Genghis Khan History: चंगेज़ ख़ाँ (तेमुजिन) इतिहास के सबसे क्रूर और शक्तिशाली विजेताओं में से एक थे। उन्होंने 13वीं शताब्दी में मंगोल साम्राज्य की स्थापना की, जो काले सागर से प्रशांत महासागर तक फैला—लगभग 24 मिलियन वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में। चीन, मध्य एशिया, ईरान, पूर्वी यूरोप, रूस के बड़े हिस्से, और यहां तक कि ऑस्ट्रिया, हंगरी, पोलैंड तक उनके सैनिक अभियान पहुंचे। लेकिन 1221 में सिंधु नदी के किनारे पहुंचकर उन्होंने भारत पर आक्रमण का फैसला त्याग दिया और वापस लौट गए। उसने ऐसा क्यों किया? यह घटना इतिहास में एक रहस्य बनी हुई है। आइए विस्तार से समझते हैं कि इसके पीछे क्या कारण थे?

| जानकारी | विवरण |
|---|---|
| पूरा नाम | तेमुजिन (बाद में चंगेज़ खान) |
| जन्म | 1162 ई., मंगोलिया (बैकाल झील के निकट) |
| मृत्यु | 1227 ई., मंगोलिया |
| साम्राज्य का आकार | लगभग 2.4 करोड़ वर्ग किलोमीटर (दुनिया का सबसे बड़ा सन्निकट साम्राज्य) |
| प्रमुख उपलब्धि | मंगोल कबीलों का एकीकरण; एशिया, यूरोप के बड़े हिस्से पर विजय |
| धर्म | शामानी (आसमान की पूजा) |
| उपाधि | चंगेज़ खान (1206 ई. में प्राप्त, अर्थ: ‘महासागर जैसा विजेता’) |
लगभग आठ सौ वर्ष पूर्व, एक साधारण मंगोल खानाबदोश ने एशिया के विशाल भूभाग पर अपना साम्राज्य फैला दिया। काला सागर से लेकर प्रशांत महासागर तक फैला उनका साम्राज्य इतना विस्तृत था कि आज भी इतिहासकार इसे देखकर दंग रह जाते हैं। इस विजेता का नाम था तेमुजिन, लेकिन दुनिया उन्हें चंगेज़ खान के रूप में याद करती है। लेकिन यह आश्चर्य की बात है कि इस महान विजेता ने चीन, मध्य एशिया, ईरान और पूर्वी यूरोप को जीतने के बावजूद भारत की ओर बढ़ते हुए सिंधु नदी पर रुक क्यों गए? आइए, इस रहस्य को खोलते हैं।
चंगेज खान (Genghis Khan) का जन्म और कठिन शुरुआत
सन् 1162 में, बैकाल झील के किनारे एक दुर्गम, पहाड़ी इलाके में एक योद्धा परिवार में तेमुजिन का जन्म हुआ। मंगोल लोककथाओं के अनुसार, उनके जन्म के समय उनकी मुट्ठी में खून का एक थक्का था, जिसे उन्होंने एक महान योद्धा के संकेत के रूप में देखा। लेकिन भाग्य ने उनके साथ शुरुआत से ही खिलवाड़ किया। उनके पिता येसुगे को एक दुश्मन कबीले ने ज़हर देकर मार डाला, और नन्हा तेमुजिन अपनी माँ और भाई-बहनों के साथ जंगल में भटकने को मजबूर हो गया। गरीबी, भूख और अपमान ने उनके बचपन को कठिनाइयों से भर दिया।
| संबंधी | नाम | विवरण |
|---|---|---|
| पिता | येसुगे | मंगोल सरदार, तातार कबीले द्वारा ज़हर दिए जाने से मृत्यु (तब तेमुजिन 9 वर्ष के) |
| माता | होएलुन | मजबूत योद्धा महिला, परिवार को संभाला; तेमुजिन की प्रेरणा स्रोत |
| पत्नी | बोर्ते | अपहरण के बाद मुक्ति; चार पुत्रों की माँ; चंगेज़ की सबसे प्रिय |
| पुत्र 1 | जोची | सबसे बड़ा पुत्र; बोर्ते के अपहरण के कारण पितृत्व पर संदेह |
