Sayyid Vansh History: महमूद शाह की मृत्यु के बाद कुलीन सरदारों ने अपनी निष्ठा का प्रदर्शन दौलत खां लोधी के पक्ष में किया। दौलत खां ने दोआब में प्रवेश किया और उसने इटावा के राजपूतों तथा बदायूं के महावत ख़ां को उनका सार्वभौम शासक मानने पर विवश किया। परंतु दौलत खां दिल्ली वापस चला आया क्योंकि वह जौनपुर के इब्राहिम शाह से संघर्ष करना नहीं चाहता था।
दिसंबर 1413 में खिज्र खाँ ने दौलत खाँ के प्रदेश पर आक्रमण किया और उसने मेवात में प्रवेश किया। उसने संभल में लूट मचा दी। मार्च 1414 में उसने 60,000 अश्वारोहियों के साथ सीरी में दौलत खां को घेर लिया। दौलत खां चार महीनों तक डटा रहा परंतु बाद में उसने आत्मसमर्पण कर दिया। 28 मई 1414 को खिज्र खाँ ने दिल्ली में प्रवेश किया और शहर भवन शासक के रूप में सैय्यद वंश की नींव डाली, हिसार में दौलत खां को बंदी बना लिया गया।

| शासक का नाम | शासन काल |
|---|---|
| खिज्र खान (संस्थापक और प्रथम शासक) | 1414–1421 ई. |
| मुबारक शाह | 1421–1434 ई. |
| मुहम्मद शाह | 1434–1445 ई. |
| आलम शाह (अंतिम शासक) | 1445–1451 ई. |
Sayyid Vansh History: खिज्र खाँ का शासन काल-1414-21
खिज्र खां केवल सैयद वंश का संस्थापक कि नहीं वरन् उसका सबसे योग्य शासक भी था। वह एक सैयद था तारीख-ए-मुबारक शाही का लेखक खिज्र के सैयद होने के प्रमाणस्वरूप दो कारण प्रस्तुत करता है। एक तो यह कि एक बार सैय्यदों का प्रधान जलालुद्दीन बुखारी मलिक मरदान के घर आया और जब मेहमानों के लिए भोजन परोसा गया, मलिक मरदान ने खिज्र के भाई सुलेमान को सैय्यद साहब के हाथ धुलाने के लिए कहा, परंतु सैय्यद साहब ने कहा “यह सैय्यद है और ऐसा काम इसके लिए उचित नहीं है।”
दूसरा कारण यह बताया है कि वह “उदार, वीर, नम्र ,अतिथि-सत्कार करने वाला, वचनों का पालन करने वाला और दयालु था। यह गुण केवल किसी सैय्यद में ही पाए जा सकते थे।”
बचपन में खिज्र खाँ का पालन पोषण, मुल्तान के गवर्नर मलिक नासिर-उल-मुल्क मरदान द्वारा हुआ था। फिरोज तुगलक ने खिज्र खां को मुल्तान की जागीर दे रखी थी, परंतु जब फिरोज तुगलक की मृत्यु के बाद अव्यवस्था फैल गई, तो मल्लू इकबाल के भाई सारंग खां ने खिज्र खाँ को घेर लिया और बंदी बना लिया। फिर भी खिज्र खाँ ने बचकर भागने का इंतजाम कर लिया। 1398 में वह तैमूर से मिल गया और जाते समय तैमूर उसे मुल्तान की जागीर उसके अधीन भागों को दे गया। 1414 में खिज्र खाँ ने दौलत खाँ को निकाल दिया और दिल्ली पर अधिकार कर लिया।
खिज्र खाँ की उपाधि ( Title )-—
जब खिज्र खाँ ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया, उस समय उसकी स्थिति अत्यन्त कमजोर थी और इसीलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं , उसने सुल्तान की उपाधि ग्रहण न की बरन् रैयत-ए-आला के नाम से अपने को संतुष्ट रखा। तैमूर के नाम में सिक्के खुदवाए गए, खुतबा पढ़ा गया और उसकी मृत्यु के बाद यही पम्परा उसके पुत्र, शाह रुख के नाम में सम्पन्न हुई। खिज्र खाँ ने उपहार व भेटें अपने स्वामी के लिए भेजीं।
