उत्तरवर्ती मुगल सम्राट -1707-1806 | Later Mughal Emperors – 1707-1806

By Santosh kumar

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Later Mughal Emperors – 1707-1806: 18 वीं शताब्दी के आरंभ में मुग़ल साम्राज्य अवनति की ओर जा रहा था। औरंगजेब का राज्यकाल मुगलों का संध्याकाल था। साम्राज्य को अनेक कठिनाइयों ने घेर रखा था और यह रोग शनै: शनै: समस्त देश में फैल रहा था।  बंगाल, अवध और दक्कन आदि प्रदेश मुगल नियंत्रण से बाहर हो गए।

उत्तर-पश्चिम की ओर से विदेशी आक्रमण होने लगे तथा विदेशी व्यापारी कंपनियों ने भारत की राजनीति में हस्तक्षेप करना आरंभ कर दिया। परंतु इतनी कठिनाइयों के होते हुए मुगल साम्राज्य का दबदबा इतना था कि पतन की गति बहुत धीमी रही। 1737 में बाजीराव प्रथम और 1739 में नादिरशाह के दिल्ली पर आक्रमणों ने मुगल साम्राज्य के खोखलेपन की पोल खोल दी और 1740 तक यह पतन स्पष्ट हो गया। 

Later Mughal Emperors - 1707-1806
शासक का नामशासन काल
बहादुर शाह प्रथम (शाह बेखबर)1707–1712 ई.
जहाँदार शाह (लम्पट मूर्ख)1712–1713 ई.
फ़र्रुख़सियर (घृणित कायर)1713–1719 ई.
रफ़ी उद-दारजात1719 ई.
शाह जहाँ द्वितीय1719 ई.
मुहम्मद इब्राहिम1720 ई.
मुहम्मद शाह (रंगीला/रंगीले)1719–1748 ई.
अहमद शाह बहादुर1748–1754 ई.
आलमगीर द्वितीय1754–1759 ई.
शाह जहाँ तृतीय1759 ई.
शाह आलम द्वितीय (अली गौहर)1759–1806 ई.

उत्तरवर्ती मुगल सम्राट -1707-1806 | Later Mughal Emperors – 1707-1806


1- बहादुर शाह प्रथम (शाह बेखबर)

मार्च 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात् उसके पुत्रों में उत्तराधिकार के युद्ध का बिगुल था–

  • मुहम्मद मुअज़्ज़म (शाह आलम)
  • मुहम्मद आजम और 
  • कामबख्स

उपरोक्त तीनों में से सबसे बड़े पुत्र मुहम्मद मुअज्जम की विजय हुई। मुहम्मद मुअज़्ज़म उत्तराधिकार की लड़ाई में विजयी रहा और ‘बहादुर शाह’ के नाम से गद्दी पर बैठा। वह उत्तरवर्ती मुगलों में पहला और अंतिम शासक था जिसने वास्तविक प्रभुसत्ता का उपयोग किया जब वह सिंहासन पर बैठा तो उसकी आयु काफी हो चुकी थी लगभग(67वर्ष)।

इस मुगल सम्राट ने शांतिप्रिय नीति अपनाई। यद्यपि यह कहना कठिन है कि यह नीति उसके शिथिलता की द्योतक थी अथवा उसकी सोच समझ का फल था। उसनें शिवाजी के पौत्र साहू को जो 1689 से मुगलों के पास कैद था, मुक्त कर दिया और महाराष्ट्र जाने की अनुमति दे दी। 

राजपूत राजाओं से भी शांति स्थापित कर ली और उन्हें उनके प्रदेशों में पुनः स्थापित कर दिया। परंतु बहादुर शाह को सिक्खों के विरुद्ध कार्यवाही करनी पड़ी क्योंकि उनके नेता बंदा बहादुर ने पंजाब में मुसलमानों के विरुद्ध एक व्यापक अभियान आरंभ कर दिया था। बंदा लोहगढ़ के स्थान पर हार गया। मुगलों ने सरहिंद को 1711 में पुनः जीत लिया। परंतु यह सब होते हुए भी बहादुर शाह सिक्खों को मित्र नहीं बना सका और ना ही कुचल सका।

बहादुर शाह उदार, विद्वान और धार्मिक था लेकिन धर्मांध नहीं था। वह जागीरें देने तथा पदोन्नतियाँ देने में भी उधार था। उसने आगरा में जमा वह खजाना भी खाली कर दिया जो 1707 उसके हाथ लगा था। 