| पुत्र 2 | चगताई | कट्टर मंगोल; इस्लाम के प्रति शत्रुता के लिए जाना जाता |
| पुत्र 3 | ओगेदेई | उत्तराधिकारी; चंगेज़ के बाद खान बना |
| पुत्र 4 | टुलुई | सबसे छोटा; मंगोल सेना का प्रमुख कमांडर |
| अन्य | कसर (बहन) | योद्धा गुणों वाली; युद्धों में सहायक |
खान शब्द सुनकर कई लोग उन्हें मुस्लिम समझ लेते हैं, लेकिन चंगेज़ एक शुद्ध मंगोल थे, जो शामानी धर्म के अनुयायी थे। इसमें आकाश देवता ‘तेन्ग्री’ की पूजा प्रमुख थी। उन्होंने कभी पढ़ना-लिखना नहीं सीखा, लेकिन जीवन की कठोरता ने उन्हें एक कठोर योद्धा बना दिया। तेरह साल की उम्र में उन्होंने अपने सौतेले भाई बेहतेर की हत्या कर दी, जो परिवार में उत्तराधिकार की लड़ाई का प्रतीक था। इतिहासकारों का मानना है कि यह घटना उनकी जन्मजात क्रूरता को दर्शाती है।
विस्तृत मंगोल साम्राज्य का उदय
चालीस की उम्र पार करते ही चंगेज़ ने अपने कबीलों को एकजुट करना शुरू किया। उन्होंने परंपरागत मंगोल संरचना को नया रूप दिया – दस, सौ, हजार सैनिकों के दस्तों में संगठित सेना। उनकी रणनीति में धोखा, तेज़ घुड़सवार हमले और मनोवैज्ञानिक दबाव प्रमुख थे। 1206 में उन्हें ‘चंगेज़ खान‘ की उपाधि मिली, जिसका अर्थ है ‘महासागर जैसा विजेता’।

चंगेज खान द्वारा लड़े गए प्रमुख युद्ध
| वर्ष | युद्ध/अभियान | विरोधी/क्षेत्र | परिणाम |
|---|---|---|---|
| 1206-1209 | मंगोल एकीकरण | विभिन्न मंगोल कबीले | सभी कबीलों का एकीकरण; चंगेज़ को खान घोषित |
| 1209-1215 | तांगुत युद्ध | पश्चिमी शिया (तांगुत) साम्राज्य | राजधानी पर कब्जा; भारी कर वसूली |
| 1211-1215 | जिन राजवंश पर आक्रमण | उत्तरी चीन (जिन साम्राज्य) | राजधानी झोंगदू पर घेराबंदी; जिनों की हार |
| 1219-1221 | ख्वारिज्म आक्रमण | मध्य एशिया (ख्वारिज्म शाह) | साम्राज्य का विनाश; लाखों मौतें; जलालुद्दीन का पीछा भारत तक |
| 1220-1221 | अफगानिस्तान/भारत अभियान | जलालुद्दीन मिंगबर्नू | बाजौर लूटी; सिंधु नदी पर रुकावट; भारत में प्रवेश न करना |
| 1222-1223 | क्वारिस्मियन अवशेष | पूर्वी यूरोप (रूस/यूक्रेन) | काल्का नदी की लड़ाई; रूसी राजकुमारों की हार |
| 1226-1227 | तांगुत विद्रोह | पश्चिमी शिया (दूसरा अभियान) | विद्रोह दमन; चंगेज़ की मृत्यु के दौरान |
उनके नेतृत्व में मंगोलों ने चंगचुन साम्राज्य को नेस्तनाबूद कर दिया, फिर ख्वारिज्म शाहों के विशाल साम्राज्य पर कब्जा किया। ईरान, अफगानिस्तान, रूस के मैदानों तक उनकी युद्ध की तलवारें चमकीं। इतिहासकार एफ.डब्ल्यू. क्राउच ने लिखा है कि उनका साम्राज्य अफ्रीका जितना विशाल था, रोमन साम्राज्य से कहीं बड़ा। सिकंदर या नेपोलियन के पास विरासत में मिली सेनाएँ थीं, लेकिन चंगेज़ ने शून्य से सब कुछ गढ़ा। उनकी सेना ने ऑस्ट्रिया से जापान तक डर फैलाया, लेकिन भारत? वहाँ वे रुक गए।
चंगेज़ की शख्सियत: प्रतिभा और क्रूरता का मिश्रण
