Sanskrit Literature: मध्यकालीन भारत (लगभग 600 ई. से 1700 ई. तक) एक ऐसा समय था जब संस्कृत साहित्य अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचा। इस काल में संस्कृत न केवल विद्वानों की भाषा बनी रही, बल्कि राजाश्रय प्राप्त कर विभिन्न विधाओं में फलीफूली। यद्यपि, क्षेत्रीय भाषाओं जैसे हिंदी, तमिल, तेलुगु आदि का तेजी से विकास हुआ, जिसके कारण संस्कृत धीरे-धीरे पुरोहित वर्ग तक सिमट गई।
इस युग की रचनाओं में भाषाई परिष्कार, उच्च कोटि की काव्य शैली और विषयगत विविधता ने इसे चिरस्थाई बना दिया। राजाओं जैसे भोज, यशपाल, सोमेश्वर, कुलशेखर, रविवर्मन, विग्रहराज, बल्लालसेन, श्रीहर्ष (नैषधचरित महाकाव्य के रचयिता) ने स्वयं महत्वपूर्ण ग्रंथ रचे। इस लेख में हम मध्यकालीन संस्कृत साहित्य की प्रमुख विधाओं, ग्रंथों और लेखकों का विस्तृत अध्ययन करेंगे।

Sanskrit Literature: मध्यकालीन संस्कृत साहित्य
मध्यकालीन भारत में संस्कृत साहित्य ने महाकाव्य, ललित काव्य, नाटक, चंपू शैली, उपदेशात्मक कथाएँ, शब्दकोश, व्याकरण, काव्यशास्त्र, नाट्यशास्त्र, छंदशास्त्र, चिकित्सा शास्त्र, धर्मशास्त्र, स्मृति, पुराण और इतिहासपरक साहित्य जैसी अनेक विधाओं में विविधता दिखाई। यह काल भक्ति आंदोलन, जैन-बौद्ध प्रभाव और इस्लामी संस्कृति के मिश्रण से प्रभावित था। दक्षिण भारत में अलवार और नयनार भक्ति कवियों ने तमिल में योगदान दिया, लेकिन संस्कृत में रामानुज, माधव, वल्लभ जैसे आचार्यों ने अद्वैत दर्शन पर ग्रंथ लिखे।
संस्कृत की रचनाएँ मुख्यतः रामायण, महाभारत और पौराणिक कथाओं पर आधारित थीं, लेकिन नवीनताएँ जैसे द्विसंधान (दोहरी व्याख्या) और श्लेष अलंकार ने इसे रोचक बनाया। इस युग में विद्वान जैसे अभिनवगुप्त, आनंदवर्धन और मम्मट ने सिद्धांत प्रतिपादित किए।
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महाकाव्य और प्रमुख काव्य रचनाएँ
इस काल की काव्य रचनाएँ पौराणिक कथाओं से प्रेरित थीं, लेकिन मौलिकता का अभाव होने के बावजूद भाषा की सुंदरता ने इन्हें विशिष्ट बनाया। कुछ प्रमुख ग्रंथ निम्नलिखित हैं:
- कप्पहरणअभ्युदय: बौद्ध कवि शिवस्वामिन द्वारा रचित, कप्प की कथा पर आधारित।
- पार्श्वअभ्युदय: जैन आचार्य जिनसेन द्वारा रचित, पार्श्वनाथ की जीवनी।
- यशोधराचरित: कनकसेन द्वारा रचित, यशोधर की वीरगाथा।
- रामचरित: संध्याकर नंदी द्वारा रचित (मूल लेख में अभिनंदन का उल्लेख त्रुटिपूर्ण हो सकता है), राम और बंगाल शासक रामपाल की श्लेषपूर्ण कथा।
- युधिष्ठिर विजय और त्रिपुरदहन: वासुदेव द्वारा रचित महाकाव्य।
- भारत मंजरी और रामायण मंजरी: कश्मीर के कवि क्षेमेंद्र द्वारा संक्षिप्तीकृत महाकाव्य।
यह तथ्य शायद आपको भी पता न हो- धनंजय और श्रुतकीर्ति का राघव-पांडवीय एक अनोखा द्विसंधान ग्रंथ है, जहाँ बाएँ से दाएँ पढ़ने पर रामकथा और दाएँ से बाएँ पर कौरवों की कथा प्रकट होती है।
चंपू शैली का प्रादुर्भाव और रचनाएं
दसवीं शताब्दी में चंपू शैली (गद्य-पद्य मिश्रित) का विकास हुआ, जो काव्य को अधिक जीवंत बनाती थी। प्रमुख रचनाएँ:
- नलचंपू (दमयंती कथा) और मदालसा चंपू: त्रिविक्रमभट्ट द्वारा रचित।
- यशस्तिलक चंपू: सोमदेव द्वारा रचित।
