Article 48 Cow Protection: भारत के संविधान निर्माण के दौरान गाय संरक्षण का मुद्दा एक ऐसा विषय था, जिसने धार्मिक भावनाओं, आर्थिक हितों और सांस्कृतिक मूल्यों को एक साथ जोड़ा। स्वतंत्रता के ठीक बाद, जब देश विभाजन की आग में जल रहा था, संविधान सभा में गाय पर बहस ने सभा के सदस्यों को दो भागों में बांट दिया। एक तरफ हिंदू बहुमत की धार्मिक आस्था थी, तो दूसरी तरफ अल्पसंख्यकों के अधिकार और वैज्ञानिक दृष्टिकोण।
इसी बहस का नतीजा था संविधान का आर्टिकल 48, जो राज्य को गायों और उपयोगी पशुओं के संरक्षण का निर्देश देता है। अगर आप संविधान सभा में गाय संरक्षण बहस या आर्टिकल 48 क्यों जोड़ा गया सर्च कर रहे हैं, तो यह आर्टिकल आपके लिए है। हम यहां ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, प्रमुख तर्क, बहस के मुख्य बिंदु और इसके प्रभावों को विस्तार से समझाएंगे।

गाय संरक्षण का ऐतिहासिक परिचय
भारत में गाय को ‘गौ माता’ मानने की परंपरा वैदिक काल ( गाय को अघन्या, यानी जिसको मारा न जाये) से चली आ रही है। हिंदू, जैन, बौद्ध और पारसी धर्मों में गाय का पवित्र स्थान है। ब्रिटिश काल में गौ-हत्या को हिंदू-मुस्लिम दंगों का कारण बनाया गया। उदाहरण के लिए, 1930 में आगरा और कानपुर की कांग्रेस मीटिंग्स में ब्रिटिशों पर हजारों गायों की हत्या का आरोप लगाया गया। इतिहासकार इयान कोपलैंड अपनी रिसर्च में बताते हैं कि गाय की शुद्धता को राष्ट्र की शुद्धता से जोड़ा गया, और ब्रिटिशों को हिंदू मूल्यों के खिलाफ दिखाया गया।
स्वतंत्रता के बाद, 1947 के विभाजन ने हिंदू दक्षिणपंथी ताकतों को मजबूत किया। पाकिस्तान बनने के बाद, वे मानते थे कि भारत अब हिंदू आदर्शों पर चलेगा, जिसमें गाय संरक्षण शामिल है। अगस्त 1947 में दिल्ली में एक पब्लिक कन्वेंशन ने संविधान में गौ-हत्या रोकने का प्रस्ताव पास किया। गोरक्षा सभा जैसी संस्थाओं के अलावा, उद्योगपति रामकृष्ण डालमिया ने गोवक निवाक संघ बनाया, जो विधायी प्रयासों का केंद्र बना। महात्मा गांधी ने भी गाय संरक्षण को गांवों की आत्मनिर्भरता से जोड़ा, लेकिन वे इसे धार्मिक न बनाकर आर्थिक मुद्दा मानते थे।
संविधान सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद को नेहरू से पत्रों के जरिए इस मुद्दे पर सलाह ली गई। नेहरू ने लिखा, “भारत एक संयुक्त देश है, हमें सावधानी बरतनी होगी।” लेकिन दबाव इतना था कि मुद्दा सभा में आ गया।
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संविधान सभा में गाय पर बहस
संविधान सभा में गाय संरक्षण बहस मुख्य रूप से 24 नवंबर 1948 को हुई, जब मौलिक अधिकारों पर चर्चा चल रही थी। मूल ड्राफ्ट संविधान (1948) में यह प्रावधान नहीं था। पूर्वी पंजाब के सदस्य पंडित ठाकुर दास भार्गव ने ड्राफ्ट आर्टिकल 38-ए का संशोधन पेश किया, जिसमें गायों, बछड़ों और उपयोगी पशुओं की हत्या पर रोक का जिक्र था। भार्गव ने आर्थिक तर्क दिए: “कृषि और पशुपालन एक-दूसरे पर निर्भर हैं।
गाय दूध, गोबर और खेती के लिए जरूरी है। भारत में प्रति व्यक्ति दूध की खपत सिर्फ 7 औंस है, जबकि अमेरिका में 35। बिना गाय संरक्षण के स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था सुधरेगी नहीं।”
बहस 14 नवंबर 1949 को फिर हुई, जब एक सदस्य ने ड्राफ्टिंग कमेटी पर अनुच्छेद बदलने का आरोप लगाया। बहस में धार्मिक विभाजन साफ दिखा: अधिकांश हिंदू सदस्य समर्थन में, मुस्लिम सदस्य विरोध में। सभा में 200 से ज्यादा सदस्य थे, लेकिन इस मुद्दे पर 50 से अधिक ने भाग लिया।
| प्रमुख सदस्य | पक्ष/विपक्ष | मुख्य तर्क |
|---|---|---|
| पंडित ठाकुर दास भार्गव | पक्ष | आर्थिक: दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए जरूरी। सांस्कृतिक: हिंदू संस्कृति का हिस्सा। |
| सेठ गोविंद दास | पक्ष | धार्मिक: गाय हत्या हिंदू धर्म पर हमला। मुसलमानों को ‘हृदय जीतने’ का मौका। |
| विश्वंभर दयाल त्रिपाठी | पक्ष | मौलिक अधिकारों में शामिल करने की मांग। |
| फ्रैंक एंथनी | विपक्ष | ‘पीछे के दरवाजे से’ धार्मिक प्रावधान। |