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1414 में उसकी स्थिति
जब खिज्र खां सुल्तान बना उस समय राजधानी में सत्ता के लिए कई शक्तियां संघर्ष करने लगीं। उन्होंने परिस्थितियों के अनुसार अपनी स्थिति में परिवर्तन किया। दोआब में बहुत अशांति थी इटावा, कटेहर, कन्नौज और बदायूं के सरदार केंद्रीय सरकार की शक्ति को चुनौती देने में संकोच न करते थे, और न उन्हें अपना कर देने की कोई चिंता रहती थी।
इसमें आश्चर्य नहीं कि उनके विरुद्ध कई अभियान भी किए गए। जौनपुर, मालवा व गुजरात दिल्ली से मुक्त हो चुके थे और वे आपस में संघर्ष कर रहे थे। मेवाती लोगों ने केंद्रीय शक्ति की कोई परवाह न की व अपना कर देना भी बंद कर दिया। खोखर लोगों ने भी आतंक उत्पन्न कर रखा था और वे मुल्तान व लाहौर में अराजकता फैला रहे थे।
अपना प्रभाव जमाने के लिए सरहिंद के तुर्क बच्चे भी षड्यंत्र रच रहे थे। विभिन्न प्रांतों में मुस्लिम प्रांताध्यक्ष परस्पर संग्राम में रत थे और उन्हें केंद्रीय सत्ता की कोई भी चिंता नहीं थी। सैनिक, महत्वकांक्षी तथा स्वार्थी राजनीतिज्ञ बहुत संख्या में निकल पड़े थे तथा वे इस अशांति को बढ़ावा दे रहे थे।
खिज्र खाँ द्वारा नई नियुक्तियां
सिंहासनारूढ़ होने के बाद खिज्र खां ने विभिन्न पदों का पुनर्गठन किया
मलिक-उस-शर्क मलिक तोफा– इसको वजीर का पद दिया गया और उसे ताज-उल-मुल्क की उपाधि दी गई। वह 1421 में अपनी मृत्यु तक वजीर का कार्य करता रहा।
सहारनपुर की जागीर सैय्यद सलीम को दे दी गई।
मुल्तान में फतेहपुर की जागीरें अब्दुर्रहीम को दे दी गईं।
दोआब का क्षेत्र इख्तियार खां को दे दिया गया।
मलिक सरवर को राजधानी का शहना नियुक्त कर दिया गया और उसे सुल्तान की अनुपस्थिति में राजपद संभालने का कार्य समर्पित किया गया।
मलिक दाऊद को राज्य का सचिव।
मलिक कालू को हाथियों का धारक नियुक्त किया गया।
मलिक खैरूद्दीन को आरिज-ए-मुमालिक नियुक्त कर दिया गया।
इसी प्रकार विभिन्न कुलीन सरदारों की उनके पदों व जागीरों पर नियुक्ति की पुष्टि कर दी गई।
खिज्र खाँ द्वारा विजय अभियान
कटेहर पर अभियान–-जब दोआब व कटेहर के हिंदुओं ने कर देना बंद कर दिया तो 1414 में कटेहर के विद्रोही राजा हरसिंह को उदंडता का दंड देने के लिए ताज-उल-मुल्क की अधीनता में एक सेना भेजी गई। राजा जंगलों में भाग गया, किंतु उसे आत्मसमर्पण करना पड़ा और भविष्य में कर देने की प्रतिज्ञा करनी पड़ी। निचले दोआब के जागीरदारों व हिंदू सरदारों को खिज्र खां को अपना स्वामी मानने पर बाध्य कर दिया गया।
यह ठीक कहा जाता है कि सैयद वंश के विवरण इसी प्रकार के अभियानों का इतिहास हैं। खिज्र खां उस वंश का सबसे अधिक शक्तिशाली शासक हुआ जिसका प्रभाव वैभव बहुत तेजी के साथ लुप्त हो गया। उस तक के शासनकाल में सैनिक शक्ति भूमि कर उगाहने का सामान्य साधन रही। आज्ञा तोड़ने वालों को विद्रोही नहीं माना गया और उन्हें केवल यही दंड दिया जाता था कि उनसे उधार धन वापस ले लिया जाए और भविष्य में उनसे ठीक भुगतान का वचन ले लिया जावे।
