भारत में भूमि कर व्यवस्था: मौर्य काल से ब्रिटिश काल तक | Land Tax System in India in Hindi

By Santosh kumar

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Land Tax System in India: भूमि व्यवस्था एक ऐसा विषय रहा है जिसने प्राचीन काल से लेकर मध्यकाल और ब्रिटिश काल तक आर्थिक रूप से शासन व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भू-राजस्व सरकार की आय का एक महत्वपूर्ण माध्यम रहा है चाहे राजतंत्र हो या प्रजातंत्र। हर काल और परिस्थिति में भू-राजस्व को अपनी सुविधा और जरुरत के अनुसार परिवर्तन से गुजरना पड़ा है। इस लेख में हम भारत में भूमि कर व्यवस्था, मौर्य काल से ब्रिटिश काल तक कैसी रही पर प्रकाश डालेंगे।

Land Tax System in India

Land Tax System: भारत में भूमि कर व्यवस्था

मौर्य काल, गुप्त काल, सल्तनत काल, मुगल काल और ब्रिटिश काल तक भू-राजस्व का स्वरुप अलग-अलग रहा है। इस लेख में हम प्राचीन काल से लेकर ब्रिटिश काल तक की भू-राजस्व प्रणाली का अध्ययन करेंगे। इस लेख में प्रतियोगी छात्रों को सम्पूर्ण विश्वसनीय जानकारी उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया है। यह एक ऐसा विषय है जो प्रत्येक परीक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

मौर्यकालीन भूमि तथा राजस्व व्यवस्था

मौर्यकाल में भूमि पर राज्य तथा किसान दोनों का अधिकार होता था। राजकीय भूमि की व्यवस्था करने वाला प्रमुख अधिकारी ‘सीताध्यक्ष’ था, जो दासों, कर्मकारों तथा बंदियों (कैदियों) की सहायता से खेती करवाता था।

  • राज्य की आय का प्रमुख साधन भूमि-कर था।
  • भूमि-कर सामान्यतः उपज का 1/6 होता था। जिसे अवश्यकतानुसार बढ़ा भी दिया जाता था।
  • राजकीय भूमि पर खेती करने वाले किसानों से उपज का 1/4 से 1/2 तक हिस्सा राजस्व के रूप में देना होता था। यह आज की बंटाई व्यवस्था जैसा ही था।
  • भूमिकर को ‘भाग’ कहा जाता था।
  • राजकीय भूमि से प्राप्त आय को ‘सीता’ कहा जाता था।
  • समाहर्ता नामक पदाधिकारी करों (tax) को एकत्र करने तथा आय-व्यय का हिसाब-किताब रखता था।
  • स्थानिक’ तथा ‘गोप’ नामक पदाधिकारी प्रान्तों से करों को एकत्र करते थे।
  • ज्ञात हो कि मौर्यकाल में ही प्रथम बार कर-प्रणाली (tax-sytem) की विस्तृत रूप-रेखा प्रस्तुत की गयी।
  • सरकारी आय का एक भाग सम्राट  एवं उसके परिवार के भरण-पोषण के लिए होता था।
  • दूसरा भाग मुख्य अधिकारियों को वेतन के लिए होता था।
  • तीसरा भाग सैनिक कार्यों में।
  • चौथा भाग जनकल्याण के कार्यों में खर्च किया जाता था।

