Ghiyasuddin Tughlaq History: खिलजी वंश के पतन के बाद तुगलक वंश दिल्ली सल्तनत का तीसरा प्रमुख मुस्लिम वंश था, जिसने 1320 से 1413 ई. तक शासन किया। इस दौरान सैन्य शक्ति, आर्थिक सुधारों और भव्य निर्माण कार्यों में वृद्धि हुई। इस वंश का संस्थापक गयासुद्दीन तुगलक (जिसे घियासुद्दीन तुगलक या गाजी मलिक भी कहा जाता है) एक कुशल सेनापति और कुशल प्रशासक, जिसने खलजी वंश की अराजकता के बाद दिल्ली साम्राज्य को स्थिरता प्रदान की।
इस लेख में हम गयासुद्दीन तुगलक के जीवन, उत्थान, शासन नीतियों और विरासत पर विस्तार से चर्चा करेंगे, साथ ही कुछ ऐतिहासिक तथ्यों का अध्ययन करेंगे जो समकालीन स्रोतों जैसे जियाउद्दीन बरनी और इब्न बतूता द्वारा दिए गए हैं।

| पूर्ण नाम | गयासुद्दीन तुगलक (घियासुद्दीन तुगलक या गाजी मलिक) |
| जन्म | 13वीं शताब्दी (लगभग 1270 ई., सटीक तिथि अज्ञात) |
| जन्मस्थान | पंजाब (भारतीय उपमहाद्वीप का उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र, वर्तमान भारत) |
| पिता | मलिक रजब (या मलिक तुगलक), गुलाम वंश के सुल्तान गयासुद्दीन बलबन का तुर्की दास |
| माता | एक जाट महिला (पंजाब की निवासी, हिंदू जाट समुदाय से) |
| पत्नी | मखदूमा-ए-जहाँ (मलिका-ए-जहाँ, अलाउद्दीन खलजी के समकालीन कुलीन परिवार से संभावित संबंध) |
| दिल्ली की गद्दी पर कब्जा | 8 सितंबर 1320 |
| संतान | पुत्र: मुहम्मद बिन तुगलक (जौना खान), महमूद खान, मुबारक खान, मसूद खान (कुल चार पुत्र) |
| शासनकाल | 1320-1325 ई. (दिल्ली सल्तनत के तुगलक वंश के संस्थापक) |
| प्रमुख योगदान | तुगलक वंश की स्थापना; तुगलकाबाद किले का निर्माण; कृषि-सिंचाई सुधार; मंगोल आक्रमणों पर 20+ विजय |
| मृत्यु | 1 फरवरी 1325 ई. (पुत्र मुहम्मद बिन तुगलक के कथित षड्यंत्र में पंडाल ढहने से) |
| मकबरा | तुगलकाबाद किले के सामने (लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर से निर्मित, 1321 ई. में स्वयं बनवाया) |
| रोचक तथ्य | कट्टर सुन्नी मुसलमान; संगीत के विरोधी; अमीर खुसरो उनके दरबारी कवि थे; करौना तुर्क वंश से संबंध |
Rise of Tughlaq Dynasty: तुगलक वंश का उदय
नासिरुद्दीन खुसरो शाह (1320 ई.) खलजी वंश का अंतिम सुल्तान, जिसके शासनकाल में सम्पूर्ण राज्य में अराजकता फैली थी। पंजाब के प्रांताध्यक्ष और सैन्य अभियानों के प्रमुख गाजी मलिक (बाद में गयासुद्दीन तुगलक) ने खुसरो शाह के विरोधियों को एकत्र किया। समाना, मुल्तान और स्वात के प्रांताध्यक्षों को अपने पक्ष में करने के प्रयास में वह आंशिक रूप से सफल रहा, लेकिन एन-उल-मुल्क मुल्तानी ने उसका साथ देने से इंकार कर दिया।
लेकिन गाजी मलिक ने अपने प्रयास जारी रखे और गुप्त षड्यंत्र रचे, कई प्रमुख व्यक्तियों को अपनी ओर मिला लिया। उसका पुत्र फखरुद्दीन मोहम्मद जौना (जिसे खुसरो शाह ने ‘गृह का स्वामी‘ नियुक्त किया था) दिल्ली से भागकर दीपालपुर में अपने पिता से जा मिला।
