सिंधु घाटी सभ्यता का रहस्यमयी पतन: आईआईटी वैज्ञानिकों की नई खोज से नया खुलासा

By Santosh kumar

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सिंधु घाटी सभ्यता (Sindhu Ghati Sabhyata) जिसे हम सिंधु-सरस्वती सभ्यता के नाम से भी जानते हैं, दुनिया की सबसे प्राचीन शहरी संस्कृतियों में से एक थी। लगभग 5,000 से 3,500 साल पहले उत्तर-पश्चिम भारत और पाकिस्तान के विशाल क्षेत्र में फैली यह सभ्यता अपनी उन्नत शहरी नियोजन, जल निकासी प्रणालियों, धातु कला और व्यापारिक नेटवर्क के लिए प्रसिद्ध रही।

हड़प्पा, मोहनजो-दारो, राखीगढ़ी और लोथल जैसे शहरों में बनी नालियां आज भी इंजीनियरिंग की मिसाल हैं, जबकि ‘नृत्य करती लड़की‘ जैसी कांस्य मूर्तियां उसकी कलात्मक ऊंचाइयों को दर्शाती हैं। लेकिन यह चमकदार सभ्यता अचानक गायब कैसे हो गई? लंबे समय से इतिहासकार और पुरातत्वविद इस सवाल से जूझ रहे हैं।

अब आईआईटी गांधीनगर के वैज्ञानिकों, जिसमें विमल मिश्रा और उनके साथियों की एक नई स्टडी ने इस रहस्य पर फिरसे रोशनी डाली है। उनके अनुसार, यह कोई अचानक आई तबाही नहीं थी, बल्कि निरंतर सूखे की मार ने धीरे-धीरे इस सभ्यता को समाप्त कर दिया। आइए, इस खोज को विस्तार से समझें और जानें कि यह आज के समय के लिए क्या सबक देती है।

सिंधु घाटी सभ्यता का पतन

सभ्यता का उदय: कैसे बनी एक विकसित शहरी सभ्यता | Sindhu Ghati Sabhyata

सिंधु नदी इस सभ्यता का जीवन रेखा थी। इसकी जलधारा ने कृषि, व्यापार और दैनिक जीवन को पोषित किया। लोग गेहूंजौ जैसी फसलों की खेती करते थे, जो मानसून की मेहरबानी पर निर्भर थी। शहरों में स्नानघर, गोदाम और सड़कें इतनी व्यवस्थित थीं कि आज के शहरों को भी शर्मिंदगी हो जाए। व्यापार के जरिए मेसोपोटामिया तक मसाले, कपड़े और आभूषण पहुंचते थे। लेकिन लगभग 4,200 साल पहले यह सब बदलने लगा। वैज्ञानिकों के मुताबिक, जलवायु में आए परिवर्तन ने सब कुछ उलट-पुलट कर दिया।

सूखे की मार: आईआईटी अध्ययन का मुख्य निष्कर्ष

आईआईटी गांधीनगर के प्रोफेसर विमल मिश्रा के नेतृत्व में की गई इस रिसर्च को ‘कम्युनिकेशंस अर्थ एंड एनवायरनमेंट‘ जर्नल में प्रकाशित किया गया है। यह 11 पेज की विस्तृत रिपोर्ट है, जो बताती है कि सभ्यता के पतन का मुख्य कारण लगातार सूखा था। अध्ययन में पाया गया कि:

  • सभ्यता के दौरान औसत वार्षिक वर्षा 10-20% कम हो गई, जबकि तापमान में करीब 0.5 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हुई।
  • चार प्रमुख सूखे पड़े, प्रत्येक 85 साल से ज्यादा लंबा, जिनमें सबसे गंभीर सूखा 164 साल तक चला। इसने सभ्यता के 91% क्षेत्र को प्रभावित किया।
  • आखिरी सूखा 3,531 से 3,418 साल पहले आया, जो पूरे एक सदी तक चला। इसी दौरान बड़े शहर खाली हो गए और लोग छोटे-छोटे ग्रामीण समुदायों में बिखर गए।

ये सूखे भारतीय ग्रीष्मकालीन और शीतकालीन मानसून की अनियमितता से उपजे थे। वैज्ञानिकों ने हाई-रेजोल्यूशन क्लाइमेट मॉडल्स का इस्तेमाल कर हजारों साल पुरानी वर्षा और नदी प्रवाह की सिमुलेशन की। गुफाओं के स्टैलक्टाइट्स (चूना पत्थर की बूंदें) और झीलों के तलछट से मिले प्रमाणों ने इन मॉडल्स की पुष्टि की। झीलों का जल स्तर गिरा, नदियां सूखीं, और कृषि संकट गहरा गया।