गुप्तकालीन भूमि तथा राजस्व व्यवस्था

  • मौर्यकाल के विपरीत गुप्तकाल में भूमि पर सिर्फ सम्राट का अधिकार होता था।
  • जो भूमि मंदिरों तथा ब्राह्मणों को दान में दी जाती थी उसे ‘अग्रहार’ कहा जाता था।
  • ‘अग्रहार’ भूमि सभी प्रकार के करों से मुक्त होती थी।
  • आर.एस. शर्मा ने ‘अग्रहार’ (भूमि दान ) को सामंतवाद के उदय का प्रमुख प्रमुख कारण मानते हैं ।
  • गुप्तकाल में भूमिकर एकत्र करने के लिए ‘ध्रुवाधिकरण’ तथा भूमि-आलेखों को सुरक्षित करने के लिए ‘महाक्षपटलिक’ और ‘करणिक‘ नामक पदाधिकारी नियुक्त थे।
  • ‘न्यायाघिकरण’ नामक पदाधिकारी भूमि-सम्बन्धी विवादों का हल करते थे।
  • सम्राट स्कन्दगुप्त के जूनागढ़ के राज्यपाल पर्णदत्त के पुत्र चक्रपालित ने सुदर्शन झील के बाँध का पुनर्निर्माण करवाया था।
  • गुप्त अभिलेखों में भूमिकर को ‘उद्रग’ तथा ‘भागकर’ कहा गया है।
  • स्मृति ग्रन्थों में कर को राजा की ‘वृत्ति’ कहा गया है।
  • गुप्तकाल में कर की दर 1/6 थी यानी उपज का छठा भाग।

सल्तनतकालीन भूमि-व्यवस्था

सल्तनतकाल में भूमि के चार प्रकार थे–1-खालिस प्रदेश, 2- इक्ता में बंटी भूमि जो कुछ वर्षों के लिए या सारे जीवन के लिए मुक्ति लोगों के पास होती थी, 3- उन हिन्दू सरदारों के भूमि क्षेत्र जो सुल्लान के साथ कोई समझौता कर लेते थे, और 4- अंत में , मुस्लिम संतों या विद्वानों को उपहार में दी गई भूमि।

खालिस भूमि प्रत्यक्ष रूप से केंद्रीय सरकार के आधीन थी, किन्तु राजस्व का सम्बंध व्याक्तिगत कृषकों से न होकर स्थानीय भू-राजस्व अधिकारियों से था।

भू-राजस्व वसूल करने के लिए प्रत्येक तहसील में एक आमिल या भू-राजस्व लिपिक रहता था जो चौधरी व मुकद्दम लोगों से भू-राजस्व वसूल करता था क्योंकि वे इसे कृषकों से वसूल करते थे।

  • वक्फ की भूमि व इनाम में दी गई भूमि भूमिकर से मुक्त थी।
  • सल्तनतकाल में भूमिकर 1/5  यद्यपि अलाउद्दीन खिलजी ने कर की दर 1/2 तक बढ़ाई,

शेरशाह सूरी की भूमि व्यवस्था

भूमि सुधार अथवा राजस्व सुधार में शेरशाह को अकबर का अग्रणी कहा गया है। उसने भूमिकर व्यवस्था के आधारभूत सिद्धान्तों को निर्धारित किया जिनका बाद में अकबर ने अनुसरण किया और ख्याति अर्जित की।

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  • शेरशाह से पूर्व भूमि की पैमाइश नहीं की जाती थी, केवल पूर्वानुमान से ही भूमिकर का निर्धारण होता था।
  • शेरशाह ने समस्त भूमि की पैमाइश कराकर उसके अनुसार कर का निर्धारण किया।
  • पैदावार का एक-तिहाई हिस्सा सरकारी मालगुजारी निश्चित किया।
  • लगान नगद या अनाज दोनों तरह से लिया जाता था।
  • भू-राजस्व की तीन प्रथाएं शेरशाह के समय प्रचलित थीं —
    (1) गल्ला-बख्सी या बंटाई
    (2) नस्क या मुकत्तई या कनकुट
    (3) नकदी या जाब्ती या जमईं ।
    बटाई भी तीन प्रकार की थी– खेत बटाई, लंक बटाई और रसी बटाई।

मुगलकालीन भूमिकर व्यवस्था

  • अकबर ने शेरशाह की भूमि व्यवस्था को आवश्यक संशोधन कर अपना लिया।ख्वाजा अब्दुल मजीदखाँ और मुजफ्फर तुरबती के निरीक्षण में राजस्व-प्रणाली में सुधार करने के प्राराम्भिका प्रयास किये गये।
  • तुरबती ने भूमिकर सम्बन्धी आंकड़े और अन्य सामग्री एकत्रित करने के लिए 10 कानूनगों नियुक्त किये।
    1575 ई० में जागीरदारी प्रथा समाप्त कर दी गई।
  • अकबर ने अपना साम्राज्य 182 परगनों में विभक्त कर प्रत्येक परगना को एक-एक ‘करोड़ी’ के अधिकार में देकर राजस्व-कर एकत्र करने की जिम्मेदारी सौंप दी। यद्यपि ये करोड़ी बहुत लालची और भ्रष्टाचारी सिद्ध ह्ए।