पूर्ण तैयारी के साथ गाजी मलिक ने दिल्ली पर हमला किया। समाना के प्रांताध्यक्ष और सिरसा के हिसामुद्दीन ने इस हमले का विरोध किया, लेकिन दोनों को पराजय का मुंह देखना पड़ा। दिल्ली के निकट पहुंचने पर खुसरो शाह स्वयं युद्ध के लिए बाहर निकला, लेकिन एन-उल-मुल्क मुल्तानी ने अपनी सेना वापस बुला ली।
5 सितंबर 1320 को खुसरो शाह पराजित हुआ और उसकी हत्या कर दी गई। इससे भारत में 30 वर्षों के खलजी शासन का अंत हो गया। गाजी मलिक ने 8 सितंबर 1320 को दिल्ली की गद्दी संभाली और ‘गयासुद्दीन तुगलक’ नाम धारण किया। वे दिल्ली के पहले सुल्तान थे जिन्होंने ‘गाजी‘ (काफिरों का संहारक) उपाधि ग्रहण की।
गयासुद्दीन का उदय दिल्ली सल्तनत की सीमावर्ती अस्थिरता का परिणाम था। मंगोल आक्रमणों के कारण उत्तर-पश्चिमी सीमा को मजबूत करने के लिए ऐसे शक्तिशाली गवर्नरों की आवश्यकता थी, जो अक्सर सुल्तान की कमजोरी का फायदा उठाकर विद्रोह कर देते थे। गयासुद्दीन ने मंगोलों के खिलाफ 20-29 अभियानों में विजय प्राप्त की, जैसा कि अमीर खुसरो (18 विजयें) और जियाउद्दीन बरनी (20 विजयें) ने वर्णन किया है। यह उनकी सैन्य प्रतिभा का प्रमाण है।
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Ghiyasuddin Tughlaq History: गयासुद्दीन तुगलक इतिहास
गयासुद्दीन तुगलक (पूर्ण नाम: घियासुद्दीन तुगलक) का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था। उसका पिता एक तुर्क दास था, जो गुलाम वंश के शासक गयासुद्दीन बलबन के अधीन सेवा करते थे, जबकि माता एक जाट महिला थीं, जो पंजाब की निवासी थीं।
तुगलक वंश ‘करौना तुर्क‘ के नाम से जाना जाता था, क्योंकि गयासुद्दीन के पूर्वज मध्य एशिया के पहाड़ी क्षेत्रों (सिंध और तुर्किस्तान के बीच) में रहने वाले मंगोल-तुर्क मिश्रित समुदाय से थे। इटली के यात्री मार्को पोलो के अनुसार, ‘करौना’ शब्द भारतीय माताओं और आक्रमणकारी पिताओं के पुत्रों के लिए प्रयुक्त होता था।
हिन्दू माता और मुस्लिम पिता की संतान के रूप में जन्म लेने के कारण गयासुद्दीन के व्यक्तित्व में हिंदू विनम्रता-कोमलता और तुर्की पुरुषार्थ-उत्साह का अनोखा मिश्रण था। अलाउद्दीन खलजी की मृत्यु (1316) के समय वह राज्य के प्रमुख कुलीनों में से एक था।
कुतुबुद्दीन मुबारक शाह के शासन में वह उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत (पंजाब) के गवर्नर और ‘वार्डन ऑफ द मार्चेस‘ नियुक्त हुआ, जहां उसने मंगोल आक्रमणों से सीमाओं की रक्षा की।
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गयासुद्दीन तुगलक का शासनकाल (1320-1325): गृह और आर्थिक नीतियां
गद्दी संभालने के बाद गयासुद्दीन ने राज्य की स्थिरता पर बल दिया। उसने अलाउद्दीन खलजी द्वारा छीनी गई जागीरें वापस लौटा दीं और खुसरो शाह द्वारा लूटे गए कोष की बहाली की। कई शेखों ने प्राप्त धन लौटा दिया, लेकिन शेख निजामुद्दीन औलिया ने 5 लाख टंके दान करने का हवाला देकर इंकार कर दिया। गयासुद्दीन, जो कट्टर सुन्नी मुसलमान था, ने उनकी निंदा की (उनकी संगीत-प्रिय भक्ति को गैर-कानूनी बताते हुए), लेकिन लोकप्रियता के कारण कोई दंड नहीं दिया। 53 विद्वानों ने भी शेख को निर्दोष पाया।
