Ashoka Biography: प्राचीन भारत में मौर्य साम्राज्य का विस्तार भारतीय उपमहद्वीप के अफगानिस्तान से बांग्लादेश तक और कश्मीर से कर्नाटक तक का विशाल भू-भाग एक शासक के अधीन था – इस विशाल साम्राज्य के तीसरे सम्राट थे देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा अशोक।
इतिहास में बहुत कम शासक ऐसे हुए हैं जिन्होंने अपने जीवन में इतना प्रभावशाली परिवर्तन किया हो – कलिंग के रक्तरंजित मैदान से लेकर बोधिवृक्ष की शीतल छाया में धम्म की यात्रा तक, “चंडाशोक” से धर्माशोक” बनने की यात्रा, यही वह परिवर्तन था जिसने अशोक को महान बनाया।

| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| पूरा नाम | सम्राट अशोक (शिलालेखों में: देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा अशोक) |
| जन्म | 304 ईसा पूर्व |
| जन्म स्थान | पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना, बिहार) |
| पिता | सम्राट बिन्दुसार |
| माता | महारानी सुभद्रांगी (बौद्ध ग्रन्थों में जनपद-कल्याणी या धर्मा भी) |
| राजवंश | मौर्य राजवंश |
| पूर्ववर्ती शासक | बिन्दुसार |
| उत्तरवर्ती शासक | दशरथ मौर्य (कुछ क्षेत्रों में), संप्रति आदि |
| राज्याभिषेक | 268–269 ईसा पूर्व (शिलालेखों में इसी वर्ष से गणना) |
| शासन काल | 268 ई.पू. से 232 ई.पू. (लगभग 36–40 वर्ष) |
| प्रमुख पत्नियाँ | 1. देवी (विदिशा महादेवी) 2. कारुवाकी (तीवर की माता) 3. असंधिमित्रा (प्रमुख रानी) 4. पद्मावती 5. तिष्यरक्षिता |
| प्रमुख सन्तान | • महेन्द्र (पुत्र – लंका में बौद्ध प्रचारक) • संघमित्रा (पुत्री – लंका में भिक्षुणी) • तीवर (कारुवाकी से) • कुणाल • चारुमति |
| प्रमुख उपाधियाँ | देवानांप्रिय, प्रियदर्शी, धर्माशोक, चक्रवर्ती |
| धर्म परिवर्तन | कलिंग युद्ध (261 ई.पू.) के बाद बौद्ध धर्म अंगीकार |
| सबसे महत्वपूर्ण कार्य | धम्म नीति, धम्म-महामात्रों की नियुक्ति, शिलालेख एवं स्तम्भ स्थापना |
| मृत्यु | 232 ईसा पूर्व |
| मृत्यु स्थान | पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना, बिहार) |
| समाधि/स्मृति स्थान | पाटलिपुत्र (कुछ परम्पराओं में तक्षशिला या साँची भी) |
| राष्ट्रीय प्रतीक | सारनाथ का अशोक स्तम्भ (भारत का राष्ट्रीय चिह्न) अशोक चक्र (राष्ट्रीय ध्वज में) |
Ashoka Biography: सम्राट अशोक का प्रारम्भिक जीवन (304 ई.पू. – 273 ई.पू.)