1582 में राजा टोडरमल दीवाने-अशरफ के कर सुधार

  • टोडरमल ने 1570 से 1580 तक 10 वर्ष में प्राप्त लगान की दरों को जोड़कर योगफल का 1/3 भाग लगान की वसूली को आदर्श संख्या माना।
  • टोरमल ने भूमि की नपाई की प्रचलित पद्धति ( सन की रस्सियों ने नापना) बन्द कर दिया क्योंकि यह रस्सी सिकुड़ और फैल सकती थी, जिससे नपाई विश्वसनीय नहीं होती थी।
  • टोडरमल ने बांस के लोहे के छल्लों से जुड़े हुए ‘जरीबों’ से भूमि मापने की व्यवस्था की।

भूमि को चार श्रेणियों में विभाजित किया गया—

  1.      पोलज- वह भूमि जिसमें प्रतिवर्ष खेती की जाती थी, और लगान की वसूली भी प्रतिवर्ष की जाती थी।
  2.      ‘पड़ोती- वह भमि जिसे समय-समय पर खाली छोड़ दिया जाता था ताकि वह पनः उर्वरा शक्ति प्राप्त करले।
  3.       छच्छर– यह वह भूमि होती भी जिसमें तीन या चार साल तक खेती नहीं होती थी।
  4.       बंजर– इस भूमि में पाँच से अधिक वर्षों तक खेती नहीं होती थी।


पोलज और पड़ोती किस्म की भूमियाँ उत्तम, मध्यम और निकृष्ट तीन श्रेणियों में विभक्त थीं।

लगान आनुपातिक आधार पर निर्धारित किया जाता था, जैसे—
1-उत्तम सूची      – 50 मन प्रति बीघा
2-मध्यम सूची     – 40 मन प्रति बीघा
3-निकृष्ट            – 30 मन प्रति बीघा
————————
योग              – 120 मन
औसत           – 40  मन
राज्य का भाग – 13/1/3 मन

  • कर नगद और उपज के रूप में लिया जाता था।
  • राज्य की ओर से किसानों को रूपया आसान किस्तों पर उधार दिया जाता था।
  • बितकची प्रत्येक गाँव में प्रत्येक प्रकार की खेती की नपाई करता, निर्धारित दर से लगान लगाता और किसान से उसकी वसूली करता था।

जब्ती प्रणाली- भूमिकर एकत्र करने की यह प्रणाली थी जिसमें किसान से कर एकत्र कर शाही कोष में भेजने का कार्य कर अधिकारी करता था। यह प्रणाली बिहार, इलाहाबाद, लाहौर, मुल्तान, दिल्ली आगरा, अवध, मालवा, और गुजरात के कुछ भागों में प्रचलित थी।

गल्ला-बख्सा प्रणाली– खेती के बंटवारे के हिसाब से कर लगाने की प्राचीन भारतीय पद्धति। काबुल, कश्मीर, और थट्टा में यह प्रणाली प्रचलित थी।

नसुक प्रणाली– इसके अनुसार राज्य और किसान के बीच कोई मध्यस्थ नहीं होता था।

ब्रिटिश कालीन भू राजस्व व्यवस्था

साम्राज्यवादी अंग्रेजों ने भारतीय कृषि व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन किए। नवीन भू-राजस्व पद्धतियां, स्वामित्व, धारणाएं, भाटकी (rent) में परिवर्तन तथा अधिकाधिक भू-राजस्व की मांग ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था में वे परिवर्तन किए जिससे समस्त देश के कृषि जगत में खलबली मच गई तथा एक विकृत आधुनिकता से आ गई।