मुगल इतिहासकार खाफी खाँ ने उसके बारे में कहा है, “यद्यपि उसके चरित्र में कोई दोष नहीं था लेकिन देश की सुरक्षा प्रशासन व्यवस्था में उसने इतनी आत्मसंतुष्टि और लापरवाही दिखाई कि परिहास और व्यंग करने वाले व्यक्तियों ने  द्वयार्थक रूप में उसके राज्यरोहण के तिथि-पत्र को ‘शाह बेखबर’ के रूप में उल्लेखित किया है।

2- जहांदार शाह (लम्पट मूर्ख) 1712-1713

उत्तराधिकार की लड़ाई में जहांदार शाह के तीन भाई- अजीम-उस-शान, रफी-उस-शान और जहान शाह मारे गए। जहांदार शाह, असद खाँ के पुत्र जुल्फिकार खाँ द्वारा प्राप्त समर्थन के कारण सफल हुआ था, जिसे नए बादशाह ने अपने वजीर के रूप में राज्य के सर्वोच्च पद पर नियुक्त किया। 

अत्यंत भ्रष्ट नैतिक आचरण वाले जहाँदार शाह पर उसकी रखैल ‘लाल कुँवर‘ का पूर्ण नियंत्रण था। उसने “नूरजहां के अनुरूप व्यवहार करना प्रारंभ कर दिया।” उसके संबंधियों ने मुगल साम्राज्य को लूटा तथा उसके निम्नजातीय सहयोगियों ने साम्राज्य के सर्वोच्च प्रतिष्ठित लोगों को अपमानित और त्रस्त किया।

परिणामस्वरूप लोगों की दृष्टि में शाही ताज की प्रतिष्ठा धूलिसात हो गई और समाज में प्रशासन अशिष्टता के गर्त में चले गए।” वज़ीर जुल्फिकार खाँ ने अपने समस्त प्रशासकीय दायित्व अपने कृपापात्र एवं चाटुकार सुभग चंद नामक व्यक्ति के हाथों में दे दिए, जिसके मिथ्याभिमान और आडंबरों से शीघ्र ही सारे लोग त्रस्त हो गए।

अजीम-उस-शान का पुत्र फर्रूखसियर अपने पिता के पतन के समय पटना में था। उसने अप्रैल 1712 में स्वयं को बादशाह घोषित कर दिया। उसने सैयद बंधुओं- सैयद हुसैन अली और सैयद अब्दुल्लाह खाँ का समर्थन प्राप्त किया, जिन्हें अज़ीम-उस-शान ने अपने अधीन बिहार और इलाहाबाद का उप-सूबेदार नियुक्त किया था। उसने सेना एकत्र करके आगरा की ओर कूच किया और 10 जनवरी 1713 को नगर के बाहर जहांदार शाह को परास्त कर दिया।

इस पराजय के बाद जहांदार शाह दिल्ली भाग गया जहां असद खाँ और जुल्फिकार खाँ ने उसके साथ धोखा किया और फर्रूखसियर के आदेश से जेल में उसकी हत्या कर दी।

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मुग़ल दरबार के प्रमुख गुट

मुग़ल साम्राज्य के कमजोर होते ही दरबार में कई गुट बन गए और अपनी-अपनी सुविधानुसार शासकों का पक्ष करने लगे। इन गुटों में मुख्य रूप से-

  • तूरानी  
  • ईरानी
  • अफगानी और 
  • हिंदुस्तानी

इनमें पहले तीन मध्य एशियाई, ईरानी और अफगान सैनिकों के वंशज थे जिन्होंने भारत को जीता था और यहां राज्य स्थापित करने में सहायता दी थी। उनकी संख्या औरंगजेब के अंतिम 25 वर्षों में बहुत बढ़ गई थी, विशेषकर जब वह दक्षिण में युद्ध में व्यस्त रहा। इनके वंशज भारत के भिन्न-भिन्न भागों में सैनिक और असैनिक पदों पर नियुक्त थे। इनमें ऑक्सस नदी के पार वाले तूरानी और खुरासान के अफगान, प्रायः सुन्नी थे और ईरानी अधिकतर शिया थे।