जुलाई 1416 में ताज-उल-मुल्क को बयाना व ग्वालियर विजय के लिए नहीं परंतु उस कर को उगाहने के लिए भेजा गया जिसका भुगतान कर दिया जाना चाहिए था और यह काम अभागे कृृषकों को लूट कर पूरा किया गया।
1418 में कटेहर के हरसिंह ने एक बार फिर विद्रोह कर दिया। ताज-उल-मुल्क ने उसे बुरी तरह हराया। कुमायूं की पहाड़ियों में उसका पीछा किया गया। जब ताज-उल-मुल्क उसे पकड़ने में असमर्थ रहा , उसने उन लोगों को लूट लिया जिनके बीच हरसिंह ने शरण ली थी।
कटेहर से ताज-उल-मुल्क इटावा की ओर चला। वहां उसने राजा सरवर को घेर लिया जिसने एक बार फिर उपद्रव मचा दिया था। ताज-उल-मुल्क दुर्ग को तो न पा सका परंतु उसने वहां की प्रजा को लूट लिया और दिल्ली वापस चल दिया। यह टिप्पणी की जाती है कि ताज-उल-मुल्क का यह कार्य शांति व्यवस्था की पुनः स्थापना हेतु कोई अभियान न होकर डाकुओं के सरदार द्वारा लूटमार के समान था। परिणाम यह हुआ कि लोगों में इतनी अशांति फैल गई कि उन्होंने इस बार फिर विद्रोह कर दिया।
खिज्र खाँ 6 महीने तक बदायूं घेरे रहा परंतु उस पर अधिकार जमाने में असमर्थ रहा। जून 1419 में खिज्र खां ने एक षड्यंत्र का पता लगा लिया जिसमें महाबत खाँ का भी हाथ था। षड्यंत्र के नेता कौम-उल-मुल्क व शख्तियार खा को मृत्युदंड दिया गया।
1420 में ताज-उल-मुल्क को कोयल व इटावा भेजा गया। राजा सरवर को उसके दुर्ग में घेर लिया गया परंतु इससे कोई सफलता नहीं मिली। देश के लोगों को पहले की भांति लूटा गया। जब सरवर ने यह वचन दिया कि भविष्य में वह नियमित रूप से कर दिया करेगा तो इससे शांति स्थापित हो गई। ताज-उल-मुल्क ने चंदाबार को भी लूटा तथा वहां से कर लिया।
मलिक तुगन विद्रोह करके जालंधर से सरहिंद की ओर चला जहां उसने प्रदेश को लूटने के बाद दुर्ग को घेर लिया। जब उसके विरुद्ध सेनाएं भेजी गईं तो उसने सरहिंद का घेरा उठा दिया और वहां से पलायन कर दिया। पीछा किया जाने पर उसे जसरथ खोखर के पास शरण लेनी पड़ी।
खिज्र खाँ की मृत्यु (20 मई 1421)
1421 में खिज्र खाँ मेवात में अपना अधिकार जमाने के लिए पहुंचा। उसने वहां पर बहादुर नाहिर के पुराने दुर्ग पर कब्जा करके उसे नष्ट कर दिया और बहुत से लोगों को अपनी अधीनता में कर लिया। ग्वालियर के राजा ने नियमित रूप से अपना कर अदा करने पर खोखला वचन देकर अपने प्रदेश में शांति को भंग होने से रोक लिया। खिज्र खां ने इटावा के शासक के विरुद्ध भी कदम उठाया, परंतु 20 मई 1421 में अपने पुत्र मुबारक खाँ को अपना उत्तराधिकारी बनाकर उसने प्राण त्याग दिए।
खिज्र खाँ का मूल्यांकन