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अंग्रेजों की दृष्टि  में भारत उनकी जागीर था और उस जागीर से अधिक से अघिक आय प्राप्त करने के लिए आर्थिक भाटक (economic rent) बसूलने का प्रयास किया।भूमि व्यवस्था प्रतिवर्ष परिवर्तित होने से भारतीय किसान कृषि छोड़ने को बाध्य हो गये परिणामस्वरूप कृषि भूमि खाली रहने लगी और उत्पादन घटने लगा। ऐसे में भारत तथा इंग्लैण्ड स्थित सरकारों ने भूमि कर प्रणाली पर गम्भीरतापूर्वक विचार किया और ठोस भूमि-व्यवस्था का प्रबन्ध किया।

ब्रिटिश सरकार ने भारत में भिन्न-भिन्न प्रकार के भू-धृति पद्धतियां (land tenure system)अपनाईं। (tenure) शब्द लातीनी भाषा में tenco अर्थात ‘धारण करना’ (to hold) से निकला है तथा इसका प्रयोग उन शर्तों के लिए किया जाता है जिन पर कृषक राज्य से अथवा भूमिपति से भूमि लेता है। मुख्य रूप से अंग्रेजों ने भारत में तीन प्रकार की भू-धृति पद्धतियां अपनाईं अर्थात जमीदारी, महलवाड़ी तथा रैयतवाड़ी।

भू-राजस्व पद्धतिलागू क्षेत्र एवं कवरेज प्रतिशत
स्थाई बंदोबस्त (जमींदारी पद्धति)बंगाल, बिहार, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश का बनारस खंड, उत्तरी कर्नाटक → लगभग 19% ब्रिटिश भारत की भूमि इसके अंतर्गत आई
महलवाड़ी पद्धतिउत्तर प्रदेश, मध्य प्रांत (मध्य प्रदेश), पंजाब (कुछ परिवर्तनों के साथ) → लगभग 30% भूमि इसके अधीन रही
रैयतवाड़ी पद्धतिमुंबई प्रेसीडेंसी, मद्रास प्रेसीडेंसी के अधिकतर भाग, असम तथा कुछ अन्य क्षेत्र → लगभग 51% भूमि इसके अंतर्गत आई

स्थाई जमीदारी व्यवस्था अथवा स्थाई भूमि-प्रबन्ध (The Permanent Zamindari Settlement)


भारत में 10 वर्षीय जमीदारी व्यवस्था मुख्यतः अंग्रेजों की ही देन है जिसमें उनके अनेक निजी उद्देश्य निहित थे। इस पद्धति को जागीरदारी, मालगुजारी, बीसवेदारी, इत्यादि नामों से भी जाना जाता है।  इसके अंतर्गत राज्यों की मांग सदैव के लिए निश्चित कर दी जाती थी। अन्य पद्धतियों में 10 वर्ष से 40 वर्ष के पश्चात् भूमि कर में परिवर्तन किये जाते थे। 

जमींदारी पद्धति के अनुसार जमींदार को (जो प्रायः भूमि कर संग्रहकर्ता ही होता था) भूमि का स्वामी स्वीकार  जाता था।  वह भूमि को बेच, रहन अथवा दान में  था।  राज्य भूमिकर देने के लिए केवल जमींदार को ही उत्तरदायी समझता था तथा उसके कर न देने पर उसकी भूमि जब्त की जा सकती थी। 

भूमि कर की मांग बहुत ऊँची निश्चित की गयी। आप इस उदाहरण से समझ सकते हैं बंगाल में यह भाटक (rent) का 89 प्रतिशत निश्चित की गयी अर्थात जमींदार के पास 11 प्रतिशत बच जाता था।  जॉन शोर ने 1762-63 के चार वर्षों का विवरण इस प्रकार दिया है :

शासनकालवर्षवास्तविक संग्रहण
मीर कासिम का प्रशासन1762-63£ 6.46 लाख
मीर जाफर का प्रशासन1763-64£ 7.62 लाख
मीर जाफर का प्रशासन1764-65£  8.17 लाख
कम्पनी की दीवानी का प्रथम वर्ष1765-66£  14.70 लाख
स्थाई व्यवस्था से पूर्व1790-91£ 26.80  लाख

इन आंकड़ों से स्पष्ट  है कि कम्पनी की दीवानी के प्रथम वर्ष में ही उससे पूर्व वर्ष की अपेक्षा लगभग 80% अधिक भूमि कर एकत्रित किया गया था,1790-91तक यह मात्रा £ 26.8 लाख थी जो 1765-66 से लगभग दोगुना थी। 