सम्राट अशोक का जन्म 304 ईसा पूर्व में राजधानी पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना, बिहार) में हुआ था। उनके पिता सम्राट बिन्दुसार थे जो चन्द्रगुप्त मौर्य के पुत्र और उत्तराधिकारी थे। माता का नाम बौद्ध ग्रन्थों में “सुभद्रांगी” या “जनपद-कल्याणी” या “धर्मा” मिलता है। वह एक ब्राह्मण कन्या थीं जो राजमहल में आई थीं।
बिन्दुसार की अनेक रानियाँ और सैकड़ों पुत्रों का वर्णन है। बौद्ध ग्रन्थ “अशोकावदान” एवं सिंहली ग्रन्थ “महावंश” के अनुसार अशोक जन्म से बहुत ज्यादा सुन्दर नहीं थे – कठोर त्वचा, रूखे बाल – जिस कारण राजदरबार में उन्हें कम प्यार मिला। परन्तु बचपन से ही उनमें असाधारण बुद्धि, साहस और सैन्य-कौशल झलकता था।
युवावस्था में पिता द्वारा उन्हें कई विद्रोहों को दबाने के लिए भेजा गया। सबसे पहले तक्षशिला (आधुनिक पाकिस्तान) में विद्रोह को कुचला, फिर अवन्ति प्रदेश (उज्जयिनी) का उपराजा (वायसराय) बनाया गया। उज्जयिनी में ही उनकी भेंट विदिशा की एक सुन्दर व्यापारी-पुत्री “देवी” (या विदिशा-महादेवी) से हुई, जिनसे उनका विवाह हुआ और दम्पत्ति को दो संतान – महेन्द्र एवं संघमित्रा – जन्मीं।
मौर्य साम्रज्य का उत्तराधिकार-संग्राम एवं राज्यारोहण (273–268 ई.पू.)
बिन्दुसार की मृत्यु 273-272 ई.पू. के आसपास हुई। सिंहली ग्रन्थ “महावंश” एवं “दीपवंश” में वर्णन मिलता है कि अशोक ने अपने 99 भाइयों की हत्या करके सिंहासन प्राप्त किया और उन्हें “चंडाशोक” (क्रूर अशोक) कहा गया। परन्तु आधुनिक इतिहासकार इस कथा को अतिशयोक्तिपूर्ण मानते हैं क्योंकि :
- अशोक के पाँचवें शिलालेख में उनके जीवित भाइयों-बहनों का उल्लेख है।
- तेरहवें वर्ष के लेखों में भी उनके भाई जीवित बताए गए हैं।
- केवल मास्की एवं गुर्जर्रा लघु-लेखों में ही “अशोक” नाम आता है, अन्यत्र वे स्वयं को “देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा” कहते हैं।
सच यह सत्य होता है कि उत्तराधिकार के लिए चार वर्ष तक (273–269 ई.पू.) संघर्ष चला और अन्त में 269 या 268 ई.पू. में उनका विधिवत् राज्याभिषेक हुआ। यही तिथि उनके सभी शिलालेखों में गणना की आधार तिथि है।
कलिंग युद्ध : (261 ई.पू.)
राज्याभिषेक के आठवें वर्ष में अशोक ने कलिंग (आधुनिक ओडिशा एवं उत्तर आन्ध्र) पर आक्रमण किया। कलिंग उस समय एक शक्तिशाली गणराज्य था जो मौर्यों के अधीन नहीं था।
अशोक के तेरहवें महाशिलालेख (जो सबसे लम्बा एवं सबसे महत्त्वपूर्ण है) में स्वयं अशोक लिखते हैं :
“राज्याभिषेक के आठ वर्ष बाद कलिंग जीता गया।
एक लाख लोग मारे गए, डेढ़ लाख बन्दी बनाए गए और उससे कई गुना अधिक मरे एवं घायल हुए।
आज देवानांप्रिय इसे देखकर गहरा दुःख, अत्यन्त पश्चाताप और खेद महसूस करता है।”
यह विश्व इतिहास का पहला लिखित प्रमाण है जिसमें कोई विजेता स्वयं अपनी विजय पर पश्चाताप करता है। इस युद्ध में हुए रक्तपात ने अशोक के हृदय को पूरी तरह परिवर्तित कर दिया। उन्होंने घोषणा की :
