़ियाउद्दीन बरनी | समकालीन इतिहासकार और दरबारी विद्वान। “तारीख-ए-फिरोजशाही” लिखा; सुल्तान की विद्वता की प्रशंसा की, नीतियों की आलोचना भी। दरबार के मुख्य सलाहकार। |
| इब्न बतूता | मोरक्कन यात्री और दिल्ली का क़ाज़ी। 1333 ई. में दरबार पहुँचे। “रिहला” में दरबार का दैनिक जीवन, न्याय व्यवस्था और सुल्तान की बहुभाषी प्रतिभा का वर्णन। मासिक 5000 दीनार वेतन। |
| जिनप्रभा सूरी | जैन भिक्षु और विद्वान। 1328 ई. में सुल्तान ने सम्मानित किया। जैन मंदिरों के निर्माण में सहायता। जैन दर्शन के विशेषज्ञ; धार्मिक चर्चाओं में भाग लेते थे। |
ये विद्वान दरबार को एक बहुसांस्कृतिक केंद्र बनाते थे, जहाँ इस्लामी, हिंदू और जैन विचारों का आदान-प्रदान होता था। सुल्तान स्वयं कविताएँ लिखते थे और ग्रीक दर्शन (अरस्तू) का अध्ययन करते थे।
मुहम्मद तुग़लक़ के निर्माण कार्य (निर्माण कार्य)
मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में निर्माण कार्य महत्वाकांक्षी थे, जो प्रशासनिक और आर्थिक सुधारों से जुड़े थे। तुगलक वास्तुकला की विशेषता – झुकी हुई दीवारें, मजबूत किले और सरल नक्कासी – उनके कार्यों में दिखती है। प्रमुख निर्माण निम्न हैं:
- दौलताबाद राजधानी स्थानांतरण (1327 ई.): दिल्ली से दौलताबाद (देवगिरि) तक 1000 मील लंबी सड़क का निर्माण। हर दो मील पर खानकाह (आरामगाह) बनाई गईं, जहाँ सूफी संत तैनात थे। पेड़ लगाए गए, डाक प्रणाली स्थापित की गई। दौलताबाद को शहरों में विभाजित किया – सैनिक, कवि, न्यायाधीश और कुलीनों के लिए अलग-अलग मोहल्ले। यह योजना असफल रही, लेकिन निर्माण का उत्कृष्ट उदाहरण था। 1335 ई. में दिल्ली लौटे।
- जाहानपनाह शहर: दिल्ली का चौथा शहर, जो तुगलकाबाद और सिरि को जोड़ता था। यह एक विशाल किला-शहर था, जिसमें दीवारें, बाज़ार और जलाशय शामिल थे। इसका उद्देश्य दिल्ली को मजबूत बनाना था।
- अदिलाबाद किला: तुगलकाबाद के पास छोटा किला, जो उनके पिता के किले का लघु संस्करण था। यह रक्षात्मक संरचना था और तुगलक शैली का प्रतीक।
- निज़ामुद्दीन औलिया का मकबरा: सूफी संत के सम्मान में निज़ामुद्दीन दरगाह पर मकबरा बनवाया।
- सिंचाई और कृषि कार्य: नहरें और सिंचाई प्रणालियाँ बनाईं, जैसे यमुना नदी से जुड़ी नहरें। बंजर भूमि को उपजाऊ बनाने के लिए ऋण दिए। ये कार्य आर्थिक मजबूती के लिए थे, लेकिन क्रियान्वयन में कमी रही।
मुहम्मद तुगलक का चरित्र
मुहम्मद बिन तुगलक (1325-1351 ई.) दिल्ली सल्तनत का एक परस्पर-विरोधी चरित्र वाला शासक था—बौद्धिक प्रतिभा और क्रूरता, उदारता और संदेह, धर्मनिरपेक्षता और कट्टरता का अनोखा मिश्रण। वह 8 भाषाओं (फारसी, अरबी, तुर्की, संस्कृत, मंगोल आदि) का ज्ञाता, दार्शनिक, गणितज्ञ और कवि था; जैन, हिंदू और इस्लामी विद्वानों को दरबार में बराबर सम्मान देता था।
उदार हृदय से विदेशी यात्रियों (इब्न बतूता) को लाखों दीनार और उच्च पद देता था, पर क्रोध में अंधा होकर दरबारियों को हाथी से कुचलवाता, जहर देता या जिंदा दफनाता था। न्यायप्रिय था—स्वयं मुकदमे सुनता, पर संदेही इतना कि रातोंरात राजधानी बदल देता या सैनिकों को भूखा मारता।
महत्वाकांक्षी सुधारक था—कृषि विभाग, संकेतिक मुद्रा, दौलताबाद जैसी योजनाएँ लाया, पर अव्यवहारिकता के कारण सब विफल। बरनी ने उसे “विद्वानों का सुल्तान, पागलों का बादशाह” कहा; आधुनिक इतिहासकार उसे “ट्रेजिक जीनियस” मानते हैं—जिसकी बुद्धि ने साम्राज्य को ऊँचा उठाने की कोशिश की, पर चरित्र की कमजोरियाँ उसे नीचे ले आईं।
मुहम्मद तुग़लक़ की मृत्यु और कारण
मुहम्मद तुगलक की मृत्यु 1351 ई. में सिंध में हुई, जब वे गुजरात विद्रोह दबाने जा रहे थे। कारण: एक बीमारी, संभवतः पेचिश या जहर। इब्न बतूता के अनुसार, वे बीमार पड़ गए और कुछ दिनों में मर गए। कुछ सिद्धांत हत्या का संदेह करते हैं, लेकिन प्रमाण नहीं।
उनकी मृत्यु के बाद, साम्राज्य विखंडित हो गया, और फिरोज शाह ने सुधार किए। “तुगलक मृत्यु कारण” से पता चलता है कि उनकी महत्वाकांक्षाएं उसके पतन का कारण बनीं।
मुहम्मद तुग़लक़ से संबंधित-FAQs
मुहम्मद बिन तुगलक कौन थे और उनका असली नाम क्या था?