इस स्थाई वंदोवस्त वयवस्था का सबसे घृणित पहलु यह था कि सरकार की मांग तो स्थिर थी परन्तु जो भाटक (rent) जमींदार कृषक से लेता था वह परिवर्तनशील अतएव कालान्तर में भाटक बढ़ा दिया गया। भाटक न देने पर कृषक को बेदखल कर दिया जाता था। 1859, 1885 में पारित किए गए बंगाल भाटक अधिनियम (Bengal Rent Act) के द्वारा कृषकों को कुछ लाभ अवश्य हुआ परन्तु बहुत नहीं। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि यह कानून ग्रामीणों को शांत रखने के लिए पारित किया गया।

महलबाड़ी पद्धति  (The Mahalwari System)

इस पद्धति के अनुसार भूमि कर की इकाई किसान का खेत नहीं बल्कि ग्राम अथवा महल (जागीर का एक भाग) होता था। भूमि समस्त ग्राम सभा की सम्मिलित रूप से होती थी जिसको भागीदारों का समूह (body of co.shares) कहते थे।अर्थात पूरा ग्राम मिलकर सम्मिलित रूप से निर्धारित कर को अदा करता था, यद्यपि व्यक्तिगत उत्तरदायित्व भी होता था। यदि कोई व्यक्ति अपनी भूमि छोड़ देता था तो ग्राम समाज इस भूमि को संभाल लेता था। यह ग्राम समाज ही सम्मिलित भूमि (शामलात) तथा अन्य भूमि का स्वामी होता था।

उत्तर पश्चिमी प्रांत अथवा अवध (यू.पी.)में भूमि कर व्यवस्था— उत्तर पश्चिमी प्रांत तथा अवध जिसे वर्तमान में उत्तर प्रदेश कहते हैं अंग्रेजों के अधीन भिन्न-भिन्न समय पर आया। 1801 में अवध के नवाब ने कंपनी को इलाहाबाद तथा उसके आसपास के प्रदेश जिन्हें अभ्यर्पित जिले(ceded districts) कहते थे’ दे दिए। द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध के पश्चात कंपनी ने यमुना तथा गंगा के मध्य का प्रदेश विजय कर लिया। इन जिलों को विजित (conquered) प्रांत कहते थे। अंतिम आंग्ल-मराठा युद्ध (1817-18) के पश्चात लॉर्ड हेस्टिंग्स ने उत्तरी भारत में और अधिक क्षेत्र प्राप्त कर लिए।

हेनरी वैल्जली ने, जो अभ्यर्पित प्रदेश के प्रथम लेफ्टिनेंट गवर्नर थे, जमीदारों तथा कृषकों से ही सीधे भूमि कर निश्चित कर लिया तथा यह मांग नवाबों की मांग से प्रथम वर्ष में ही 20 लाख रुपए अधिक थी। तीन वर्ष पूरे होते-होते 10 लाख रुपए वार्षिक और बढ़ा दिया गया। इसमें यह भी याद रहे कि नवाब की मांग कमी वाले वर्षों में वास्तविक उपज के अनुसार घट जाती थी परंतु कंपनी की मांग ऐसी दृढ़ता से निश्चित की गई थी जो कि भारत के इतिहास में पहले कभी नहीं हुई थी।

1822 के रेगुलेशन (Regulations of 1822)– आयुक्तों के बोर्ड (Board of Commissioners) के सचिव होल्ट मैकेंजी ने 1819 के पत्र में उत्तरी भारत में ग्राम समाजों की ओर ध्यान आकर्षित किया तथा यह सुझाव दिया था कि भूमि का सर्वेक्षण किया जाए, भूमि में लोगों के अधिकारों का लेखा तैयार किया जाए, प्रत्येक ग्राम अथवा महल से कितना भूमि कर लेना है, यह निश्चित किया जाए तथा प्रत्येक ग्राम से भूमि कर प्रधान अथवा लंबरदार द्वारा संग्रह करने की व्यवस्था की जाए।