खिज्र खां के शासन का मूल्यांकन करते समय यह कहा जा सकता है कि वह वस्तुतः एक सैय्यद था। बिना किसी बड़ी आवश्यकता के वह रक्त-पात करने में संकोच करता था। वह अपने शत्रुओं से प्रतिकार लेने की इच्छा नहीं रखता था। अपने सारे जीवन में वह अपने राज्य में उठने वाले विद्रोह का दमन करने में व्यस्त रहा और इसलिए वह सुधारात्मक कार्य संपन्न करने के योग्य न हो सका।
फरिश्ता खिज्र खां को निम्न शब्दों में सम्मान प्रदान करता है: “खिज्र खां एक महान व योग्य राजा था जो अपने वचन का सच्चा था; उसकी प्रजा के हृदय में में उसके लिए कृतज्ञतापूर्ण प्रेम था जिससे कि बड़े, छोटे स्वामी व सेवक सभी ने तीन दिन तक काली पोशाक में बैठकर उसकी मृत्यु का शोक मनाया और इसके बाद मातमी वस्त्रों को उतार कर उसके पुत्र मुबारक शाह को सिंहासन पर बैठाया।”
मुबारक शाह (1421-34)
खिज्र खां के बाद उसका पुत्र मुबारक शाह सिंहासन पर बैठा। उसके शासन काल का एक विस्तृत विवरण याहिया-बिन-अहमद द्वारा रचित तारीख-ए-मुबारक शाही में मिलता है। उसके साम्राज्य के समस्त भागों में विद्रोह रहे और उन्हें दबाने के लिए दंडात्मक अभियान किए।
उपाधि Title—– मुबारक शाह ने भी तैमूर के उत्तराधिकारियों को अपना स्वामी स्वीकार करना आवश्यक समझा। कोई आश्चर्य नहीं कि उसने अपने नाम के साथ शाह की उपाधि रखी। अपने सिक्कों पर उसने मुइज उद्दीन मुबारक शाह अंकित कराया। इस नए सुल्तान ने केवल खलीफा के प्रति निष्ठा रक्खी।
स्थानांतरणों की योजना
मुबारक शाह ने अपने बहुत से अमीरों व सरदारों को उनकी रियासतों व जागीरों पर स्थाई रूप से नियुक्त कर दिया जिनको वे पिछले शासनकाल से संभालते आ रहे थे। फिर भी उसने अमीरों व सरकारों को एक जागीर से दूसरी जागीर में स्थानांतरित करने की योजना का अनुसरण किया। ऐसा करके उसने कदाचित वह भय दूर कर दिया जो कोई सरदार या अमीर अपनी स्थानीय जागीर में शक्ति के प्रभाव से उत्पन्न कर सकता था। परंतु यह उद्देश्य शासन प्रबंध की कुशलता हेतु काफी खर्चीला से हुआ। इसने अमीरों व सरदारों को असंतुष्ट कर दिया। यह नीति भी आंशिक रूप से उसकी हत्या के उत्तरदायी है।
जसरथ खोखर
मुबारक शाह के शासनकाल को जसरथ खोखर के कृत्यों ने अव्यवस्था में रक्खा। तारीखे-मुबारक शाही में यह कहा जाता है कि “जसरथ खोखर एक मूढ़ गंवार था। अपनी विजय के नशे में आकर वह अपनी सेनाओं की शक्ति से फूल कर वह दिल्ली के स्वप्न देखने लगा था। जब उसने खिज्र खां की मृत्यु के विषय में सुना तो उसने व्यास वह सतलुज नदी को पार किया और घुड़सवार और पैदल सेना की सहायता से तलवंडी पर राय कमालुद्दीन मईन पर आक्रमण किया। राय फिरोज उसके सामने ही रेगिस्तान की ओर भाग गया। तब जसरथ ने लुधियाना नगर से लेकर सतलुज के निकट रोपड़ के आस-पास तक का क्षेत्र लूट लिया।”
इसके बाद उसने सरहिंद के दुर्ग पर घेरा डाला परंतु उसे पा न सका। जब मुबारक शाह समाना की ओर बढ़ा जसरथ ने सरहिंद का घेरा उठा लिया और लुधियाना चला गया। जब उसका पीछा किया गया तो वह पहाड़ों की ओर भाग गया। सुल्तान के दिल्ली वापस आने पर दशरथ ने रावी नदी पार की और लाहौर की तरफ अग्रसर हुआ।