इस मुगल अथवा विदेशी दल के विपरित एक भारतीय दल था जिसमें वे लोग थे जिनके पूर्वज बहुत पीढ़ियों पहले भारत में बस गए थे अथवा हिंदुओं से मुसलमान बन गए थे। इस दल को राजपूत, जाट तथा शक्तिशाली हिंदू जमींदारों का समर्थन भी प्राप्त था। छोटे-छोटे पदों पर नियुक्त हिंदू भी इसी दल का समर्थन करते थे। परंतु यह भी कहना ठीक नहीं होगा कि ये दल केवल रक्त, जाति और धर्म पर ही आधारित थे।

“यह चारणों, गायकों, नर्तकों और नाट्यकर्मियों के सभी वर्गों के लिए बहुत अच्छा समय था। योग्य, विद्वान और प्रतिभाशाली व्यक्तियों को दरबार से निकाल दिया गया और विवेकहीन, चाटुकार और झूठे किस्से गढ़नें वाले लोग चारों ओर मंडराने लगे”  समकालीन इतिहासकारों ने इसे अव्यवस्थित स्थिति का बड़ा सजीव वर्णन करते हुए लिखा है, “सेना को मामूली वेतन दिया जाता था, जमीदार विद्रोही हो गए थे और अधिकारी भ्रष्ट और निष्ठाहीन हो गए थे। पूर्णत: अव्यवस्था की इस रेल-पेल में जहांदार शाह को सैयद बंधुओं ने षड्यंत्र करके मौत के घाट उतार दिया और फर्रूखसियर को सिंहासनारूढ़ कर दिया।

सैयद बंधुओं का परिवार मेरठ और सहारनपुर के बीच ऊपरी गंगा-यमुना के दोआब क्षेत्र में बाराहा का निवासी था। अपनी वीरता और सैन्य नेतृत्व करने की क्षमता के कारण इस परिवार के सदस्यों ने युद्ध में शाही सेना का नेतृत्व करने का गौरव प्राप्त किया था।

औरंगजेब के शासनकाल में सैयद हुसैन अली ने महत्वपूर्ण युद्धों में सेनाओं का नेतृत्व किया था और जाजू में अपनी सेवाओं के कारण बहादुर शाह से पदोन्नति प्राप्त की थी। बाद में उनको शाही समर्थन नहीं मिला लेकिन अज़ीम-उस-शान ने उन्हें अपने पक्ष में कर लिया और उन्हें दो प्रांतों ( इलाहाबाद और बिहार ) का प्रभार सौंप दिया।

सैयद बंधुओं द्वारा फर्रूखसियर को प्रदत्त समर्थन के लिए उन्हें भली-भांति पुरस्कृत किया गया और इस काल में उन्होंने मुगल दरबार में अपने लिए विशेष स्थान अर्जित कर लिया। परंतु सम्राट इतना अस्थिर बुद्धि व्यक्ति था कि उसे सैयद बन्धुओं पर भरोसा नहीं था और स्वयं व्यक्तिगत सत्ता के प्रयोग के लिए नितांत अक्षम ।

3- फर्रूखसियर (घृणित कायर) 1713-1719

इस एहसान के बदले में, फर्रुखसियर, जो सैय्यद भाइयों की कृपा से सत्ता में आए थे, ने सैय्यद अब्दुल्लाह खान को वजीर नियुक्त किया और उनके छोटे भाई हुसैन अली खान को मीर बख्शी या वास्तव में मुख्य सेनापति बनाया। फर्रुखसियर 21 साल के युवा थे, विद्वानों के अनुसार। उनकी अपनी कोई इच्छाशक्ति नहीं थी। वे युवा, अनुभवहीन और राज्य के मामलों में लापरवाह थे।

अपने शासन की शुरुआत से ही उन्होंने खुद के लिए मुसीबतें पैदा कर लीं। नियुक्त किए गए प्रांतीय सूबेदारों में से, उन्होंने ज्यादातर नए प्रांतीय सूबेदार नियुक्त किए। सबसे महत्वपूर्ण चिन किलिच खान बहादुर थे, जिन्हें निजाम-उल-मुल्क के नाम से बेहतर जाना जाता है, जिन्हें दक्कन के छह मुगल सूबों का गवर्नर नियुक्त किया गया और उन्होंने औरंगाबाद को अपना मुख्यालय बनाया। वे पुराने दल के नेता थे और समकालीन मुगल साम्राज्य के सबसे योग्य व्यक्ति थे।