1822 के रेगुलेशन-7 (Regulation VII) द्वारा इस सुझाव को कानूनी रूप दे दिया गया। भूमि कर भू-भाटक का 30% निश्चित किया गया जो जमींदारों को देना पड़ता था। उन प्रदेशों में जहां जमींदार नहीं होते थे तथा भूमि ग्राम समाज के सम्मिलित रूप से होती थी, भूमि कर भू-भाटक का 95% निश्चित किया गया। सरकार की मांग अत्यधिक होने के कारण तथा कर संग्रहण में अत्यधिक कठोरता होने के कारण यह व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गई।

1833 का रेगुलेशन 9 तथा मार्टिन बर्ड की भूमि कर व्यवस्था– विलियम बैंटिंक की सरकार ने 1822 की योजना की पूर्णरूपेण समीक्षा की तथा इस परिणाम पर पहुंची कि इस योजना से लोगों को बहुत कठिनाई हुई है तथा यह अपनी कठोरता के कारण ही टूट गई है। बहुत सोच विचार के उपरांत 1833 के रेगुलेशन पारित किए गये जिसके द्वारा भूमि की उपज तथा भूभाटक का अनुमान लगाने की पद्धति सरल बना दी गई। भिन्न भिन्न प्रकार की भूमि के लिए भिन्न-भिन्न औसत भाटक निश्चित किया गया। प्रथम बार खेतों के मानचित्र तथा पंजियों (registers) का प्रयोग किया गया।

यह नई योजना मार्टिन बर्ड की देखरेख में लागू की गई। मार्टीन बर्ड को उत्तरी भारत में भूमि कर व्यवस्था का प्रवर्तक (Father of Land-settements in Northern India) के नाम से याद किया जाता है। इसके अनुसार एक भाग की भूमि का सर्वेक्षण किया जाता था जिसमें खेतों की परिधियां निश्चित की जाती थीं और बंजर तथा उपजाऊ भूमि स्पष्ट की जाती थी।

इसके पश्चात समस्त भाग का और फिर समस्त ग्राम का भूमि कर निश्चित किया जाता था। प्रत्येक ग्राम अथवा महल के अधिकारियों को स्थानीय आवश्यकता के अनुसार समायोजन (Adjustment) करने का अधिकार होता था। भाटक का 66% भाग राज्य सरकार का भाग निश्चित किया गया और यह व्यवस्था 30 वर्ष के लिए की गई।

इस योजना के अंतर्गत भूमि व्यवस्था का कार्य 1833 में आरंभ किया गया। जेम्ज़ टॉमसन 1843 से 1853 तक लेफ्टिनेंट-गवर्नर रहे के काल में समाप्त किया गया।

परंतु भाटक 66% भूमि कर के रूप में प्राप्त करना भी बहुत अधिक था तथा चल नहीं सका। इसलिए लॉर्ड डलहौजी ने इसका पुनरीक्षण कर 1855 में सहारनपुर नियम के अनुसार 50% भाग का सुझाव दिया।

दुर्भाग्यवश भूव्यवस्था अधिकारियों ने इस नियम को स्थगित करने का प्रयत्न किया। उन्होंने इस 50% के अर्थ प्रदेश के भाटक के ‘वास्तविक भाटक’ (actual rental) के स्थान पर ‘संभावित तथा शक्य’ (prospective and potential) भाटक लिया जिसके फलस्वरूप कृषक की अवस्था और दयनीय हो गई जिस कारण इनमें से बहुत से लोग 1857 के विद्रोह में सम्मिलित हो गए।

रैयतवाड़ी पद्धति (The Ryotwari System)

रैयतवाड़ी पद्धति के अनुसार प्रत्येक पंजीकृत भूमिदार को भूमि का स्वामी यानी मालिक माना गया। वह सीधे राज्य सरकार को भूमि कर देने के लिए उत्तरदायी था। उसे अपनी भूमि को गिरवी रखने तथा बेचने की अनुमति थी। वह अपनी भूमि से उस समय तक वंचित नहीं किया जा सकता जब तक वह समय पर भूमि कर देता रहे।