सिंधुघाटी सभ्यता के लोग

पुरातात्विक स्थलों से मिले सुराग: भिर्राना से राखीगढ़ी तक

अध्ययन में भिर्राना, राखीगढ़ी और 4एमएसआर जैसे स्थलों का जिक्र है, जो सूखे की चपेट में आए। राखीगढ़ी में खुदाई से मिले पौधों के अवशेष बताते हैं कि लोग गेहूं-जौ से बाजरा जैसी सूखा-सहनशील फसलों की ओर मुड़े। लेकिन यह बदलाव पर्याप्त न था।

हड़प्पा और मोहनजो-दारो जैसे शहरों में नदी किनारों पर बसे लोग भी पानी की कमी से जूझे। पहले लोग वर्षा वाले इलाकों में रहते थे, लेकिन सूखे ने उन्हें सिंधु की ओर धकेल दिया। वहां भी नदियों का बहाव कम होने से संकट बढ़ा। पुरातत्वविदों को मिले हड्डी और मिट्टी के नमूनों से पता चला कि यह पतन धीमा था—शहर खाली होते गए, लेकिन सभ्यता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई, बल्कि छोटे गांवों में बदल गई।

यह भी पढ़िए: सिंधु सभ्यता: क्षेत्रफल, विशेषताएं, सबसे बड़ा स्थल, ग्रिड पद्धति, पतन के कारण | Indus Civilization History in Hindi

वैश्विक कारक: एल नीनो और अटलांटिक की ठंडक ने बढ़ाई मुसीबत

सिर्फ स्थानीय मौसम ही नहीं, वैश्विक घटनाओं ने भी इसके पतन में निर्णायक भूमिका निभाई। एल नीनो की वजह से प्रशांत महासागर गर्म हुआ, जिससे भूमि-समुद्र तापमान अंतर कम हो गया। इससे मानसून कमजोर पड़ा। उत्तरी अटलांटिक में ठंडक ने वायुमंडलीय परिसंचरण को बिगाड़ दिया, नमी का बहाव रुक गया। ये कारक मिलकर सूखे को लंबा खींचते रहे। स्टडी कहती है कि यह कोई एकाकी घटना नहीं, बल्कि जटिल पर्यावरणीय दबावों का नतीजा था।

पुरानी थ्योरी से भिन्न: कोई अचानक तबाही नहीं

पहले इतिहासकार आक्रमण, बाढ़ या ज्वालामुखी विस्फोट जैसी अचानक आपदाओं को जिम्मेदार ठहराते थे। लेकिन यह अध्ययन इनसे सहमति नहीं रखता। यह बताता है कि पतन धीरे-धीरे हुआ—लोगों ने प्रवास किया, फसलें बदलीं, लेकिन लंबे सूखे ने समाज को तोड़ दिया। आर्थिक दबाव (व्यापार रुकना) और सामाजिक बदलाव (शहरों का विघटन) ने इसे और जटिल बना दिया। नतीजा? एक विशाल सभ्यता छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट गई।

वर्तमान के लिए सबक: जलवायु परिवर्तन की चेतावनी

यह खोज सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि भविष्य की चेतावनी है। आज जब जल संकट और ग्लोबल वॉर्मिंग हमें घेर रही है, सिंधु सभ्यता का पतन याद दिलाता है कि जटिल समाज पर्यावरणीय तनाव के आगे कितने नाजुक होते हैं। लेकिन एक सकारात्मक बात यह है कि पेलियो-क्लाइमेट विशेषज्ञों का मानना है कि 21वीं सदी में ग्लोबल वार्मिंग से भारतीय मानसून में वर्षा बढ़ सकती है। इससे वर्तमान संकट कुछ हद तक कम हो सकता है। जरूरी है कि हम जल प्रबंधन, फसल विविधीकरण और जलवायु अनुकूलन पर ध्यान दें—जैसे सिंधु के लोग ने कोशिश की थी।

निष्कर्ष: इतिहास से सीखना ही बचाव है

सिंधु घाटी सभ्यता का अंत दुखद है, लेकिन इसकी कहानी हमें मजबूत बनाती है। आईआईटी वैज्ञानिकों की यह स्टडी न सिर्फ रहस्य सुलझाती है, बल्कि हमें सोचने पर मजबूर करती है कि हमारी सभ्यता अगले सूखे का सामना कैसे करेगी। अगर हमने समय रहते कदम उठाए, तो इतिहास दोहराना टाल सकते हैं। यह खोज साबित करती है कि विज्ञान पुरानी पहेलियों को हल कर वर्तमान को बेहतर बना सकता है। (स्रोत: आईआईटी रिसर्च पेपर, 2025 & NDTV)

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