Mahatma Gandhi Biography in Hindi: महात्मा गाँधी, जिन्हें देश प्यार से बापू कहता है, न सिर्फ भारत के स्वतंत्रता संग्राम के निर्विवाद नायक थे, बल्कि पूरी दुनिया के लिए अहिंसा और सत्य के प्रतीक बने। उनका पूरा नाम मोहनदास करमचंद गाँधी था। उनका जीवन एक साधारण बालक से लेकर राष्ट्रपिता तक की प्रेरणादायक यात्रा है, जिसमें संघर्ष, त्याग और नैतिक शक्ति का अनोखा संगम दिखता है।
गाँधीजी ने कभी हथियार नहीं उठाया, लेकिन उनकी अहिंसक क्रांति ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी। आइए, उनके जीवन की इस अद्भुत कहानी को विस्तार से जानें, जो न सिर्फ इतिहास की किताबों में सिमटी नहीं, बल्कि आज भी हमें जीने का आदर्श मार्गदर्शन देती है।

| नाम | महात्मा गाँधी |
| पूरा नाम | मोहनदास करमचंद गाँधी |
| उपाधि | महात्मा (रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा 1915 में), राष्ट्रपिता (सुभाष चंद्र बोस द्वारा 1944 में) |
| जन्म | 2 अक्टूबर 1869 |
| जन्मस्थान | पोरबंदर, गुजरात, भारत |
| पिता | करमचंद उत्तमचंद गाँधी (पोरबंदर रियासत के दीवान) |
| माता | पुतलीबाई |
| भाई-बहन | तीन भाई-बहन: लक्ष्मीदास (बड़ा), करसनदास (बड़ा), रलियतबेन (बहन) |
| पत्नी | कस्तूरबा गाँधी (कस्तूरबाई मकनजी कपाड़िया) |
| विवाह | 1883 (13 वर्ष की आयु में बाल विवाह) |
| संतान | चार पुत्र: हरिलाल (1888), मनिलाल (1892), रामदास (1897), देवदास (1900); कोई पुत्री नहीं |
| जाति | मोढ़ बनिया (वैश्य वर्ण) |
| धर्म | हिंदू धर्म (जैन अहिंसा, वैष्णव भक्ति, ईसाई और बौद्ध प्रभावों से प्रेरित; सर्वधर्म समभाव) |
| मृत्यु | 30 जनवरी 1948 (नाथूराम गोडसे द्वारा गोली मारकर हत्या) |
| आयु मृत्यु के समय | 78 वर्ष |
| जयंती | 2 अक्टूबर (राष्ट्रीय अवकाश, अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस) |
| पुण्यतिथि | 30 जनवरी (शहीद दिवस) |
प्रारम्भिक जीवन
महात्मा गाँधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर नामक छोटे से बंदरगाह शहर में हुआ था। उनका परिवार वैश्य वर्ण का था और पिता करमचंद गाँधी पोरबंदर रियासत के दीवान (मुख्यमंत्री) थे। माता पुतलीबाई एक धार्मिक स्वाभाव की महिला थीं, जो जैन धर्म की अहिंसा और वैष्णव भक्ति से गहरे प्रभावित थीं।
बचपन में मोहनदास एक शर्मीला और साधारण बालक था, जो अपनी माँ की कहानियों से प्रभावित होता—जैसे हरिश्चंद्र की सत्यनिष्ठा या श्रवण कुमार की माता-पिता की भक्ति। लेकिन वे थोड़े शरारती भी थे; कभी चोरी कर ली, कभी मित्रों के साथ शरारतें कीं।
13 साल की उम्र में उनका विवाह कस्तूरबा से हो गया, जो उनकी जीवनसंगिनी बनीं और स्वतंत्रता संग्राम में उनका साथ दिया। पिता की मृत्यु के समय गाँधीजी का पछतावा इतना गहरा था कि उन्होंने ब्रह्मचर्य का संकल्प लिया। यह प्रारंभिक जीवन उनके चरित्र निर्माण का आधार बना, जहाँ सत्य और अहिंसा की जड़ें पनपी।
प्रारम्भिक शिक्षा