जसरथ का लाहौर के प्रांताध्यक्ष ने विरोध किया परंतु वहां से वह कालानौर चला गया और फिर वहां से उसने पहाड़ों की ओर प्रस्थान किया। जसरथ ने एक बार फिर विद्रोह किया और संग्राम में अपने पुराने शत्रु जम्मू के राजा भीम को परास्त करके उसका अंत कर दिया और लाहौर व दीपालपुर के नगर को अधिकार में लेकर लूट लिया। सिकंदर तोहफा उसके विरूद्ध बढ़ा परंतु वह उसे और अधिक विस्तृत की तैयारी करने में अनियंत्रित छोड़ कर चला आया।
जसरथ ने जालंधर पर आक्रमण किया, किंतु उसे पा न सका, फिर भी उसने जिले को लूटकर उसके बहुत से लोगों को दास बना लिया। जसरथ को पराजित करके पहाड़ों की ओर भगा दिया गया। जसरथ ने मुबारक शाह की कठिनाइयों से लाभ उठाते हुए विद्रोह कर दिया। जालंधर की ओर जाकर और वहां से लाहौर जाकर उसने नगर का घेरा डाल दिया। परंतु जसरथ को एक बार फिर घेरा हटाना पड़ा और अपनी रक्षा हेतु पहाड़ो में शरण लेनी पड़ी। 1432 में एक बार फिर जसरथ ने विद्रोह किया ,किन्तु उसे पहले की भांति पहाड़ियों में खदेड़ दिया गया।
मुबारक शाह के शासनकाल में दोआब में भी विद्रोह उठ खड़े हुए। 1423 में मुबारक शाह कटेहर पहुंचा और वहां उसने स्थानीय सरदारों को सिर झुकाने व मालगुजारी देने पर विवश कर दिया। कम्पिला व इटावा के राठौरों का दमन कर दिया गया । जल्लू व कट्टू के नेतृत्व में मेवातियों ने विद्रोह कर दिया, परंतु जब उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया तो उन्हें क्षमा कर दिया गया
जौनपुर (Jaunpur)
बियाना के प्रांताध्यक्ष मुहम्मद खाँ के विद्रोह को दबा दिया गया। एक बड़ी सेना लेकर इब्राहीम शर्की काल्पी के विरुद्ध बढ़ा। उसका भाई इटावा पहुंचा। मुबारकशाह ने जौनपुर के शासक के विरूद्ध अपनी सेनायें भेजीं। चूँकि कोई भी लड़ाई करना नहीं चाहता था, इसलिए सैनिक कार्यवाही को कुछ समय तक चौकियों की सीमाओं तक ही सीमित रक्खा गया।
अप्रैल 1428 में इब्राहिम शर्की ने संग्राम के लिए अपनी सेना संगठित की और मुबारक शाह ने उस क्षेत्र में सेना के नेतृत्व के वास्ते अपने सरदारों को भेजा। दोपहर से सूर्य अस्त तक दोनों सेनाएं उत्कट उत्साह से लड़ती रहीं, इसलिए कोई भी निर्णयात्मक परिणाम नहीं निकल सका। इसके बाद दोनों सेनाएं अपने-अपने शिविरों में चली गईं। अगले दिन इब्राहिम शर्कीजौनपुर की ओर भागा, कुछ दूर तक उसका पीछा भी किया गया लेकिन बाद में मुबारक शाह ने पीछा रोक देने का आदेश दिया।
पौलाद का विद्रोह
पौलाद तुर्क बच्चा के विद्रोह पर भी थोड़ा प्रकाश डालना आवश्यक होगा। विद्रोही सैयद सलीम का दास था। वह बहुत से साथियों को इकट्ठा करने योग्य हो गया और तब उसने भटिंडा के दुर्ग में अपना संगठन किया। पौलाद इस शर्त पर आत्मसमर्पण करने पर तैयार हो गया कि सुल्तान उसको मृत्युदंड न देगा। लेकिन उसने मूर्खता से अपने एक नौकर के इन शब्दों पर विश्वास कर लिया कि सुल्तान का वचन अविश्वसनीय है। उसने अपना विरोध बनाए रक्खा।