फर्रुखसियर के आदेश से जुल्फीकार खाँ को धोखा देकर मार डाला गया और उसकी संपत्ति को ज़ब्त कर लिया गया। असद खाँ 1716 में अपनी मृत्यु पर्यन्त दु:ख झेलता रहा। “औरंगजेब के महान काल के अंतिम प्रतिष्ठित व्यक्ति को समाप्त करना” एक भयंकर राजनीतिक भूल थी।

सम्राट फर्रूखसियर ने इस आशंका से मुक्ति पाने के लिए कि सैयद बंधु उसे राजसिंहासन से हटाकर किसी अन्य मुगल शहजादे को राज सिंहासनारूढ़ न कर सकें, अतः उसने कैद में पड़े मुगल राजपरिवार के कुछ प्रमुख सदस्यों को अंधा करवा दिया। उसने मीर जुमला जैसे अपने कुछ विशेष कृपापात्रों को सैयद बंधुओं की अवहेलना करने की अनुमति दे दी।

मार्च 1713 से ही सम्राट फर्रूखसियर और सैयद बंधुओं से में पारस्परिक झगड़े प्रारंभ हो गए। परंतु चूँकि सम्राट में उनके विरुद्ध कोई कार्यवाही करने का साहस नहीं था, अतः उसने उनके साथ समझौता कर लिया तथापि इस समझौते के बावजूद वह सैयद बंधुओं को शक्तिहीन करने के लिए उनके विरुद्ध मूर्खतापूर्ण एवं विश्वासघाती चालें चलता रहा। 

सैयद हुसैन अली ने अजीत सिंह के विरुद्ध चढ़ाई की और उसे शांति संधि करने के लिए बाध्य किया। सिक्ख नेता बंदा बहादुर को हराने के बाद उसे पकड़ लिया गया और उसकी हत्या कर दी गई (19 जून 1716)।

1717 में सम्राट ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को बहुत सी व्यापार संबंधी रियायत ने दे दीं। इनसे बिना सीमा शुल्क के बंगाल के रास्ते व्यापार भी किया जा सकता था। चूड़ामन जाट के नेतृत्व में हुए जाटों के एक विद्रोह को दबाने के लिए अंबेर के सवाई जयसिंह ने एक सैन्य अभियान किया, जिसका अंत समझौते में हुआ।

1719 में हुसैन अली ने पेशवा बालाजी विश्वनाथ के साथ समझौता (दिल्ली की सन्धि) किया, जिसके द्वारा उसने दिल्ली में प्रभुसत्ता के लिए चल रहे संघर्ष में मराठों को अपनी सक्रिय सैन्य सहायता देने के बदले में बहुत-सी रियायतें प्रदान कीं।

सैयद बंधुओं और सम्राट फर्रूखसियर के मध्य मतभेदों का अत्यंत दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण अन्त हुआ। सम्राट को धक्के देकर राजसिंहासन से उतार दिया गया। नंगे पैर और नंगे सर सम्राट पर लगातार घूँसों और सबसे गंदी गालियों की बौछार की गई। तदुपरांत उसे बंदी बना लिया गया, भूखों मारा गया, अन्धा किया, जहर दिया गया और अंततः गला घोंटकर मार डाला गया।”

फर्रूखसियर को गद्दी से हटाने के बाद (अप्रैल 1719) सैयद बंधुओं ने रफी-उश-शान (बहादुर शाह के द्वितीय पुत्र) के पुत्र रफी-उद्-दरजात, को गद्दी पर बैठाया।  “वह सैयद बंधुओं के कैदी के रूप में जिया और मरा।” तदुपरांत उन्होंने उसके बड़े भाई रफी-उद-दौला को, शाहजहां द्वितीय की उपाधि देकर सिंहासनारूढ़ किया। वह अफीम का आदि एक बीमार युवक था। सितंबर 1719 में उसकी भी मृत्यु हो गई।

अब सैयद बंधुओं ने शाहजहां द्वितीय के पुत्र (बहादुर शाह के चौथे पौत्र) का चयन किया। उसे सितंबर 1719 में मुहम्मद शाह की उपाधि देकर सिंहासन पर बैठाया गया।  

 4- मुहम्मद शाह (रंगीला/रंगीले) 1719-48  

अपने पूर्ववर्तियों की तरह, मुहम्मद शाह सिंहासन पर बैठने के एक साल से अधिक समय तक सैय्यद बंधुओं के हाथों की कठपुतली बना रहा। सैय्यद बंधु शीघ्र ही मुगल दरबार की राजनीति का शिकार बन गए, मुख्य षड्यंत्रकर्ता था, चिन किलिच खान या निज़ाम-उल-मुल्क, जिसमें इतिमाद-उद-दौला, शादात खान, राजमाता और सम्राट स्वयं ने मिलकर सैय्यद बंधुओं से मुक्ति पाने की एक गुप्त योजना बनाई।