मुहम्मद बिन तुगलक दिल्ली सल्तनत के तुगलक वंश के दूसरे सुल्तान थे। उनका असली नाम जौना खान था। वे 1325 से 1351 ई. तक शासक रहे।
मुहम्मद तुगलक को ‘पागल सुल्तान’ क्यों कहा जाता है?
उनकी असफल नीतियों जैसे राजधानी दौलताबाद स्थानांतरण और टोकन मुद्रा के कारण ब्रिटिश इतिहासकारों (जैसे सर वोल्सली हैग) ने उन्हें ‘पागल’ कहा। लेकिन समकालीन इतिहासकार बरनी ने उन्हें केवल आवेगी बताया, न कि पागल।
मुहम्मद तुगलक की राजधानी दिल्ली से दौलताबाद क्यों स्थानांतरित की गई?
1327 ई. में उन्होंने राजधानी दौलताबाद (देवगिरि) स्थानांतरित की ताकि मंगोल आक्रमणों से बचाव हो और दक्षिणी प्रांतों पर बेहतर नियंत्रण रहे। लेकिन जबरन प्रवास से हजारों लोग मरे, इसलिए 1335 में दिल्ली वापस लौटे।
तुगलक की टोकन मुद्रा क्या थी और क्यों असफल हुई?
1329-30 ई. में तांबे-पीतल के सिक्कों को सोने-चांदी के बराबर मान्यता दी गई। व्यापार बढ़ाने का उद्देश्य था, लेकिन नकली सिक्कों की बाढ़ से मुद्रास्फीति हुई और योजना वापस लेनी पड़ी।
मुहम्मद तुगलक की मृत्यु कैसे हुई?
मार्च 1351 ई. में सिंध (सोंडा) में गुजरात विद्रोह दबाने जाते समय बीमारी (संभवतः पेचिश या जहर) से मृत्यु हुई। इब्न बतूता के अनुसार वे कुछ दिनों में मर गए।
मुहम्मद तुगलक की पत्नी और संतान कौन थे?
उनकी पत्नी का नाम स्पष्ट नहीं है। कई विवाह थे, लेकिन कोई जीवित पुत्र नहीं। उत्तराधिकारी उनका भतीजा फिरोज शाह तुगलक बना।
तुगलक वंश के संस्थापक कौन थे?
तुगलक वंश के संस्थापक गयासुद्दीन तुगलक थे, जो मुहम्मद बिन तुगलक के पिता थे। उनकी रहस्यमयी मृत्यु (मंडप गिरने से) के बाद मुहम्मद गद्दी पर बैठे।
मुहम्मद तुगलक की सबसे विवादास्पद नीति क्या थी?
दौलताबाद राजधानी स्थानांतरण सबसे विवादास्पद रही, क्योंकि इससे जनता में भारी असंतोष, मौतें और विद्रोह हुए।
किन इतिहासकारों ने मुहम्मद तुगलक के बारे में लिखा?
जियाउद्दीन बरनी (तारीख-ए-फिरोजशाही) – समकालीन, विद्वता की प्रशंसा की।
इब्न बतूता – दरबारी जीवन का प्रत्यक्ष वर्णन।
सर वोल्सली हैग – पागल कहा।
मुहम्मद तुगलक की विरासत क्या है?
वे दूरदर्शी लेकिन दुर्भाग्यशाली शासक थे। उनकी नीतियाँ असफल रहीं, लेकिन केंद्रीकरण, कृषि सुधार और हिंदुओं को उच्च पद देने की सोच ने बाद के शासकों को प्रभावित किया। उन्हें “विवेकी मूर्ख” कहा जाता है।