“अब से केवल धम्म-विजय होगी, वह विजय जो सभी प्राणियों के लिए सुखकारक हो।”
बौद्ध धर्म की स्वीकार करना
कलिंग युद्ध के तुरंत बाद अशोक बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित हुए। बौद्ध परम्परा के अनुसार उन्हें उपगुप्त (या निग्रोध) नामक एक युवा भिक्षु ने प्रभावित किया।
- प्रथम लघु शिलालेख के अनुसार ढाई वर्ष तक वे साधारण उपासक (गृही उपासक) रहे।
- फिर वे श्रामणेर (नवदिक्षित भिक्षु) बने।
- राज्याभिषेक के दसवें वर्ष में बोधगया (सम्बोधि) की यात्रा की।
- बीसवें वर्ष में लुम्बिनी (रुम्मिन्देई) गए, वहाँ कर माफ किया, 1/8 भाग कर रखा और स्तम्भ स्थापित किया।
- निगलीसागर (नेपाल) में कनकमुनि बुद्ध के स्तूप का जीर्णोद्धार करवाया।
- अपने पुत्र महेन्द्र एवं पुत्री संघमित्रा को लंका भेजकर बौद्ध धर्म का प्रचार करवाया।
पाटलिपुत्र में तीसरी बौद्ध संगीति (संगीति) उनके संरक्षण में हुई जिसमें मोग्गलिपुत्त तिस्स अध्यक्ष थे।
अशोक का धम्म : वैश्विक नैतिक धर्म
अशोक का “धम्म” विशुद्ध बौद्ध धर्म नहीं था, अपितु एक विश्वव्यापी नैतिक आचार-संहिता थी जिसे ब्राह्मण, श्रमण, आजीवक, जैन – सभी स्वीकार कर सकें।
द्वितीय स्तम्भ लेख में वे स्वयं प्रश्न करते हैं – “किंति च धम्म?” (धर्म क्या है?)
उत्तर वे ही देते हैं :
धम्म के मुख्य गुण :
- अपासिनवे (कम पाप)
- बहुकयाने (बहु कल्याण)
- दया, दान, सत्य, शौच (पवित्रता), मृदुता, साधुता
व्यवहार में लाने योग्य नियम :
- प्राणी-हत्या न करना
- माता-पिता, गुरु, वृद्धों की सेवा
- दास-भृत्यों से अच्छा व्यवहार
- अल्प-व्यय, अल्प-संग्रह
निषिद्ध दुर्गुण (आसिनव) :
- क्रूरता, निष्ठुरता, क्रोध, मान, ईर्ष्या
बारहवें शिलालेख में वे धार्मिक सहिष्णुता का जो सिद्धान्त देते हैं, वह आज भी विश्व का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है :
“अपने धर्म का सम्मान करो, पर दूसरे धर्म की निन्दा मत करो।
दूसरे धर्मों का सम्मान करने से अपना धर्म भी बढ़ता है और दूसरों का उपकार भी होता है।
विपरीत करने से अपना धर्म भी नष्ट होता है और दूसरों का अपकार होता है।
सभी संप्रदाय एक-दूसरे के धम्म को सुनें, इससे सब बहुश्रुत होंगे।”
धम्म-प्रचार के उपाय
अशोक ने धम्म के प्रचार के लिए जो व्यवस्था की, वह प्राचीन विश्व में अद्वितीय थी :
- स्वयं धम्म-यात्राएँ करते थे (शिकार-यात्रा बन्द कर दीं)।
- धम्म-महामात्र नामक विशेष अधिकारी नियुक्त किए (13वें वर्ष बाद) जो सभी संप्रदायों में धम्म प्रचार करते थे।
- सीमा क्षेत्रों में “अन्त-महामात्र” भेजे।
- सड़कों के किनारे वृक्ष लगवाए, कुएँ खुदवाए, विश्रामगृह बनवाए, औषधीय पौधे लगवाए।
- मनुष्य और पशुओं दोनों के लिए चिकित्सालय स्थापित किए।
- पशु-बलि पर पूर्णतः या आंशिक प्रतिबन्ध लगाया।
प्रशासनिक व्यवस्था: विश्व का पहला कल्याणकारी राज्य
अशोक का साम्राज्य चार प्रान्तों में विभक्त था :
1. उत्तरापथ – तक्षशिला
2. प्राच्य (पूर्व) – तोसाली (धौली, ओडिशा)