भ्रष्टाचार रोकथाम और प्रशासनिक सुधार
- अधिकारियों को उचित वेतन देकर भ्रष्टाचार रोका।
- केवल निष्ठावान और योग्य व्यक्तियों की पदोन्नति।
- उसने ‘तुगलकाबाद‘ किले और नई राजधानी (1321 ई.) की स्थापना की, जो दिल्ली सल्तनत की रक्षा के लिए रणनीतिक था। यह किला लाल बलुआ पत्थर से बना था और सिंचाई नहरों से जुड़ा हुआ।
आर्थिक और कृषि नीतियां
गयासुद्दीन की आर्थिक नीतियां कृषि-केंद्रित थीं:
- बोली लगवाना (टैक्स फार्मिंग) प्रथा समाप्त।
- अमीरों को मालगुजारी का 1/15 से अधिक भाग न लेने की सीमा तय की।
- कारकुनों को 5-10 प्रति हजार से अधिक न वसूलने की अनुमति।
- इक्ता की मालगुजारी 1/10-1/11 से अधिक न बढ़ाने का आदेश।
- भूमि नाप प्रथा बंद; कर निर्धारण स्थानीय स्तर पर।
- कृषि विकास: बंजर भूमि पर खेती को प्रोत्साहन, नहरें खुदवाई (जैसे यमुना से सतलज तक), उद्यान लगाए, किसानों के लिए दुर्ग बनवाए।
- अलाउद्दीन की चेहरा-दाग (घोड़ों की पहचान) व्यवस्था जारी।
- डाक व्यवस्था: सुधार कर 100 मील प्रतिदिन की गति सुनिश्चित की, हरकारों को 2/3 मील और घुड़सवारों को 7-8 मील अंतराल पर तैनात।
सैन्य अभियान: वारंगल विजय और साम्राज्य विस्तार
1321 ई. में पुत्र जौना खां के नेतृत्व में वारंगल अभियान असफल रहा, लेकिन 1323 ई. में सफलता मिली। काकतीय राजा प्रताप रुद्रदेव द्वितीय को बंदी बनाकर दिल्ली लाया गया। वारंगल को सुल्तानपुर नाम दिया गया और साम्राज्य को तुर्की सरदारों में बांटा।
गयासुद्दीन ने बंगाल अभियान (1325) में भी सफलता प्राप्त की, लेकिन यहीं उसकी मृत्यु हुई। उसकी सैन्य रणनीति ने तुगलक वंश को मजबूत आधार दिया।
गयासुद्दीन तुगलक की मृत्यु और विरासत
बंगाल से लौटते हुए गयासुद्दीन को पुत्र जौना खां (मुहम्मद बिन तुगलक) के षड्यंत्र की खबर मिली। जौना ने शेख निजामुद्दीन औलिया का शिष्य बनकर भविष्यवाणियां सुनीं कि वे शीघ्र सुल्तान बनेंगे। अफगानपुर (दिल्ली से 6 मील) में जौना ने लकड़ी का पंडाल बनवाया, जो हाथियों के स्पर्श से गिरने वाला था। मार्च 1325 में स्वागत के दौरान पंडाल ढह गया, जिसमें गयासुद्दीन और पुत्र महमूद कुचल गए। इब्न बतूता के अनुसार, निर्माणकर्ता अहमद अयाज बाद में मुहम्मद तुगलक के वजीर बने।
मकबरा: तुगलकाबाद किले के सामने 1321 ई. में स्वयं बनवाया, लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर से निर्मित। यह पुल से जुड़ा है और आज भी मौजूद है।
संगीत के घोर विरोधी होने के बावजूद, अमीर खुसरो उसके दरबारी कवि थे, जिन्हें 1000 टंके मासिक पेंशन मिलती थी। खुसरो ने लिखा: “उसने कभी बुद्धिमत्ता से युक्त कार्य नहीं किया… राजमुकुट के नीचे आचार्यों जैसा मस्तिष्क रखता था।”
निष्कर्ष
गयासुद्दीन तुगलक (शासन: 1320-1325) ने मात्र 5 वर्षों में दिल्ली सल्तनत को अराजकता से उबारकर स्थिरता दी। उसकी कृषि-सिंचाई सुधारों, सैन्य विजयों और प्रशासनिक दक्षता ने तुगलक वंश की नींव मजबूत की। वे एक न्यायप्रिय शासक थे, जिनकी विरासत आज भी तुगलकाबाद के अवशेषों में जीवित है।
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