मद्रास की भूमि कर व्यवस्था- मद्रास प्रेसिडेंसी में प्रथम भूमि व्यवस्था बारामहल जिला प्राप्त करने के पश्चात 1792 में की गई। कैप्टन रीड ने टॉमस मनरो की सहायता से खेत की अनुमानित आय का आधा भाग भूमि कर के रूप में निश्चित किया। यह तो पूरे आर्थिक भाटक (conomic rent) से भी अधिक था। यही व्यवस्था अन्य भागों में भी लागू कर दी गई।

टॉमस मनरो तथा मद्रास भूव्यवस्था- टॉमस मनरो जो मद्रास के 1820-1827 तक गवर्नर रहे, उन्होंने पुरानी कर व्यवस्था को अनुचित माना। उन्होंने कुल उपज का तीसरा भाग भूमि कर का आधार मान कर रैयतवाड़ी पद्धति को, स्थाई भूमि व्यवस्था के प्रदेशों को छोड़कर, शेष समस्त प्रान्त में लागू कर दिया। दुर्भाग्यवश यह भी लगभग समस्त आर्थिक भाटक (econimic rent) जितना ही था। दूसरे भूमि कर क्योंकि धन के रूप में (नगद) देना पड़ता था तथा इसका वास्तविक उपज अथवा मंडी में प्रचलित भावों से कोई संबंध नहीं था इसलिए कृषक पर अत्यधिक बोझ पड़ा।

मनरो की भूमि कर व्यवस्था लगभग 30 वर्ष तक चलती रही तथा इसी से विस्तृत उत्पीड़न तथा कृषकों की कठिनाइयां उत्पन्न हुई। कृषक लोग भूमि कर देने के लिए चेट्टियों (साहूकारों) के पंजों में फंस गए भूमि कर एकत्र करने के प्रबंध बहुत कठोर थे और इसके लिए प्राय यात्राएं भी दी जाती थीं।

बम्बई में भूमि कर व्यवस्था- यहां रैयतवाड़ी पद्धति लागू की गई ताकि जमीदार अथवा ग्राम सभाएं उनके लाभ को स्वयं ने हड़प जाएं।

एलफिंस्टन तथा चैप्लिन की रिपोर्ट- एलफिंस्टन  1818-27 तक मुंबई के गवर्नर थे। उन्होंने 1819 में पेशवा से विजय किए गए प्रदेशों पर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की। उन्होंने मराठा प्रशासन के दो मुख्य बातों की ओर ध्यान आकर्षित किया। (1) ग्राम सभाओं का स्थानीय प्रशासन की इकाई के रूप में अस्तित्व (2) मिरास भू-धृति पद्धति का अस्तित्व (मिरासदार वंशानुगत भूमिदार कृषक होते थे जो स्वयं अपनी भूमि जोतते थे तथा राज्य सरकार को निश्चित भूमि कर देते थे)।

चैप्लिन जो उस समय आयुक्त था, ने 1821 तथा 1822 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें उसने भूमि कर की पुरानी पद्धति का वर्णन किया तथा कुछ मूल्यवान सुझाव दिए।

प्रिंगल ने 1824-28 तक भूमि का भली-भांति सर्वेक्षण किया तथा राज्य का भाग शुद्ध उपज का 55% निश्चित किया। दुर्भाग्यवश अधिकतर सर्वेक्षण दोषपूर्ण थे तथा उपज के अनुमान ठीक नहीं थे। फलस्वरुप भूमि कर अधिक निश्चित किया गया तथा कृषकों को बहुत दु:ख हुआ। बहुत से कृषकों ने भूमि जोतनी बंद कर दी तथा बहुत सा क्षेत्र बंजर हो गया।

विगनेट का सर्वेक्षण तथा बम्बई में रैयतवाड़ी भूव्यवस्था— 1835 में लेफ्टिनेंट विनगेट जो इंजीनियरिंग कोर के पदाधिकारी थे, उन्हें भूमि सर्वेक्षण का अधीक्षक नियुक्त किया गया। उन्होंने 1847 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की जिस पर ई. गोल्डस्मिथ,  कैप्टन डेविडसन तथा कैप्टन विगनेट के हस्ताक्षर थे।