| मुस्लिम सदस्य (जैसे अबुल कलाम आजाद के समर्थक) | विपक्ष | धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन। आर्थिक बोझ: बूढ़े पशु अर्थव्यवस्था पर भार। |
| जवाहरलाल नेहरू | तटस्थ लेकिन समर्थन | राज्य नीति का हिस्सा, लेकिन धार्मिक न बनाएं। |
बहस में हिंदू सदस्यों ने कहा कि गाय हत्या ‘हिंदू धर्म पर आक्रमण’ है। मुस्लिम सदस्यों ने शक जताया कि आर्थिक तर्क धार्मिक भावनाओं को छिपाने का बहाना है। एक मुस्लिम सदस्य ने कहा, “वृद्ध पशु अर्थव्यवस्था का बोझ हैं, उन्हें मारना उचित है।” इतिहासकारों के अनुसार, यह बहस सांप्रदायिक रेखाओं पर बंटी, जो विभाजन के घावों को दर्शाती है।
Article 48 Cow Protection? पक्ष और विपक्ष के तर्क
आर्टिकल 48 निर्देशक सिद्धांतों (भाग IV) में जोड़ा गया, जो अदालत में लागू नहीं होते, बल्कि राज्य नीति के मार्गदर्शक हैं। इसका पूरा पाठ: “राज्य कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक रीति से संगठित करने का प्रयास करेगा और विशेष रूप से गौओं और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और draught पशुओं की नस्लों के संरक्षण और सुधार के लिये तथा इनके वध के निषेध के लिये आवश्यक कदम उठायेगा।”
पक्ष के तर्क:
- धार्मिक-सांस्कृतिक: गाय को ‘माता’ मानना हिंदू संस्कृति का अभिन्न अंग। सेठ गोविंद दास ने कहा, “मुसलमानों को हिंदुस्तान के लोगों के हृदय जीतने का मौका मिलेगा।” बाबर से अकबर तक मुगलों ने गौ-हत्या पर रोक लगाई थी।
- आर्थिक: गाय दूध (प्रोटीन स्रोत), गोबर (खाद) और बैल (खेती के लिए) प्रदान करती है। भार्गव ने अंतरराष्ट्रीय आंकड़े दिए: न्यूजीलैंड में 56 औंस दूध प्रति व्यक्ति, भारत में सिर्फ 7।
- राष्ट्रीय एकता: विभाजन के बाद, यह हिंदू बहुमत को शांत करने का तरीका था।
विपक्ष के तर्क:
- धार्मिक स्वतंत्रता: मुस्लिम सदस्यों ने कहा कि बकरीद पर गाय कुर्बानी उनकी धार्मिक प्रथा है। कुरान या हिदाया में गाय अनिवार्य नहीं, लेकिन प्रतिबंध आर्टिकल 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) का उल्लंघन।
- आर्थिक बोझ: बूढ़े, बंजर पशु संसाधनों का अपव्यय। एक सदस्य ने कहा, “ये पशु अर्थव्यवस्था पर ड्रेन हैं।”
- धर्मनिरपेक्षता: फ्रैंक एंथनी ने इसे ‘फैनेटिक्स का पीछे का दरवाजा’ कहा। नेहरू ने चिंता जताई कि यह मुसलमानों को अलग-थलग करेगा।
डॉ. बी.आर. अंबेडकर की ड्राफ्टिंग कमिटी ने इसे मौलिक अधिकारों से हटाकर निर्देशक सिद्धांतों में डाला, क्योंकि मौलिक अधिकार ‘मानवों के लिए’ हैं, पशुओं के लिए नहीं। समझौते से कोई संतुष्ट न था, लेकिन बहुमत से पास हो गया।
आर्टिकल 48 का प्रभाव
आर्टिकल 48 के बाद, 1950 के दशक में बिहार, यूपी, असम जैसे 7 राज्यों ने गौ-हत्या प्रतिबंध कानून बनाए। आज 24 राज्यों में सख्त कानून हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 2005 में गुजरात बनाम मिर्जापुर मोती कुरेशी मामले में कहा कि गाय और उसकी संतान की कुल हत्या संवैधानिक है। 1961 के अब्दुल हकीम कुरेशी केस में धार्मिक स्वतंत्रता का हवाला खारिज किया।
हालांकि, यह विवादास्पद रहा। 1955 में सेठ गोविंद दास का बिल संसद में गिरा। 1977 में जनता पार्टी सरकार ने कई राज्यों में कानून सख्त किए। आज भी, गौ-रक्षा के नाम पर हिंसा एक चुनौती है, जो संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना को परीक्षा देती है।
निष्कर्ष: आर्टिकल 48
संविधान सभा में गाय पर बहस ने दिखाया कि भारत का संविधान धार्मिक बहुमत और अल्पसंख्यक अधिकारों के बीच नाजुक संतुलन है। आर्टिकल 48 आर्थिक प्रगति के नाम पर जोड़ा गया, लेकिन इसकी जड़ें सांस्कृतिक हैं। आज, जब गौ-हत्या कानून राजनीतिक हथियार बन रहे हैं, यह याद रखना जरूरी है कि संविधान ने इसे ‘प्रयास‘ कहा, न कि ‘अनिवार्य‘। क्या यह प्रावधान एकता लाया या विभाजन? कमेंट्स में अपनी राय बताएं। अधिक अपडेट्स के लिए बने रहें!
डिस्क्लेमर: यह जानकारी ऐतिहासिक स्रोतों पर आधारित है। किसी भी कानूनी सलाह के लिए विशेषज्ञ से संपर्क करें।
Sources: द इंडियन एक्सप्रेस