सबसे पहले सैय्यद हुसैन अली खान, जो दक्कन में मुगल वायसराय थे, को उनके पुत्र के साथ दक्कन में ही मार डाला गया (9 अक्टूबर 1720)। एक महीने बाद, उनके भाई सैय्यद अब्दुल्ला खान को बंदी बना लिया गया (15 नवंबर 1719) और बाद में उन्हें जहर देकर मार डाला गया।

सैयद बंधुओं के पतन के बाद दरबार में षड्यंत्र की बाढ़ आ गई और मुगल साम्राज्य का शीघ्रता से पतन होना शुरू हो गया। यह स्थिति सम्राट के चरित्र के कारण और खराब हो गई जो गद्दी पर बैठने के समय केवल 17 साल का किशोर था। वह अपना समय महल की चारदीवारी के भीतर हरम की स्त्रियों और हिजड़ो के साथ व्यतीत करता था। वह असंयत आचरण वाला सर्वाधिक बिलासप्रिय शासक था और इसलिए उसको मोहम्मद शाह रंगीला अथवा रंगीले कहा जाता है। 

सैयद बंधुओं के पतन के बाद वह अपनी प्रेमिका एवं पत्नी रहमत-उन-निसा कोकी जिऊ, हाफिज खिदमतगार खाँ नामक एक हिजड़े और दरबार के अन्य अमीरों के चंगुल में फंस गया।  

महान मुगलों के अधीन वजीर सम्राट का प्रमुख प्रशासक होता था जिसे सम्राट अपनी इच्छानुसार नियुक्त अथवा निलंबित कर सकता था एवं वह सम्राट की नीतियों को कार्यान्वित करने के लिए एक साधन हुआ करता था। सैयद बंधुओं ने “सर्वशक्तिमान वजीर पद के सिद्धांत” का सृजन किया जिसके अधीन सम्राट, वजीर के हाथों की कठपुतली बन कर रह गया। मुगल शासन व्यवस्था में यह नवीन परिवर्तन मुहम्मद शाह के शासनकाल में एक स्थापित परंपरा बन गया।

17 से 21 जनवरी तक मुहम्मद अमीन खान की मृत्यु के बाद, यह पद निज़ाम-उल-मुल्क को सौंपा गया, जिन्होंने एक साल बाद कार्यभार संभाला। उनका कार्यकाल बहुत छोटा रहा, हालाँकि वह मुर्तजा नगर (मुर्तज़ा आबाद) में अपने वायसराय पद को मजबूत करना चाहते थे और उन्होंने साम्राज्य को पुनर्जीवित करने के लिए जोरदार प्रयास किए। उन्होंने प्रशासनिक सुधारों की एक योजना तैयार की, जिसका उद्देश्य प्रशासनिक दक्षता बहाल करना और वित्तीय प्रणाली में सुधार करना था।

लेकिन इन सुधारों ने कई प्रभावशाली लोगों के हितों को प्रभावित करना शुरू कर दिया, और सम्राट ने उनकी योजना का समर्थन करने के बजाय, उनके लिए अप्रत्यक्ष रूप से मुश्किलें पैदा कर दीं।

आपसी ईर्ष्या से ग्रसित अमीरों के विभिन्न गुटों ने, एक व्यक्ति (निज़ाम) के हाथों में सत्ता के केंद्रीकरण का विरोध किया, जो उनके विशेषाधिकारों पर अतिक्रमण कर रहा था। निज़ाम-उल-मुल्क को दक्कन के वायसराय पद से हटाने का एक प्रयास भी विफल रहा।

ऐसी स्थिति में निज़ाम को लगने लगा कि सम्राट और अमीर वर्ग दोनों ही उनके सुधारों के विरोधी हैं, इसलिए उन्होंने वज़ीर का पद छोड़ दिया और दक्कन की ओर प्रस्थान किया। वहाँ उन्होंने अक्टूबर 1724 में सैन्य विजय के द्वारा हैदराबाद में एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना की।