पुन: भू व्यवस्था (re-settlment) का कार्य 30 वर्ष के पश्चात 1868 में किया गया। अमेरिका के गृह युद्ध (1861-65) के कारण कपास के मूल्य बहुत बढ़ गए। इसे अस्थाई अभिवृद्धि के कारण सर्वेक्षण अधिकारियों को भूमि कर 66% से 100% तक बढ़ाने का अवसर मिल गया। कृषकों को न्यायालय में अपील करने का अधिकार नहीं था।

इस कठोरता के करण दक्कन में 1875 में कृषि उपद्रव हुए जिससे प्रेरित होकर सरकार ने 1879 में दक्कन राहत अधिनियम पारित किया जिससे कृषकों को साहूकारों के विरुद्ध संरक्षण प्रदान किया गया परंतु सब कष्टों के मूल अर्थात सरकार की अधिक भूमि कर की मांग के विषय में कुछ नहीं किया गया।

मुंबई में रजत बड़ी पद्धति के दो प्रमुख दोस्त थे– अत्यधिक भूमि कर तथा उसकी अनिश्चितता। इसमें अधिक भूमि कर के लिए न्यायालय में अपील करने की अनुमति नहीं थी। कलेक्टर को अधिकार था कि वह कृषक को भविष्य के लिए भूमि कर की दर बता दे और यह भी कह दे कि यदि उसे यह नई दर स्वीकार नहीं है तो वह भूमि छोड़ दे।

निष्कर्ष—

भारत में भूमि कर व्यवस्था के संबंध में मौर्य काल से लेकर ब्रिटिश काल तक विभिन्न पद्धति अपनाई गई, परंतु किसानों को जितना कष्ट ब्रिटिश काल में झेलना पड़ा उतना किसी भी काल में नहीं। चाहे वह मौर्य काल हो, गुप्त काल हो या सल्तनत काल अथवा मुगल काल हो। यह ब्रिटिश ही थे जिन्होंने भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर दिया भारतीय किसान को खेती छोड़कर जंगलों में भाग जाने तक को मजबूर हो गए। कर की दर इतनी ऊंची थी और उस पर भी उसे उगाने का जो कठोर तरीका अपनाया जाता था उसने भारतीय किसानों को भयभीत कर दिया। किसान कृषि छोड़ने को मजबूर हो गए और अंततः विद्रोही बन गए।

ईस्ट इंडिया कंपनी की भूमि कर पद्धतियों का , विशेषकर अत्याधिक कर तथा नवीन प्रशासनिक तथा न्यायिक प्रणाली का परिणाम यह हुआ कि भारतीय अर्थव्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गई। ग्राम पंचायतों के मुख्य कार्य, भूमि व्यवस्था तथा न्यायिक कार्य समाप्त हो चुके थे तथा पाटिल अब केवल सरकार की ओर से भूमि कर संग्रहकर्ता ही रह गया था। इस प्रकार ग्रामों की प्राचीन सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गई थी। भारतीय कुटीर उद्योग लगभग समाप्त हो चुके थे तथा ग्रामों में भूमि का महत्व बढ़ गया। इस नई व्यवस्था से भूमि तथा कृषक दोनों ही चलनशील हो गए जिसके फलस्वरूप ग्रामों में साहूकार तथा अन्यत्रवासी भूमिपति (absentee landlords) उत्पन्न हो गए।

समाज में जमींदार तथा साहूकार जिनकी ग्राम निवासियों को अब अधिक आवश्यकता होने लगी थी, बहुत महत्वपूर्ण व्यक्ति बन गए। अब ग्रामीण श्रमिक वर्ग जिसमें छोटे-छोटे किसान, मुज़ारे तथा भूमिहीन किसान सम्मिलित थे, उनकी संख्या बढ़ गई। सहकारिता के स्थान पर आपसी प्रतिद्वंदिता तथा व्यक्तिवाद को बढ़ावा मिला तथा पूंजीवाद के पूर्वाकांक्षित तत्व उत्पन्न हो गए। अब उत्पादन के नए साधन जिनमें धन की आवश्यकता होती थी, मुद्रा अर्थव्यवस्था, कृषि का वाणिज्यकरण, संचार व्यवस्था में सुधार तथा विश्व की मंडियों के साथ संपर्क, इन सभी तत्वों ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को तथा भारतीय कृषि को एक नया रूप दे दिया।

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