पौलाद ने काबुल के प्रांताध्यक्ष अमीर शेखजादा अली मुगल और खोखर सरदारों से सहायता मांगी। काबुल के प्रांताध्यक्ष के सरहिंद पहुंचने पर शाही सेनाएं पीछे हट गईं। पौलाद ने अमीर शेखजादा अली को दो लाख टंके तथा अन्य उपहार दिए। अमीर शेखजादा अली ने व्यावहारिक अर्थ में सारे पंजाब को लूट भी लिया। उसने मलिक सिकंदर से एक साल का भूमि कर लिया और फिर दीपालपुर की तरफ बढ़ा। मुल्तान के आस-पास का इलाका लूट लिया गया।
अंत में अमीर शेखजादा अली हार गया और अपने बुरी दशा को देखते हुए काबुल भाग गया जबकि उसकी सेना वहीं रह गई। पौलाद भी पराजित होने पर मार दिया गया। नवंबर 1433 में सुल्तान के पास उसका सिर लाया गया।
1432 में मुबारक शाह ने मेवात पर आक्रमण किया जहां जलाल खाँ ने एक बार फिर विद्रोह कर रक्खा था। उसने उसे एक दुर्ग से दूसरे दुर्ग तक खदेड़ा और वह पिछले करो को देने व भविष्य के भुगतान के लिए अपने वचन देकर शांति स्थापित करने पर विवश हो गया।
मुबारक शाह वध- जब मुबारक शाह ने देखा कि सरवर-उल-मुल्क पिछले कुछ समय से वजीर की तरह अपने कार्यों का संतोषजनक संपादन नहीं कर रहा है तो उसने कमाल-उल-मुल्क को अपना सहायक इस आशा से नियुक्त कर दिया कि दोनों लोग मिलकर काम करेंगे। परंतु इसमें उसको निराशा हाथ लगी। अधिक योग्य अधिक कार्यशील कमाल-उल-मुल्क के प्रभाव नें सरवर-उल-मुल्क के प्रभाव को लुप्त कर दिया।
सरवर ने अपने इस दमन के प्रति रोष प्रकट किया। “अब उसके विचार क्रांति की ओर मुड़ गए। दीपालपुर की जागीर से वंचित किए किए जाने ने उसके हृदय में कांटे की भांति चोट पहुंचाई थी और इसलिए अब उसका मस्तिष्क राज्य में किसी प्रकार की क्रांति करने पर टिका हुआ था।”
सुल्तान की हत्या के उद्देश्य से वह कांगू व कांची खत्तरी के पुत्रों से मिला और तब षडयंत्र रचा गया। जब मुबारक शाह मुबारकबाद में निर्माण की प्रगति का निरीक्षण करने पहुंचा तो वहां कांगू के पौत्र सिद्धपाल ने 20 फरवरी 1434 को उस पर आक्रमण किया और सुल्तान के सिर पर इतने जोर से तलवार मारी की एक ही झटके में वह भूमि पर गिर कर मर गया। रानू व अन्य हिंदू आगे बढ़े और उन्होंने खूनी काम को पूरा कर दिया। मुस्लिम इतिहासकार ने बड़े मार्मिक एवं संक्षिप्त रूप में अपने आश्रयदाता का गुणगान इन शब्दों में किया है “वह एक दयालु एवं उदार शासक था, जो महान गुणों से पूर्ण था।”
मुहम्मद शाह 1434-44
जब मुबारक शाह का वध हुआ, उसके कोई पुत्र नहीं था। आत: अमीरों व सरदारों ने मुहम्मद शाह को गद्दी पर बिठाया जो उसके भाई फरीद का पुत्र था। यह ठीक है कि मुबारक शाह की हत्या में सरवर-उल-मुल्क के हाथ का सबको पता था, परंतु उसके विरुद्ध कोई भी कदम उठाना संभव नहीं था। क्योंकि उस समय उसकी शक्ति बढ़ी हुई थी।