इसके बाद मुहम्मद अमीन खान के पुत्र, कमरुद्दीन को वज़ीर बनाया गया। वह आलसी और शराबी प्रवृत्ति का था। उसका एकमात्र उद्देश्य अपने पद को सुरक्षित रखना और जितना हो सके कम काम करना था। जब रानी गुद्दिया (उदिया) की शक्ति को कम करना आवश्यक समझा गया, तो उसे पद से हटा दिया गया। उनके उत्तराधिकारी रोशन उद्दौला पर बड़ी रकम का गबन करने का दोष पाया गया, और उनके स्थान पर खान-ए-दौरान को वज़ीर नियुक्त किया गया।

नवीन राज्यों का उदय

राज्य का नामस्थापना का वर्ष (या स्वायत्तता की अवधि)संस्थापक/प्रमुख शासक का नाम
बंगाल1717-1727 (सूबेदारी से स्वतंत्रता तक)मुर्शिद कुली खान
हैदराबाद1724 (दक्कन में स्वतंत्र राज्य)निज़ाम-उल-मुल्क (चिन क़िलिच खान)
अवध1722 (सूबेदारी से शुरुआत)सआदत अली खान (बुरहान-उल-मुल्क)
रुहेलखंडलगभग 1730 का दशककटेहर के रुहेले सरदार (अली मुहम्मद खान)
फर्रुखाबादलगभग 1730 का दशकबंगश नवाब (मुहम्मद खान बंगश)
भरतपुर (जाट राज्य)1720-1730 का दशकबदनसिंह एवं चूड़ामन
मराठा प्रभुत्व (मालवा)1737 (अधिकार)बाजीराव प्रथम (पेशवा)
मराठा प्रभुत्व (गुजरात)1741 (अधिकार)मराठा सरदार
बुंदेलखंड (मराठा अधिकार)1731 के बादमराठा सरदार
राजस्थान1730-1740 का दशक (मुगल प्रभाव मुक्त)विभिन्न राजपूत शासक

1737 में बाजीराव प्रथम केवल 500 घुड़सवार लेकर दिल्ली पर चढ़ आया। सम्राट डर कर भागने को तैयार था। 1739 में नादिरशाह ने भारत पर आक्रमण किया और मुगल साम्राज्य को अंधा और जख्मी बना कर छोड़ गया।

दूसरी ओर मुगल दरबार परस्पविरोधी चार प्रमुख गुटों—तुरानी, ईरानी, अफगान और हिंदुस्तानी में विभाजित थे।

5- अहमद शाह 1748-54

मुहम्मद शाह की मृत्यु के उपरांत उसका एकमात्र पुत्र अहमद शाह उसका उत्तराधिकारी बना। अहमद शाह का जन्म एक नर्तकी से हुआ था जिसके साथ बादशाह ने विवाह कर लिया था। उसकी अतिशय दुश्चरित्रा के कारण उसका निकम्मापन और अधिक बढ़ गया। उसके बचपन और जवानी में महल की औरतें एवं हिजड़े ही उसके केवलमात्र साथी रहे थे।

राजमाता ने स्वयं बड़े-बड़े राजविरुद धारण किए जिनमें किबला-ए-आलम की उच्चतम उपाधि एवं 5000 सवारों का मनसब भी शामिल थे। राजमाता का भाई मान खाँ, जो  एक आवारा, बदमाश और पेशेवर नर्तक था को मुतकात-उद-दौला  की उपाधि और 6000 का मनसब प्रदान किया गया। 

इस अवधि के दौरान, अवध का नवाब सफदरजंग साम्राज्य का वजीर या प्रधानमंत्री था। वह एक बहुत अयोग्य सेनानायक और असंयत व्यक्ति था। जावेद खाँ और तुर्कों (तुरानियों) द्वारा नियंत्रित दरबारी गुट उससे घृणा करते थे क्योंकि  सफदरजंग एक ईरानी था।

अहमद शाह के शासनकाल में अहमद शाह अब्दाली ने भारत पर दो बार 1749 और 1752 में आक्रमण किए थे। 1752 में है दिल्ली तक बढ़ आया। अहमद शाह ने शांति बनाए रखने और दिल्ली को विनाश से बचाने के लिए पंजाब और मुल्तान अब्दाली को दे दिए। दूसरी और जाट और मराठे भी मुगल दरबार की राजनीति में बार-बार हस्तक्षेप कर रहे थे।