मोहनदास की प्रारंभिक शिक्षा पोरबंदर और राजकोट के स्थानीय स्कूलों में हुई। नौ साल की उम्र में राजकोट के एक स्कूल में दाखिला लिया, जहाँ उन्होंने गणित, इतिहास, भूगोल और गुजराती-हिंदी जैसी भाषाओं की बुनियादी शिक्षा ग्रहण की। वे औसत छात्र थे—न ज्यादा चतुर, न कमजोर।
विवाह के कारण पढ़ाई में एक साल का ब्रेक आया, लेकिन उन्होंने हाई स्कूल राजकोट से पास किया। 1887 में भावनगर के समलदास कॉलेज में कॉलेज स्तर की पढ़ाई शुरू की, लेकिन वहाँ का वातावरण उन्हें पसंद नहीं आया। असफलताओं से सीखते हुए, उन्होंने फैसला लिया कि कानून की पढ़ाई इंग्लैंड में करेंगे। यह दौर उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट था, जहाँ पारिवारिक दबाव और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का संघर्ष दिखा।
बैरिस्टर की पढाई
1888 में, मात्र 19 साल की उम्र में, गाँधीजी इंग्लैंड पहुँचे। लंदन के इनर टेंपल से बैरिस्टर (वकील) की डिग्री ली। यहाँ पश्चिमी संस्कृति का सामना करते हुए वे पहले तो सूट-टाई और नृत्य-नाटक सीखने लगे, लेकिन जल्द ही अपनी जड़ों की ओर लौटे। शाकाहारी भोजन पर जोर दिया, वेजिटेरियन सोसाइटी जॉइन की।
थियोसॉफिकल सोसाइटी के माध्यम से भगवद्गीता और उपनिषदों का अध्ययन किया, जो उनके अहिंसा दर्शन की नींव बने। 1891 में बैरिस्टर बनकर भारत लौटे, लेकिन मुंबई में वकालत असफल रही। फिर दक्षिण अफ्रीका का रास्ता चुना, जो उनके जीवन को हमेशा के लिए बदलने वाला सिद्ध हुआ।
दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह
दक्षिण अफ्रीका 24 मई 1893 को पहुँचे थे, पहुँचते ही गाँधीजी को नस्लीय भेदभाव का कड़वा अनुभव हुआ। 24 साल की उम्र में दादा अब्दुल्ला जवेरी नामक भारतीय व्यापारी के मुकदमे की पैरवी करने के लिए डरबन पहुंचे थे। पीटरमैरिट्जबर्ग स्टेशन पर प्रथम श्रेणी के टिकट होने के बावजूद उन्हें ट्रेन से फेंक दिया गया, क्योंकि वे ‘काले’ थे।
उपरोक्त घटना ने उन्हें झकझोर दिया। उन्होंने नेटाल इंडियन कांग्रेस की स्थापना की (1894) और भारतीयों के अधिकारों के लिए सत्याग्रह शुरू किया—अहिंसक प्रतिरोध का यह नया हथियार था।
1906 में एशियाटिक रजिस्ट्रेशन एक्ट के खिलाफ सत्याग्रह चलाया, जिसमें हजारों भारतीयों ने गिरफ्तारी दी। 1913 में खदान मजदूरों की हड़ताल और 2000 मील की पदयात्रा से ब्रिटिश सरकार झुकी। दक्षिण अफ्रीका ने उन्हें सत्याग्रह का गुरु बना दिया, जो बाद में भारत की आजादी का आधार बना। 21 साल यहाँ रहकर वे 9 जनवरी 1915 में भारत लौटे।
भारत वापसी- चम्पारण, खेड़ा और अहमदाबाद सत्याग्रह
1915 में भारत लौटे तो देश की गरीबी और ब्रिटिश अत्याचार देखकर सदमे में पड़ गए। गोपाल कृष्ण गोखले (गाँधी के राजनीतिक गुरु) के सुझाव पर देश भ्रमण किया। पहला बड़ा संघर्ष चंपारण सत्याग्रह (1917) था, जहाँ बिहार के नील किसानों को ब्रिटिश जमींदारों के ‘तीन कठिया‘ नियम से मुक्ति दिलाई। गाँधीजी पहली बार जेल गए।
