पहले प्रधानमंत्री: यह वो ऐतिहासिक पल था, जब 1946 के तनावपूर्ण माहौल में हिमाचल के शिमला में कैबिनेट मिशन के साथ ब्रिटिश अधिकारियों और भारतीय नेताओं की बातचीत चल रही थी। स्वतंत्रता की खुशबू महकने लगी थी, लेकिन कांग्रेस के अंदर एक आंतरिक बहस चल रही थी।
एक तरफ सरदार वल्लभभाई पटेल – वह लोह पुरुष, जिन्होंने संगठन को मजबूत बनाया, किसानों को एकजुट किया और भारत छोड़ो आंदोलन में जेल की सलाखों के पीछे भी हार नहीं मानी।
दूसरी तरफ जवाहरलाल नेहरू – वह आधुनिक विचारक, जिनकी अंतरराष्ट्रीय छवि और ब्रिटिश शिक्षा उन्हें राजनीतिक वार्ताओं का चेहरा बनाती थी। और बीच में महात्मा गांधी – वह संत, जिनके एक इशारे पर सब कुछ बदल सकता था।
यह हम किसी कहानी की बात नहीं कर रहे, बल्कि, राष्ट्र निर्माण की नींव रखने वाली राजनीतिक साजिश और त्याग की ऐतिहासिक घटना का जिक्र कर रहे हैं। एक ऐसी बहस जो अक्सर सवाल उठाती है कि पटेल की जगह नेहरू कैसे देश के पहले प्रधानमंत्री बने? चाहिए इसी बहस को ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखते हैं सच क्या है?

स्वतंत्रता की दहलीज पर खड़ी कांग्रेस: पृष्ठभूमि
द्वितीय विश्व युद्ध के समाप्त होते ही भारत में स्वतंत्रता आंदोलन और सत्ता हस्तांतरण की हलचल तेज हो गई। ब्रिटिश सरकार कैबिनेट मिशन भेज चुकी थी, जो संविधान सभा और अंतरिम सरकार के ढांचे पर चर्चा करने आई।
अन्ततः कांग्रेस को छह साल बाद अपना आंतरिक चुनाव कराना पड़ा। 1940-41 का सविनय अवज्ञा आंदोलन, नेताओं की जेल यात्राएं, 1945-46 के प्रांतीय चुनाव और कैबिनेट मिशन की वजह से यह चुनाव टलता चला गया था।
आमतौर पर कांग्रेस अध्यक्ष का पद प्रतीकात्मक होता था, लेकिन 1946 में यह एकदम भिन्न था। अध्यक्ष ही अंतरिम सरकार का नेतृत्व करने वाला था, जो स्वतंत्र भारत का पहला प्रशासनिक चेहरा बनने वाला था। यह चुनाव सिर्फ पदाधिकारी चुनने का नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य का नेतृत्व चुनने वाला था।
उस समय कांग्रेस के पास 15 प्रांतीय समितियां (PCC) थीं। इनमें से 12 ने सरदार पटेल का नाम प्रस्तावित किया। पटेल की लोकप्रियता जगजाहिर थी – गुजरात के किसान आंदोलन से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर संगठन निर्माण तक, वे कांग्रेस की रीढ़ थे। उनकी उम्र 71 वर्ष थी, लेकिन ऊर्जा ऐसी कि युवा नेता भी फीके पड़ जाते।
वहीं, नेहरू का नाम किसी PCC ने आगे नहीं बढ़ाया। लेकिन नेहरू अंतरराष्ट्रीय पटल पर चमकते थे – ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया‘ जैसी किताबें लिख चुके, मुसलमानों के एक वर्ग में सद्भावना रखते, लेकिन संगठनात्मक मोर्चे पर पटेल जितने मजबूत नहीं माने जाते।
कांग्रेस मौजूदा अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम आजाद भी दोबारा चुनाव लड़ना चाहते थे। तीसरा नाम आचार्य जेबी कृपलानी का था, जो कांग्रेस के महासचिव थे। लेकिन किसे पता था कि यह चुनाव बिना एक भी वोट डाले निर्णायक हो जाएगा?