अहमद शाह के अंतिम दिनों में मुगलों का खजाना इतना खाली हो गया था कि “शाही मालखाने की वस्तुएं दुकानदारों और पटरीवालों को बेची गईं और अधिकांश धन जो इस तरह एकत्र किया गया था, उससे सैनिकों को वेतन अदा किया गया।” अगले सम्राट आलमगीर द्वितीय के शासनकाल में सैनिकों द्वारा अपने बकाया वेतन वसूल करने के लिए सैनिक विद्रोह कर देना एक आम बात हो गई।

6- आलमगीर द्वितीय 1754-49

अहमद शाह को गद्दी से हटाने के बाद जहांदार शाह के पौत्र अज़ीजुद्दीन को आलमगीर द्वितीय के नाम से गद्दी पर बैठाया गया। शाही सेना और महल के कर्मचारियों को 3 वर्षों में 15 दिन का वेतन प्राप्त नहीं हुआ था। भूख से मरते सैनिकों के दंगे और उपद्रव आलमगीर के शासनकाल की दिन-प्रतिदिन की घटनाएं थीं।

राजधानी की दयनीय स्थिति का स्वभाविक प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों पर पड़ा। मई 1755 में वज़ीर इमाद के अपने ही सैनिकों ने उस पर प्रहार किए और बुरी तरह घसीटा गया जिसके कारण उसके वस्त्र चिथले हो गए।

इसी समय अहमद शाह अब्दाली ने 1755 में भारत पर चौथी बार आक्रमण किया। वह दिल्ली से 1757 में वापस गया। इसके तुरंत बाद इमाद ने मराठों को दिल्ली तथा पंजाब में आमंत्रित किया। नवंबर 1759 में आलमगीर द्वितीय की उसके वज़ीर इमाद ने हत्या कर दी और उसकी नंगी लाश को लाल किले के पीछे बहती यमुना नदी में फेंक दिया गया। वज़ीर को इस हत्या से कोई लाभ नहीं हुआ। देश में हर जगह अराजकता व्याप्त थी और देशद्रोही इमाद के लिए “दिल्ली अब उसकी शरणस्थली नहीं रह गई थी।”

7-शाह आलम द्वितीय 1759-1806    

यह आलमगीर द्वितीय का पुत्र था और इसका वास्तविक नाम अली गौहर था। अपने पिता की हत्या के समय वह बिहार में था जहां इसने शाह आलम द्वितीय की उपाधि धारण करके स्वयं को बादशाह घोषित कर दिया (22 दिसंबर 1759)। इसी बीच दिल्ली में इमाद और अमीरों ने मिलकर कामबख्स के पौत्र मुही-उल-मिल्लर को शाहजहां द्वितीय के नाम पर राजसिंहासन पर बैठा दिया।

इस प्रकार आलमगीर द्वितीय की हत्या के उपरांत मुगल साम्राज्य में दो बादशाह दो पृथक स्थानों में— शाह आलम द्वितीय पटना में और शाहजहां द्वितीय सिंहासनारुढ़।

हुए इन परिस्थितियों के कारण शाह आलम द्वितीय को 1772 तक (अगले 12 वर्ष) निर्वासित के रूप में बिताने पड़े एवं उसे अंग्रेजों तथा मराठों की कठपुतली बनना पड़ा। इसी बीच अहमद शाह अब्दाली पांचवीं बार भारत आया जिसके फलस्वरूप पानीपत का तीसरा युद्ध हुआ।

अंततः जनवरी 1772 में मराठों ने शहालम को दिल्ली की गद्दी पर पुनर्स्थापित किया। इससे पहले अंग्रेज प्रभुसत्ता की ओर तेजी से बढ़ रहे थे और उन्होंने प्लासी के युद्ध (1757) में बंगाल के नवाब को तथा बक्सर के युद्ध (1764) में शाह आलम द्वितीय और उसकेबाद शुजा-उद्-दौला को हरा दिया और उन्होंने मुगल बादशाह को बंदी बना लिया। 

शाह आलम द्वितीय का संपूर्ण जीवन आपदाओं से ग्रस्त रहा। उसे 1788 में अन्धा कर दिया गया। 1803 में अंग्रेजों ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया और शाह आलम द्वितीय और उसके दो उत्तराधिकारी अर्थात मुगल सम्राट अकबर द्वितीय (1806-37) और बहादुर शाह द्वित्य (1837-1857) ईस्ट इंडिया कंपनी के पेंशनभोगी मात्र बनकर रह गए। 


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