1918 में खेड़ा (गुजरात) में अकालग्रस्त किसानों को लगान माफी दिलाई, सरदार पटेल जैसे नेताओं को प्रेरित किया। उसी साल अहमदाबाद मिल हड़ताल में मिल मालिकों से मजदूरों को 35% वेतन वृद्धि दिलाई। ये सत्याग्रह भारत में अहिंसा की लहर लाए, और गाँधीजी को ‘महात्मा’ (रवीन्द्रनाथ टैगौर द्वारा) का खिताब मिला।
कांग्रेस में प्रवेश
1920 में गाँधीजी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की कमान संभाली। पहले वे गोखले जैसे उदारवादियों के साथ थे, लेकिन जल्द ही पूरे भारत को एकजुट करने वाले नेता बने। रौलट एक्ट (1919) और जलियांवाला बाग हत्याकांड के खिलाफ खड़े हुए। कांग्रेस को जन आंदोलन का रूप दिया, जिसमें हिंदू-मुस्लिम एकता, दलित उत्थान और स्वदेशी पर जोर दिया गया।
असहयोग आंदोलन
1920-22 का असहयोग आंदोलन गाँधीजी का पहला राष्ट्रव्यापी आंदोलन था। ब्रिटिश स्कूलों, अदालतों और उपाधियों का बहिष्कार किया; खादी अपनाई, स्वदेशी को बढ़ावा दिया। लाखों लोग जुटे, लेकिन 1922 के चौरी-चोरा कांड (पुलिस थाने पर हमला) के बाद गाँधीजी ने आंदोलन वापस ले लिया। खुद जेल चले गए (6 साल की सजा)। इस आंदोलन ने ब्रिटिश नैतिकता को चुनौती दी।

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सविनय अवज्ञा आंदोलन

1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हुआ, जिसका प्रतीक था दांडी नमक मार्च (12 मार्च-6 अप्रैल)। साबरमती आश्रम से 78 साथियों के साथ 240 मील पैदल चले और समुद्र से नमक बनाकर ब्रिटिश नमक कानून तोड़ा। 80,000 से ज्यादा गिरफ्तारियाँ हुईं। यह आंदोलन महिलाओं को भी मैदान में लाया।
गाँधी इरविन समझौता
1931 में वायसराय लॉर्ड इरविन से समझौता हुआ, जिसमें कैदियों की रिहाई और नमक बनाने की अनुमति मिली। बदले में आंदोलन स्थगित। गाँधीजी लंदन के गोलमेज सम्मेलन गए, लेकिन दलितों के लिए अलग निर्वाचन मंडल पर विवाद हुआ।
पूना पैक्ट
1932 में येरवदा जेल में डॉ. अंबेडकर से पूना पैक्ट हुआ। हिंदू समाज में दलितों के लिए आरक्षण सुनिश्चित किया, अलग निर्वाचक मंडल रद्द। यह गाँधीजी के ‘हरिजन’ आंदोलन का हिस्सा था, जो छुआछूत के खिलाफ था। लेकिन गाँधी जातियों के समर्थक थे।
भारत छोड़ो आंदोलन
1942 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ‘करो या मरो’ का नारा देकर भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया। ब्रिटिशों को साफ कह दिया—या आजादी दो, या हम लड़ेंगे। गाँधीजी समेत लाखों जेल गए। कस्तूरबा की मृत्यु जेल में हुई। यह आंदोलन आजादी की अंतिम धक्का था।

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आज़ादी और गाँधी
15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ, लेकिन विभाजन की हिंसा ने गाँधीजी को तोड़ दिया। उन्होंने पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये लौटाने के लिए अनशन किया, हिंदू-मुस्लिम दंगों को रोका। उनका योगदान सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक था—महिलाओं को सशक्तिकरण, ग्रामीण अर्थव्यवस्था (खादी), और धार्मिक सद्भाव।