यद्यपि यह संदेह किया गया कि वह गद्दी पर अपनी आंखें गड़ाए हैं, तथापि उसे पद पर रक्खे जाने की पुष्टि करना आवश्यक पाया गया। उसने खाने-जहान की उपाधि पाई। उसके साथियों को भी उचित पुरस्कार मिले। अपने विरोधियों का अंत करने के लिए सरवर-उल-मुल्क ने उच्च श्रेणी के एक अधिकारी की हत्या कर दी व अन्य को बंदी बना लिया। उसने राज्य की सारी खाली जगहों पर अधिकार जमा लिया और उन्हें अपने ही लोगों में वितरित कर दिया।
बियाना, अमरोहा, नारनौल को कुहराम और दोआब के कुछ जिलों को सिंधांरन, सिद्धपाल व उसके अन्य संबंधियों को दे दिया गया जिनका स्वर्गीय सुल्तान की हत्या में हाथ था। उन सरदारों ने सरवर-उल-मुल्क को उलट फेंकने की तैयारी की जो अब जागीरदार थे और सरवर ने उनके दमन के लिए एक सेना का संगठन किया।
दिल्ली के नगर के सामने एक युद्ध में विद्रोहियों ने सरवर-उल-मुल्क की सेनाओं को परास्त कर दिया और तीन महीने तक सीरी में उसको घेरे रहे। घेरे के दिनों में सरवर-उल-मुल्क को ज्ञात हुआ कि सुल्लान की सहानुभूति भी विद्रोहियों के साथ है और जिनका विचार उसकी हत्या करना है। मुहम्मद शाह अपने संरक्षकों के साथ आया और उसके साथियों ने सरवर की हत्या कर दी। उन्होंने मीरां सदर के पुत्रों की भी हत्या कर दी।
सिद्धपाल ने अपने परिवार सहित जलकर आत्महत्या कर ली। सिंधारन व अन्य खत्रियों को जीवित पकड़ लिया गया और उनकी हत्या कर दी गई। सरवर-उल-मुल्क के उलट फेंके जाने का फल यह हुआ कि कमाल-उल-मुल्क वजीर बन गया और उसे कमाल खां की उपाधि प्राप्त हुई। अन्य विद्रोहियों को भी पुरस्कार दिए गये।
सरवर-उल-मुल्क के पतन के समय तक मुहम्मद शाह गुटबन्दियों का शिकार व परिस्थितियों के हाथों में एक खिलौना रहा, परंतु जब उसे शासन क्षेत्र में अपनी योग्यता प्रदर्शित करने का अवसर मिला तो उसने उसका इतना दुरुपयोग किया कि उसने उन लोगों तक का विश्वास व प्रेम खो दिया जिन्होंने उसे उसके शत्रुओं से मुक्त किया था।
देश के विभिन्न भागों से विद्रोह के समाचार आए परंतु उसके विरूद्ध कोई भी कदम उठाने के स्थान पर मुहम्मद शाह अपनी राजधानी में भोग-विलास का जीवन व्यतित करने में संलग्न रहा। इसी समय सरहिन्द मे प्रांताध्यक्ष बहलोल लोदी के निदेशन सम्बधी गुण स्पष्ट हुए। उसने धीरे-धीरे सारे पंजाब पर अपना प्रभाव फैलाया और वह भूमि-कर अदा होने से रोकता रहा जो शाही कोष में जमा होना चाहिए था।
अब मुहम्मद शाह की सत्ता पानीपत के आगे न रही। मेवात के कबीलों ने नगर की दीवारों के थोड़े फासले के भीतर देश में लूट मचा दी। 1440-41 में मालवा का महमूद खलजी दिल्ली की ओर बढ़ा और मुहम्मद शाह ने बहलोल लोदी से सहायता की याचना मी। बहलोल लोदी ने अपनी सहायता का मूल्य माँगते हुए दिल्ली के प्रांताध्यक्ष हिसाम खाँ की मृत्यु की इच्छा प्रकट की क्योंकि वह उसे अपना एक भयानक विरोधी व गद्दी का प्रबल समर्थक मानता था।
यह शर्त पूरी हुई और बहलोल लोदी ने मुहम्मद शाह की सहायता के लिए अपनी सेनाएं भेजीं। दोनों सेनाएं दिल्ली व तुगलकाबाद के बीच संग्राम करने लगीं। संग्राम दोपहर को शुरू हुआ और बिना किसी निर्णायात्मक अन्त के रात के आने तक चलता रहा। फिर दोनों सेनाएं अपने-अपने शिविरों में वापस चली गईं।