चंगेज़ लंबे कद-काठी के, बिल्ली जैसी आँखों वाले योद्धा थे। ईरानी इतिहासकार मिन्हाज-ए-सिराज ने उन्हें ‘देवतुल्य सेनापति‘ कहा, लेकिन दुश्मनों के लिए ‘निर्दयी राक्षस’। एक बार जमुगा के युद्ध में ज़हरीला तीर उनकी गर्दन में लग गया। उनके वफादार कमांडर जेल्मे ने ज़हर चूसा, लेकिन चंगेज़ ने बाद में कहा, “तुम इसे दूर क्यों नहीं थूक सके?” यह उनकी कृतघ्नता दिखाता है।
वे दूरदर्शी थे, मानव स्वभाव को भेदने वाले। रूसी इतिहासकार जॉर्ज वर्नाडस्की के अनुसार, वे रणनीतिक जीनियस थे, लेकिन कमांडर के रूप में कम प्रभावी। गुस्से में वे पत्रों को भी नष्ट कर देते। एक बार ख्वारिज्म के सुल्तान को धमकी भरा पत्र लिखवाया, लेकिन लिपिक ने भाषा नरम की तो चंगेज़ ने उसे फटकारा। उनकी पत्नी बोर्ते का अपहरण हुआ, जो उनके जीवन का दाग रहा। फिर भी, उनके राजनीतिक कौशल को कोई चुनौती नहीं दे सका।
भारत की ओर अभियान: सीमा से वापसी
1220-21 में, ख्वारिज्म के अंतिम सुल्तान जलालुद्दीन मिंगबर्नू के पीछे चंगेज़ अफगानिस्तान से भारत की ओर बढ़े। उन्होंने पेशावर, बाजौर और खैबर को लूटा, सिंधु नदी तक पहुँच गए। जलालुद्दीन ने बहादुरी से मुकाबला किया, लेकिन हार गए। चंगेज़ ने उन्हें सिंधु में कूदते देखा, लेकिन पीछा नहीं किया।
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भारत की सीमा से लौटे चंगेज खान?
सन् 1211 से 1216 तक के पांच वर्षों में चंगेज खान ने मंगोलिया से दूर चीन पर विजय का लक्ष्य साधा। लेकिन जलालुद्दीन का पीछा करते हुए वे भारत की सीमा तक पहुँच गए। चंगेज और जलाल की सेनाओं के बीच अंतिम युद्ध सिंधु नदी के तट पर लड़ा गया।
चंगेज ने जलाल की सेना को तीन ओर से घेर लिया, जबकि उनकी पीठ के पीछे सिंधु की तेज धारा बह रही थी। विल्हेल्म बारथोल्ड अपनी पुस्तक तुर्किस्तान डाउन टू द मंगोल इनवेशन में वर्णन करते हैं: “जलाल ने अपनी सभी नौकाएँ नष्ट करवा दीं ताकि सैनिक मैदान छोड़कर न भागें। चंगेज के पास सैनिकों की अधिकता थी, लेकिन संकुचित इलाके में तीरंदाज़ी कठिन हो रही थी, इसलिए तलवारबाज़ी पर निर्भर होना पड़ा। जलाल ने चंगेज के प्रथम हमले को विफल कर दिया।”
मोहम्मद नेसावी के अनुसार, जब मंगोलों का दबाव बढ़ा, तो जलालुद्दीन ने अपने घोड़े सहित 180 फीट गहरी सिंधु नदी में छलांग लगा दी। 250 गज़ चौड़ी नदी पार कर वे दूसरे तट पर पहुँच गए। चंगेज ने उनकी वीरता देखकर तीरंदाज़ों को निशाना न लेने का आदेश दिया, लेकिन उनके साथियों को बख्शा नहीं। अधिकांश साथियों को मंगोल तीरों ने मार गिराया। जलाल के सभी पुत्रों और पुरुष रिश्तेदारों को चंगेज ने मृत्युदंड दिया।
भारत की गर्मी ने किया परेशान
जलालुद्दीन दिल्ली पहुँचे, लेकिन सुल्तान इल्तुतमिश ने मंगोल हमले के भय से उन्हें शरण देने से इनकार कर दिया। जलाल भारत में ही छिपे रहे जब तक चंगेज ने उनका पीछा छोड़ न दिया। निश्चिंत होकर जलाल सिंधु के मुहाने से नौका द्वारा समुद्री मार्ग से ईरान पहुँचे।