गोडसे द्वारा गाँधी की हत्या
30 जनवरी 1948 को नई दिल्ली के बिड़ला हाउस में प्रार्थना सभा जाते हुए तथाकथित हिंदू राष्ट्रवादी नाथूराम गोडसे ने गाँधीजी को तीन गोलियाँ मार दीं। गोडसे को पाकिस्तान समर्थन का आरोप था। अंतिम शब्द थे—’हे राम’। दस लाख लोग अंतिम यात्रा में शामिल हुए।

महात्मा गाँधी की पत्नी और संतान
पत्नी: कस्तूरबा गाँधी (बा)
महात्मा गाँधी की पत्नी कस्तूरबा गाँधी (जन्म नाम: कस्तूरबाई मकनजी कपाड़िया) थीं, जिन्हें प्यार से ‘बा’ कहा जाता था। उनका जन्म 11 अप्रैल 1869 को गुजरात के पोरबंदर के पास दीव में हुआ था। वे एक साधारण वैश्य परिवार की तीसरी संतान थीं।
- विवाह: दोनों का विवाह मात्र 13-14 साल की उम्र में 1883 में हो गया। यह बाल विवाह का दौर था, और कस्तूरबा को पढ़ाई-लिखाई से ज्यादा घरेलू जिम्मेदारियाँ निभानी पड़ीं। शुरू में रिश्ता पारंपरिक था—ईर्ष्या, झगड़े भी हुए—लेकिन दक्षिण अफ्रीका जाते समय कस्तूरबा ने साथ दिया, और धीरे-धीरे वे गाँधीजी की अहिंसा और सत्याग्रह की साथी बनीं।
- स्वतंत्रता संग्राम में योगदान: कस्तूरबा ने चंपारण, खेड़ा, असहयोग और भारत छोड़ो जैसे आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई। वे जेल भी गईं—कुल चार बार। साबरमती आश्रम में महिलाओं को सिलाई और स्वदेशी सिखाया। उनकी सहनशक्ति गाँधीजी के लिए प्रेरणा थी।
- निधन: 22 फरवरी 1944 को आगा खान पैलेस (पूना) की जेल में हृदयाघात से उनका निधन हो गया, जब वे भारत छोड़ो आंदोलन के लिए कैद थीं। गाँधीजी ने उन्हें ‘मेरी आजीवन सहधर्मिणी’ कहा। आज भी ‘कस्तूरबा गांधी राष्ट्रीय स्मृति ट्रस्ट’ उनके नाम पर महिलाओं के उत्थान के लिए काम करता है।
संतान: चार पुत्र, कोई पुत्री नहीं
गाँधीजी के चार पुत्र हुए, लेकिन कोई पुत्री नहीं। उनके पुत्रों का जन्म दक्षिण अफ्रीका और भारत में हुआ। गाँधीजी के सख्त ब्रह्मचर्य और आश्रम जीवन ने पारिवारिक रिश्तों को प्रभावित किया—बड़े बेटे हरिलाल से तो खुला टकराव भी हुआ। फिर भी, ये पुत्र गाँधी परिवार की विरासत के कंधे पर चढ़े।
| पुत्र का नाम | जन्म-मृत्यु | संक्षिप्त जीवन परिचय |
|---|---|---|
| हरिलाल गाँधी (बड़ा पुत्र) | 23 अक्टूबर 1888 – 18 जून 1948 | सबसे विवादास्पद। पिता के सिद्धांतों से असहमत, इस्लाम अपनाया फिर बापस हिन्दू धर्म में लौटे। वकील बने, लेकिन शराब और कर्ज के चंगुल में फँसे। 1948 में टीबी से मृत्यु। उनकी बेटी मनु गाँधी बाद में गाँधीजी की सहचरी बनीं। |
| मणिलाल गाँधी (दूसरा पुत्र) | 28 अक्टूबर 1892 – 5 जनवरी 1956 | दक्षिण अफ्रीका में रहे, ‘इंडियन ओपिनियन’ अखबार चलाया। स्वतंत्रता सेनानी, गांधीवादी सिद्धांतों पर चले। उनकी बेटी सीता गाँधी सामाजिक कार्यकर्ता बनीं। |