शांति के लिए विचार-विनिमय शुरू हो गया और एक समझौता होने पर जब महमूद शाह की सेना वापस लौटने लगी तो बहलोल लोदी ने उसके पृष्ठ भाग पर आक्रमण कर दिया और कुछ लूटमार भी की। बहलोल का यह तुच्छ प्रयत्न मालवा की सेना पर विजय में परिणित हो गया और मुहम्मद शाह ने उसको पुत्र तुल्य मान देकर सम्मान प्रदान किया क उसे खानखानाँ की उपाधि भी दी।
बहलोल लोदी ने मुहम्मद शाह के प्रति निष्ठा रक्खी और सुल्तान ने उसे दीपालपुर व लाहौर के क्षेत्र दे दिए। बहलोल लोदी ने जसरथ खोखर पर चढ़ाई करने का निश्चय किया। परंतु बाद में उससे समझौता कर लिया। जब उसने यह देखा कि खोखर सरदार उसके दिल्ली के सिंहासन पर कब्जा जमाने के उद्देश्यों के विरुद्ध नहीं हैं।
बहलोल ने अपनी जाति के बहुत अफगानों को सेना में भर्ती किया। कुछ बातों पर उसने मुहम्मद शाह से संघर्ष उत्पन्न कर लिया और फिर आगे बढ़कर दिल्ली को घेर लिया। परंतु वह उस पर अधिकार जमाने में असमर्थ रहा तो वह अपने प्रदेश वापस लौट गया और अपने को सुल्तान बेहलोल जताने लगा।
आलमशाह 1444-51 (अलाउद्दीन गद्दी)
जब 1444 में मुहम्मद शाह की मृत्यु हो गई तो उसका पुत्र अलाउद्दीन गद्दी पर बैठा जिसने आलमशाह की उपाधि धारण की। यह नया सुल्तान अपने पिता से भी अधिक कमजोर निकला किंतु इस पर भी उसके सिंहासन आरोहण को बहलोल ने स्वीकार कर लिया। 1447 में आलमशाह बदायूं गया। उसे यह नगर इतना अच्छा लगा कि उसने दिल्ली की जगह वहां ही रहना अच्छा समझा।
आलमशाह ने अपने किसी संबंधी को दिल्ली का प्रांताध्यक्ष बना दिया और 1448 से स्थायी रूप से वह वहीं रहा। वहां उसने अपने को पूर्णतया विलासी जीवन में डाल दिया। दिल्ली से आलमशाह के चले जाने के बाद उन लोगों के बीच संघर्ष छिड़ गया जो उसका शासन चला रहे थे। हिसाम खाँ व हामिद खां दिल्ली के भाग्य के निर्णायक बन गए। विभिन्न व्यक्तियों के अभियाचनाओं पर विचार किया गया और अंत में बहलोल लोदी को ही चुना गया।
बहलोल लोदी को दिल्ली आमंत्रित किया गया। उसने निमंत्रण इतनी जल्दी स्वीकार किया कि वह दिल्ली में अपनी शक्ति जमाने के लिए काफी सेना तक साथ नहीं लाया। उसने हामिद खां से नगर की कुंजियां लीं। उसने बदायूं में आलम शाह को एक पत्र भी लिखा और उसका उत्तर यह मिला कि उसे अपनी गद्दी से कोई लाभ या फल की आशा नहीं है। उसके पिता ने बहलोल को अपना पुत्र मान लिया था इसलिए उसने स्वतंत्र रूप से व प्रसन्नता के साथ बहलोल, अपने बड़े भाई, के पक्ष में अपना सिंहासन त्याग दिया।
इस प्रकार जब 19 अप्रैल 1451 को बहलोल का सिंहासनारोहण हुआ तो उसने सिंहासन के लिए किसी सफल गुट की सहायता से ही प्राप्त नहीं किया, अपितु एक ऐसे सुल्तान के उत्तराधिकारी के रूप में भी प्राप्त किया जिसने ऐच्छिक रूप से अपनी गद्दी का परित्याग कर दिया था। आलम शाह 1478 में अपनी मृत्यु के समय तक बदायूं में ही रहा।