3. दक्षिणापथ – सुवर्णगिरि (कर्नाटक)
4. अवन्ति – उज्जयिनी
प्रमुख अधिकारी :
- राजुक (रज्जुक) – जनपदों के प्रशासक, जिन्हें दण्ड-पुरस्कार का अधिकार था
- युक्त – लेखा एवं सचिवालय
- महामात्र एवं धम्म-महामात्र
- इतिझक-महामात्र – स्त्रियों के कल्याण हेतु
- नगर-व्यावहारिक – नगर-न्यायाधीश
- प्रतिवेदक – गुप्तचर जो सीधे सम्राट को रिपोर्ट करते थे
अशोक ने घोषणा की – “सब प्रजा मेरे बच्चे हैं। जैसे मैं अपने बच्चों की भलाई चाहता हूँ, वैसे ही सबकी चाहता हूँ।”
अशोक के शिलालेख : विश्व धरोहर
अशोक ने 14 महाशिलालेख, 7 स्तम्भलेख, अनेक लघु शिलालेख एवं गुफा-लेख निर्मित कराये। ये ब्राह्मी, खरोष्ठी, अरमेई एवं यूनानी भाषाओं में हैं।
यह भी पढ़िए: समुद्रगुप्त का जीवन परिचय और उपलब्धियां | Samudragupta Biography and History
महत्त्वपूर्ण :
- दिल्ली-टोपरा स्तम्भ (7 स्तम्भ लेख)
- सारनाथ सिंह-शीर्ष (भारत का राष्ट्रीय चिह्न)
- लुम्बिनी (रुम्मिन्देई) स्तम्भ
- इलाहाबाद-कौशाम्बी स्तम्भ (जिस पर बाद में समुद्रगुप्त एवं जहाँगीर ने भी लेख लिखवाए)
ये शिलालेख विश्व की सबसे प्राचीन लिखित राज्य-नीतियाँ हैं।
अन्तिम वर्ष एवं उत्तराधिकारी
अशोक का अन्तिम लेख 258 ई.पू. के लगभग का है। परम्परा के अनुसार वे 232 ई.पू. में परलोक सिधारे। उनके बाद उत्तराधिकारी के रूप में दशरथ मौर्य, संप्रति, शालिशूक आदि शासक हुए, पर साम्राज्य धीरे-धीरे पतन की ओर अग्रसर हुआ और 185 ई.पू. में पुष्यमित्र शुंग ने अन्तिम मौर्य सम्राट बृहद्रथ की हत्या कर सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया।
आशिक का मूल्यांकन
अशोक केवल एक सम्राट नहीं, एक विचार थे।
- पहला शासक जिसने युद्ध के बाद पश्चाताप किया।
- पहला शासक जिसने लिखित रूप में धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनाई।
- पहला शासक जिसने इंसानों के साथ पशु-अस्पताल बनवाए।
- पहला शासक जिसने सड़कों के किनारे वृक्ष एवं विश्रामगृह बनवाए।
- पहला शासक जिसने विदेशों में धार्मिक दूत भेजे (श्रीलंका, मिस्र, सीरिया, मैसिडोनिया तक)।
रोमिला थापर ने लिखा है – “अशोक वह शासक है जिसने राज्य को नैतिक आधार पर चलाने का प्रयास किया।”
हर्बर्ट जॉर्ज वेल्स ने अपनी पुस्तक “The Outline of History” में लिखा – “Amidst the tens of thousands of names of monarchs that crowd the columns of history… the name of Ashoka shines, and shines almost alone, a star.”
निष्कर्ष
आज जब विश्व हिंसा, असहिष्णुता और पर्यावरण विनाश से जूझ रहा है, अशोक का धम्म और भी प्रासंगिक हो उठता है :
“न हिंसा से, केवल धम्म से विजय प्राप्त की जा सकती है।
यह विजय जो सभी के लिए सुख दे।”
भारत के राष्ट्रीय चिह्न में आज भी अशोक का सारनाथ सिंह-शीर्ष विराजमान है।
भारत के राष्ट्रीय ध्वज के बीच में अशोक-चक्र सुशोभित है।
अशोक केवल भारत के नहीं, समस्त मानवता के सम्राट थे।
उनका सन्देश आज भी गूँजता है –
“सब प्रजा मेरे बालक हैं।”