चंगेज के आक्रामक इतिहास को देखते हुए आश्चर्यजनक था कि उन्होंने भारत में घुसपैठ न की। फ्रैंक मैकलेन लिखते हैं: “चंगेज ने बाला और दोरबी दोक्श्न के नेतृत्व में दो छोटी टुकड़ियाँ भारत भेजीं। उन्होंने सिंध पार कर लाहौर और मुल्तान पर हमला किया, लेकिन मुल्तान पर कब्ज़ा न कर सके। कारण थी भारत की असहनीय गर्मी, जिसके वे बिल्कुल अभ्यस्त न थे।”
इल्तुतमिश ने जलाल को शरण न दी, लेकिन चंगेज को भी प्रोत्साहन न दिया। जॉन मैक्लॉयड की हिस्ट्री ऑफ इंडिया में उल्लेख है: “इल्तुतमिश ने चंगेज के अनुरोध पर न तो हाँ कहा, न ना। चंगेज ने उनकी मंशा समझ ली—वे युद्ध नहीं चाहते। चंगेज भी इल्तुतमिश से टकराव के मूड में न थे।” द्र विंक की स्लेव किंग्स एंड द इस्लामिक कॉन्क्वेस्ट में कहा गया: “भारत की गर्मी चंगेज के लिए असह्य थी, जिसने सिपहसालारों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।”
घोड़ों और चारे की कमी
चंगेज की दूसरी समस्या थी घोड़ों की। इब्न बतूता के अनुसार, मंगोल सेना के 10,000 घोड़ों वाली टुकड़ी को प्रतिदिन 250 टन चारा और 2.5 लाख गैलन पानी चाहिए। सिंध और मुल्तान में पानी था, लेकिन चारा दुर्लभ। उच्च कोटि के घोड़ों की कमी से अतिरिक्त इंतजाम असंभव था।
चंगेज ने इतनी विशाल भूमि जीत ली थी कि नियंत्रण के लिए सैनिक कम पड़ रहे थे। सैनिकों के स्वास्थ्य का संकट भी था। फ्रैंक मैकलेन लिखते हैं: “कई सैनिक बुखार और स्थानीय बीमारियों से ग्रस्त हो गए। भारत के जंगलों और पहाड़ों पर खुफिया जानकारी नाकाफी थी। चंगेज अंधविश्वासी थे—सैनिकों ने एक गैंडे को देखा, जिसे अपशकुन माना गया। इन सबके बीच चंगेज ने मंगोलिया लौटने का फैसला किया।”
चंगेज का अंतिम संदेश
जुलाई 1227 तक चंगेज का स्वास्थ्य बिगड़ गया। एक दिन उन्होंने अपने पुत्रों और विश्वसनीय जनरलों को बुलाया। मंगोलों को बताया गया कि उन्हें बुखार है, लेकिन निकटजन जानते थे कि उनकी आयु समाप्ति पर थी।
आर. डी. थैक्सटन की द हिस्ट्री ऑफ मंगोल्स में वर्णन है: “मृत्युशैया पर चंगेज ने पुत्रों से कहा, ‘जीवन क्षणभंगुर है। मैं पूरी दुनिया न जीत सका। तुम्हें यह कार्य पूरा करना है। मैं तुम्हें संसार का सबसे विशाल साम्राज्य सौंप रहा हूँ। इसकी रक्षा संगठन से ही संभव है। यदि तुम परस्पर कलह करोगे, तो यह हाथ से फिसल जाएगा।'”
चंगेज़ खान की विरासत
चंगेज़ 1227 में मरे, लेकिन उनका साम्राज्य तैमूर और बाबर तक पहुँचा। भारत न जीत पाने से सीख मिली: हर भूमि हर योद्धा के लिए नहीं। वे क्रूर थे, लेकिन दूरदर्शी। आज, उनका नाम डर और प्रशंसा दोनों का प्रतीक है। क्या अगर वे भारत आते, तो इतिहास बदल जाता? शायद, लेकिन प्रकृति ने फैसला किया।
स्रोत: बीबीसी
चंगेज खान के बारे में कुछ रोचक और कम ज्ञात तथ्य