यह शैली दक्षिण भारतीय साहित्य में विशेष रूप से लोकप्रिय रही।
ललित काव्य और नाटक
ललित काव्य में भावुकता और प्रेम का चित्रण प्रमुख था। गीत गोविंद जयदेव द्वारा रचित सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है, जिसमें राधा-कृष्ण प्रणय को सरसता से वर्णित किया गया है। विद्वान इसे ‘भावप्रधान नाटक‘ कहते हैं।
नाटक विधा में:
- मुद्राराक्षस: विशाखदत्त द्वारा रचित, चाणक्य की राजनीतिक कथा।
- प्रबोधचंद्रोदय: कृष्णमिश्र द्वारा रचित, दार्शनिक नाटक।
- अनर्घ राघव: मुरारी द्वारा रचित, रामकथा पर आधारित।
- परीक्षाकरुण: भीमभट्ट द्वारा रचित, चाणक्य कथा पर।
- विक्रांतकौरव और सुभद्राहरण: जैन विद्वान हस्तिमल्ल द्वारा।
- बाल रामायण और बाल भवन: राजशेखर द्वारा।
नाट्यशास्त्र ग्रंथ जैसे दशरूपक (धनंजय) और नाट्यदर्पण (रामचंद्र) ने इस विधा को सैद्धांतिक आधार दिया।
उपदेशात्मक कथाएँ और नीति ग्रंथ
उपदेशात्मक साहित्य में नैतिकता और सामाजिक मार्गदर्शन प्रमुख था:
- कुट्टनीमतम्: दामोदरगुप्त द्वारा, गणिकाओं के लिए उपदेश।
- मल्लट शतक और नीतिवाक्यामृत: मल्लट द्वारा।
नीति ग्रंथ: लघु-अर्हन्नीति (हेमचंद्र, धर्म-युद्ध-दंड-प्रायश्चित पर), शुक्रनीतिसार और नीतिरत्नाकर (चंडेश्वर)।
शब्दकोश और व्याकरण ग्रंथ
भाषाई परिष्कार के लिए शब्दकोश महत्वपूर्ण बने:
- अभिधान रत्नमाला: हलायुध।
- धातुप्रदीप: मैत्रेयरक्षित।
- शब्दानुशासन: शकटायन।
- वैजयंति: यादवप्रकाश।
- धातुवृत्ति: क्षीरस्वामिन।
- पदमंजरी: हरदत्त।
काव्यशास्त्र: सिद्धांतों का समृद्धि
मध्यकाल काव्यशास्त्र का स्वर्ण युग था। प्रमुख ग्रंथ:
- काव्यालंकार संग्रह: उद्भट।
- काव्यालंकार सूत्र: वामन।
- काव्यालंकार: रुद्रट।
- ध्वन्यालोक: आनंदवर्धन (ध्वनि सिद्धांत)।
- काव्यमीमांसा: राजशेखर।
- काव्यप्रकाश: मम्मट।
- सरस्वतीकंठाभरण: भोज।
ये ग्रंथ अलंकार, रस और ध्वनि जैसे तत्वों पर गहन चर्चा करते हैं।
चिकित्सा शास्त्र और विज्ञान ग्रंथ
संस्कृत में चिकित्सा पर उल्लेखनीय योगदान:
- रोगविनिश्चय: माधवकर।
- निघंटु: धन्वंतरि।
- रसरत्नाकर: नागार्जुन।
- चिकित्साशास्त्र: चक्रपाणिदत्त।
- लौहपद्धति: सुरेश्वर।
- शालिहान्न: भोज द्वारा रचित (घोड़ों की चिकित्सा)।
गणित-ज्योतिष: गणितसार, ब्रह्मस्फुटसिद्धांत, आर्यभट्टीय, सिद्धांतशिरोमणि (भास्कराचार्य), राजमृगांक।
संगीत शास्त्र
संगीत पर:
- संगीतमकरंद: नारद।
- संगीतचूड़ामणि: जगदेकमल्ल।
- मानसोल्लास: सोमेश्वर।
- संगीत रत्नाकर: शारंगदेव।
ऐतिहासिक साहित्य
इतिहास लेखन में:
- हर्षचरित: बाणभट्ट।
- नवसाहसांकचरित: पद्मगुप्त।
- विक्रमांकदेवचरित: बिल्हण।
- राजतरंगिणी: कल्हण (कश्मीर इतिहास)।
- कुमारपालचरित: क्षेमेंद्र।
- पृथ्वीराजरासो: चंदबरदाई (हिंदी प्रभावित, लेकिन संस्कृत आधार)।
अतिरिक्त: विद्यारण्य का पंचदशी (अद्वैत दर्शन), सायण का वेद-भाष्य।
निष्कर्ष: मध्यकालीन संस्कृत साहित्य का स्थायी महत्व
मध्यकालीन संस्कृत साहित्य ने भारतीय संस्कृति को धार्मिक, वैज्ञानिक और सौंदर्यबोध से समृद्ध किया। भक्ति आंदोलन के साथ क्षेत्रीय भाषाओं का उदय होने पर भी, संस्कृत ने विद्या का प्रकाशक बनाए रखा। आज भी ये ग्रंथ प्रेरणा स्रोत हैं।