गांधी का पत्र और नेहरू की प्राथमिकता: आंतरिक कलह की शुरुआत
20 अप्रैल 1946 को महात्मा गांधी ने मौलाना आजाद को एक व्यक्तिगत पत्र लिखा। एक अखबार में आजाद के दोबारा अध्यक्ष बनने की खबर छपी थी, जिस पर गांधी को आपत्ति हुई। उन्होंने लिखा, “आज की परिस्थितियों में अगर मुझसे पूछा जाए, तो मैं जवाहरलाल नेहरू को प्राथमिकता दूंगा। इसके कई कारण हैं, लेकिन उन्हें क्यों गिनाऊं?” यह पत्र इतिहास का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।
गांधी को पटेल के 12 PCC समर्थन की पूरी जानकारी नहीं थी जब उन्होंने यह लिखा। लेकिन उनकी पसंद स्पष्ट थी – नेहरू। क्यों? गांधी का मानना था कि ब्रिटिशों से सत्ता छीनने का समय है, और इसके लिए नेहरू ज्यादा उपयुक्त हैं।
नेहरू की हैरो और कैम्ब्रिज की शिक्षा, बैरिस्टर की ट्रेनिंग उन्हें नेगोशिएशन टेबल पर मजबूत बनाती। पटेल, जितने सख्त प्रशासक, उतने ही कठोर – मुसलमानों के एक वर्ग में उनकी छवि सकारात्मक नहीं थी।
नेहरू की अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि भारत को वैश्विक मंच पर मजबूत मजबूत नेतृत्व प्रदान कर सकती थी। गांधी ने बाद में सार्वजनिक रूप से कहा, “जब तक अंग्रेजों से सत्ता छीनी जा रही है, जवाहरलाल की जगह कोई और नहीं आ सकता।”
गांधी ने नेहरू और पटेल को एक-दूसरे के पूरक बताया। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा, “वे सरकारी गाड़ी में जुते हुए दो बैलों जैसे होंगे। एक को दूसरे की जरूरत होगी, और दोनों मिलकर खींचेंगे।” यह गांधी की दूरदर्शिता थी – व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को राष्ट्रहित के आगे झुकाना।

नामांकन से नाम वापसी तक: इतिहास की परतें
29 अप्रैल नामांकन की अंतिम तारीख थी। तीन आधिकारिक उम्मीदवार: पटेल, नेहरू और कृपलानी। लेकिन 25 अप्रैल को कांग्रेस कार्यकारी समिति (CWC) की बैठक में कृपलानी ने नेहरू का नाम प्रस्तावित किया। उन्होंने एक कागज पर सर्कुलेट किया, जिसमें सदस्यों ने हस्ताक्षर किए – पटेल समेत। कृपलानी बाद में अपनी किताब गांधी: हिज लाइफ एंड थॉट में पछतावा जताते हैं: “मुझे लगता है कि नामांकनों की जानकारी होने के बावजूद महासचिव के तौर पर मुझे यह पहल नहीं करनी चाहिए थी।”
27 अप्रैल को आजाद ने सार्वजनिक बयान दिया: “बदली हुई परिस्थितियों में इन कर्तव्यों को निभाने के लिए सबसे उपयुक्त व्यक्ति पंडित जवाहरलाल नेहरू हैं।” नेहरू हैरान थे। उन्होंने कहा, “मौलाना आजाद ने कल ही पहली बार यह बात मुझसे कही… मैं गहराई से आभारी हूं।” गांधी ने नेहरू से कहा, “कोई PCC ने आपका नाम आगे नहीं बढ़ाया, सिर्फ वर्किंग कमिटी ने।” नेहरू चुप रहे – यह चुप्पी उनके दूसरे नंबर पर रहने से इनकार के रूप में समझी गई।
फिर आया वो पल जिसने भारत की भविष्य का निर्णय कर दिया। 7 मई को कृपलानी ने नाम वापस ले लिया। 9-10 मई के बीच पटेल ने भी। गांधी ने पटेल को पत्र पर हस्ताक्षर करवाया। पटेल ने बिना विरोध के कर दिया। राजमोहन गांधी की किताब पटेल: ए लाइफ में लिखा है कि पटेल के करीबियों ने कहा, “यह नाम वापसी उन्हें गहराई से चोट पहुंचाई।”
नेहरू के जीवनीकार माइकल ब्रेचर ने लिखा, “अगर गांधी ने हस्तक्षेप न किया होता, तो पटेल भारत के पहले वास्तविक प्रधानमंत्री होते। सरदार को यह पुरस्कार नहीं मिला और यह बात उन्हें बहुत खटकती थी।”
लेकिन एक हफ्ते बाद, पटेल गांधी समेत सबको हंसाते नजर आए – शायद त्याग की वह मुस्कान जो इतिहास में अमर हो गई। उनकी बेटी मणिबेन पटेल की डायरी (16 सितंबर 1948) में उल्लेख है कि गांधी ने कहा था, “कोई प्रांत ने नेहरू का नाम नहीं बढ़ाया,” जो पहले की किताबों में छूट गया था।
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परिणाम: नेहरू का युग, पटेल का त्याग
10 मई को नेहरू निर्विरोध अध्यक्ष बने। एक महीने बाद, वायसराय ने उन्हें अंतरिम सरकार बनाने का न्योता दिया। इस तरह नेहरू भारत के पहले प्रधानमंत्री बने। पटेल उपप्रधानमंत्री बने, लेकिन वह मौका हाथ से निकल गया जो शायद उनका वास्तविक हक था। यह चुनाव दर्शाता है कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर राष्ट्र की एकता थी। पटेल की संगठन क्षमता ने बाद में 562 रियासतों को एकजुट किया, जबकि नेहरू ने आधुनिक भारत की नींव रखी।
निष्कर्ष: एक सबक जो आज भी प्रासंगिक
आज जब राजनीतिक बहसें ‘वोट चोरी’ जैसे शब्दों से सजती हैं, तो 1946 का यह चुनाव याद दिलाता है कि सच्ची नेतृत्व क्षमता त्याग में है। गांधी की पसंद ने नेहरू को चुना, लेकिन पटेल का समर्थन नेहरू को मजबूत बनाता रहा। यह कहानी सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि एक मानवीय सबक है – जब राष्ट्र बुलाए, तो व्यक्तिगत सपने पीछे छोड़ दो। अगर पटेल प्रधानमंत्री होते, तो शायद भारत का नक्शा अलग होता, लेकिन नेहरू के नेतृत्व ने हमें वैश्विक पटल पर पहचान दी। यह सियासत की कला थी – न लड़ाई, बल्कि समझौते की। क्या आप मानते हैं कि यह निर्णय सही था? इतिहास के पन्नों से निकलकर सोचिए।
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