- चंगेज उनका असली नाम नहीं था: उनका जन्म लगभग 1162 में तेमुजिन नाम से हुआ था, जिसका अर्थ ‘लोहे का’ या ‘लोहार’ होता है। 1206 में उन्हें ‘चंगेज खान’ की उपाधि मिली, जहां ‘खान’ का मतलब ‘नेता’ या ‘शासक’ है और ‘चंगेज’ का अर्थ ‘सर्वोच्च शासक’ या ‘सार्वभौमिक शासक’ है।
- उनका बचपन बेहद कठिन था: नौ साल की उम्र में उनके पिता को तातारों ने जहर दे दिया। कबीले ने परिवार को निकाल दिया, और मां ने सात बच्चों को अकेले पाला। वे शिकार करके जीवित रहे, संभवतः अपने सौतेले भाई की हत्या भोजन के झगड़े में की, किशोरावस्था में अपहरण के बाद गुलाम बने लेकिन भाग निकले।
- उनके रूप का कोई निश्चित रिकॉर्ड नहीं है: कोई समकालीन चित्र नहीं बचा। वर्णन अलग-अलग हैं, लेकिन वे लंबे-तगड़े, लंबे बालों और घनी दाढ़ी वाले बताए जाते हैं। 14वीं सदी के फारसी इतिहासकार रशीद अल-दीन ने उन्हें लाल बाल और हरी आंखों वाला कहा, जो मंगोलों में असामान्य था।
- उनके सबसे भरोसेमंद सेनापति पूर्व शत्रु थे: चंगेज योग्यता के आधार पर पदोन्नति देते थे। 1201 में ताइजुत योद्धा ने उनके घोड़े को तीर मारा, लेकिन चंगेज ने उसे बख्शा और ‘जेबे’ (तीर) नाम से भर्ती किया। जेबे और सुबुताई प्रमुख कमांडर बने।
- वे कभी कोई दुश्मनी निपटाए बिना नहीं छोड़ते थे: 1219 में ख्वारेज्म शाह ने मंगोल दूतों की हत्या की तो चंगेज ने साम्राज्य नष्ट कर दिया, लाखों की हत्या की। तांगुतों ने सहायता अस्वीकार की तो उनकी राजधानी लूटी और राज परिवार को मार डाला।
- उनकी वजह से 40 मिलियन लोगों की मौत हुई: उनके नेतृत्व में मंगोल विजयों ने करीब 40 मिलियन लोगों को मारा, जिससे चीन की आबादी में लाखों की कमी आई और विश्व आबादी 11% तक घटी।
- वे विभिन्न धर्मों के प्रति सहिष्णु थे: उन्होंने धार्मिक स्वतंत्रता दी और पूजा स्थलों को कर-मुक्त किया। शैमेनिक विश्वासों के साथ ईसाई, बौद्ध, मुस्लिम आदि सह-अस्तित्व में थे।
- उन्होंने पहली अंतरराष्ट्रीय डाक प्रणाली स्थापित की: ‘याम’ कूरियर सेवा से सवार 200 मील प्रतिदिन तय करते, जो संचार, जासूसी और व्यापारियों की सुरक्षा के लिए थी।
- उनकी मृत्यु और कब्र का रहस्य: 1227 में मृत्यु हुई, संभवतः घोड़े से गिरने, मलेरिया या अन्य कारण से। कब्र बुर्कान खालदुन पर्वत के पास छिपाई गई, गवाहों को मारकर।
- सोवियतों ने मंगोलिया में उनकी स्मृति मिटाने की कोशिश की: सोवियत शासन में उनका नाम प्रतिबंधित, किताबों से हटाया गया। 1990 के बाद स्वतंत्रता पर बहाल, मुद्रा और हवाई अड्डे पर नाम।
- जन्म के समय मुट्ठी में खून का थक्का: चंगेज का जन्म मुट्ठी में खून के थक्के के साथ हुआ, जिसे शक्तिशाली पकड़ का शुभ संकेत माना गया।
- जेनेटिक विरासत: दुनिया के पुरुषों में लगभग 0.5% चंगेज खान के वंशज हैं, जो उनकी व्यापक संतान से जुड़ा है।
- यासा कानून संहिता: उन्होंने यासा नामक कानूनी कोड बनाया, जो जन्म के बजाय योग्यता पर जोर देता था और महिलाओं की बिक्री तथा चोरी पर प्रतिबंध लगाता था।