| रामदास गाँधी (तीसरा पुत्र) | 2 नवंबर 1897 – 14 अप्रैल 1969 | स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय, साबरमती आश्रम में रहे। बाद में सेवाग्राम आश्रम संभाला। उनकी पत्नी नर्मदा बाई भी आंदोलनकारी थीं। |
| देवदास गाँधी (छोटा पुत्र) | 22 मई 1900 – 3 मई 1957 | पत्रकार बने, ‘हिंदुस्तान टाइम्स‘ के संपादक। लखनऊ विश्वविद्यालय से पढ़े। उनकी बेटी राधा गाँधी सामाजिक कार्य में रहीं। |
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गाँधी पुण्यतिथि
हर साल 30 जनवरी को शहीद दिवस या पुण्यतिथि मनाई जाती है। देशभर में प्रार्थनाएँ, स्मृति सभाएँ होती हैं। यह दिन शांति और अहिंसा की याद दिलाता है।
महात्मा गाँधी से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य (सबको जानने चाहिए)
- महात्मा गाँधी की जयंती: 2 अक्टूबर (1869 को जन्म, अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में मनाया जाता है)।
- महात्मा गाँधी की पुण्यतिथि: 30 जनवरी (1948 को हत्या, शहीद दिवस के रूप में मनाई जाती है)।
- दक्षिण अफ्रीका कब गए: 1893 (24 मई को पहुँचे, 21 साल रहे और सत्याग्रह की शुरुआत की)।
- विवाह कब हुआ: 1883 (13 वर्ष की उम्र में कस्तूरबा से बाल विवाह)।
- बैरिस्टर कब बने: 1891 (लंदन के इनर टेंपल से डिग्री ली)।
- महात्मा की उपाधि किसने दी: रवींद्रनाथ टैगोर ने 1915 में दी।
- राष्ट्रपिता की उपाधि किसने दी: सुभाष चंद्र बोस ने 1944 में रेडियो प्रसारण में कहा।
- पहला राष्ट्रीय आंदोलन: असहयोग आंदोलन (1920-1922, ब्रिटिश संस्थाओं का बहिष्कार)।
- पहली बार गाँधी की फोटो भारतीय नोटों पर कब छपी: 1969 (स्वतंत्रता शताब्दी पर 100 रुपये के नोट पर)।
- महात्मा गांधी की फोटो 1996 से छपने वाले भारतीय मुद्रा के सभी नोटों पर छापी गई है।
- गाँधी जयंती पहली बार कब मनाई गई: 2 अक्टूबर 1948 (मृत्यु के बाद पहली बार राष्ट्रीय अवकाश)।
- गांधी जी के अंतिम संस्कार में बीस लाख से अधिक लोग शामिल हुए थे।
- नई दिल्ली में उनके स्मारक पर “हे भगवान” लिखा है, जो उनके अंतिम शब्द माने जाते हैं।
- मनरेगा का नया नाम: महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (2005 में नामित)।
- महात्मा गाँधी की हत्या किसने की: नाथूराम गोडसे (हिंदू राष्ट्रवादी)।
- महात्मा गाँधी की हत्या का स्थान: बिड़ला हाउस (नई दिल्ली, अब गांधी स्मृति)।
- महात्मा गाँधी किस जाति के थे: मोढ़ बनिया (वैश्य वर्ण)।
- कानून की पढ़ाई में खराब हैंडराइटिंग: लंदन लॉ स्कूल में उनकी लिखावट इतनी खराब थी कि प्रोफेसर शिकायत करते थे।
- आहार प्रयोग: उन्होंने दशकों तक फल-नट्स पर जीवन जिया, शाकाहार पर किताब लिखी, और स्वास्थ्य के लिए बकरी का दूध पीने लगे (कभी बकरी साथ ले जाते थे)।
- प्रथम विश्व युद्ध में भर्ती: अहिंसा के बावजूद ब्रिटेन के लिए भारतीयों की भर्ती की, लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध में विरोध किया।
- अराजकतावादी दर्शन: वे मानते थे कि भारत बिना सरकार के अहिंसा और नैतिकता पर चल सकता है।
- अपनी पूजा का विरोध: ‘गांधिवाद’ को कल्ट बनाने से इनकार किया, कहा—सत्य और अहिंसा पुराने सिद्धांत हैं।
- अमेरिका में अस्थि कलश: उनकी अस्थियों का एक कलश लॉस एंजिल्स के एक स्मारक में रखा है।
महात्मा गाँधी द्वारा लिखित पुस्तकें और प्रकाशित समाचार पत्र/पत्रिकाएँ
प्रमुख पुस्तकें (Books Written by Mahatma Gandhi)
गाँधीजी ने गुजराती, हिंदी और अंग्रेजी में लिखा; कई अनुवाद उपलब्ध हैं। यहाँ कुछ प्रसिद्ध हैं:
- सत्य के साथ मेरे प्रयोग (The Story of My Experiments with Truth): उनकी आत्मकथा (1927-1929), जीवन के प्रयोगों का वर्णन। यह उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना है।
- हिंद स्वराज (Hind Swaraj or Indian Home Rule): 1909 में लिखी, आधुनिक सभ्यता और स्वराज पर आलोचना।
- गोखले: मेरे राजनीतिक गुरु (Gokhale: My Political Guru): गोपाल कृष्ण गोखले पर जीवनी (1955, मरणोपरांत प्रकाशित)।
- स्वास्थ्य का रहस्य (Key to Health): 1942 में, स्वास्थ्य, शाकाहार और स्वच्छता पर।
- सर्वोदय का मार्ग (All Men Are Brothers): सर्वोदय दर्शन पर संकलन।
- आहार और आहार सुधार (Diet and Diet Reform): शाकाहार और आहार पर विचार।
- येरवदा मंदिर से (From Yeravda Mandir): जेल जीवन और आध्यात्मिक चिंतन पर।
- ग्राम स्वराज (Village Swaraj): ग्रामीण आत्मनिर्भरता पर।
प्रकाशित समाचार पत्र/पत्रिकाएँ (Publications and Newspapers Edited/Published by Gandhi)
गाँधीजी ने 45 वर्षों तक पत्रकारिता की, जो सत्याग्रह का हथियार बनी। उन्होंने चार मुख्य प्रकाशनों का संपादन किया:
- इंडियन ओपिनियन (Indian Opinion): 1903-1915, दक्षिण अफ्रीका में शुरू (अंग्रेजी, गुजराती, तमिल, हिंदी में साप्ताहिक)। भारतीयों के अधिकारों के लिए।
- यंग इंडिया (Young India): 1919-1932, अंग्रेजी साप्ताहिक। असहयोग और स्वराज पर लेख।
- नवजीवन (Navjivan): 1919-1931, गुजराती साप्ताहिक। नैतिकता और सामाजिक सुधार पर।
- हरिजन (Harijan): 1933-1948, अंग्रेजी साप्ताहिक (हरिजनबंधु और हरिजनसेवक गुजराती/हिंदी संस्करण)। छुआछूत उन्मूलन के लिए।
वर्तमान समय में गाँधी की प्रासंगिकता
आज के दौर में, जब हिंसा, असमानता और पर्यावरण संकट चरम पर हैं, गाँधीजी की अहिंसा की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। नेल्सन मंडेला से लेकर मार्टिन लूथर किंग तक, उनके सत्याग्रह ने वैश्विक आंदोलनों को प्रेरित किया। भारत में 2 अक्टूबर को गांधी जयंती राष्ट्रीय अवकाश है, और संयुक्त राष्ट्र ने इसे अहिंसा का अंतरराष्ट्रीय दिवस घोषित किया।
जलवायु परिवर्तन के खिलाफ गाँधीवादी सादगी, या सोशल मीडिया पर नफरत के खिलाफ सत्याग्रह—गाँधी हर समस्या का समाधान सुझाते हैं। वे सिखाते हैं कि बदलाव व्यक्तिगत शुद्धिकरण से शुरू होता है। अगर हम उनके सिद्धांत अपनाएँ, तो एक बेहतर दुनिया संभव है।
sources: विकिपीडिया







