Jyotiba Phule Profile: महात्मा ज्योतिराव गोविंदराव फुले भारत के प्रमुख समाज सुधारक, विचारक, लेखक और कृषि सुधारों के प्रखर समर्थक थे। लोग उन्हें सादर “ज्योतिबा फुले” या “महात्मा फुले” कहकर याद करते हैं। उन्होंने अपना सारा जीवन महिलाओं की शिक्षा, दलित-शोषित वर्गों के अधिकार और किसानों की मुक्ति के लिए संघर्ष में लगा दिया। इस राह में उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले ने पूरा साथ दिया और दोनों को समाज के रूढ़िवादी तत्वों से कड़ा विरोध सहना पड़ा।
सन् 1873 में ज्योतिबा फुले ने “सत्यशोधक समाज” की स्थापना की, जिसका मुख्य ध्येय शूद्र-अतिशूद्र समुदायों को जातिवादी शोषण से मुक्त कराना और उन्हें सम्मानजनक जीवन देने का था। यह परिचय उनके जीवन, विचारों और अमर योगदान की संक्षिप्त झलक प्रस्तुत करता है।
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने कहा था:
“मेरे तीन गुरु हैं – बुद्ध, कबीर और फुले। फुले मेरे सबसे बड़े गुरु हैं।”
आज जब हम जाति-विरोध, महिला शिक्षा, किसान आंदोलन, दलित-बहुजन चेतना की बात करते हैं – तो सबसे पहले जिस व्यक्ति का नाम आता है, वो हैं महात्मा ज्योतिराव गोविंदराव फुले।

| महात्मा ज्योतिबा फुले – संक्षिप्त जीवन परिचय | |
|---|---|
| नाम | ज्योतिराव गोविंदराव फुले |
| उपनाम | ज्योतिबा फुले (Jyotirao Phule) |
| जन्म | 11 अप्रैल, 1827 |
| जन्म स्थान | कटगुण गांव, सतारा जिला, महाराष्ट्र |
| शिक्षा | स्कॉटिश मिशनरी हाई स्कूल, पुणे |
| पिता का नाम | गोविंदराव फुले |
| माता का नाम | चिमणा फुले |
| पत्नी का नाम | सावित्रीबाई फुले |
| स्थापना | सत्यशोधक समाज (1873) |
| प्रमुख पुस्तकें | तृतीया रत्न (1855), पोवाड़ा: छत्रपति शिवाजीराज भोंसले यांचा (1869), गुलामगिरि (1873), शेतकर्याचा आसूड (1881), किसानों का कोड़ा (1883) |
| निधन | 28 नवंबर, 1890 (पुणे, महाराष्ट्र) |
| स्मारक | फुलेवाडा, पुणे, महाराष्ट्र |
| जीवनकाल | 63 वर्ष |
Jyotiba Phule Biography: प्रारंभिक जीवन
- जन्म: 11 अप्रैल 1827, पुणे (तत्कालीन पूना)
- पिता: गोविंदराव फुले (माली जाति, फूलों की माला बनाने का काम करते थे)
- माँ: चिमणाबाई (ज्योतिबा 9 महीने के थे तभी स्वर्गवास)
- जाति: माली (शूद्र वर्ण में गिनी जाती थी, ब्राह्मणों द्वारा निम्न मानी जाती थी)
जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि
महात्मा ज्योतिराव गोविंदराव फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के खटगुन (कटगुण) गांव में एक साधारण माली परिवार में हुआ था। उनके पिता गोविंदराव फुले फूलों का व्यवसाय करते थे और परिवार की आर्थिक स्थिति मध्यम थी। दुर्भाग्यवश, जब ज्योतिराव सिर्फ एक साल के थे, तभी उनकी मां चिमणाबाई का देहांत हो गया। इसके बाद उनका पालन-पोषण घर की एक नौकरानी ने किया।
शिक्षा और प्रारंभिक जीवन
बचपन में ज्योतिराव ने पहले स्थानीय मराठी स्कूल में पढ़ाई की, फिर पुणे के स्कॉटिश मिशनरी हाईस्कूल में दाखिला लिया। उस समय ऊँची जातियों के अलावा अन्य बच्चों को अच्छी शिक्षा मिलना मुश्किल था, लेकिन ज्योतिराव ने अपनी लगन से शिक्षा प्राप्त की। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने ब्रिटिश सरकार की नौकरी करने के बजाय पिता के साथ फूलों का व्यवसाय ही अपनाया।
सावित्रीबाई से विवाह और नया मोर्चा
सन् 1840 में मात्र 13 वर्ष की आयु में ज्योतिराव का विवाह 9 वर्षीय सावित्रीबाई से हुआ। उस दौर में बाल-विवाह आम था। विवाह के समय सावित्रीबाई अनपढ़ थीं, लेकिन ज्योतिराव ने स्वयं उन्हें पढ़ाना शुरू किया और जल्द ही वे शिक्षित हो गईं। दोनों ने मिलकर समाज की कुरीतियों के खिलाफ लड़ाई का संकल्प लिया।
लड़कियों की शिक्षा की क्रांतिकारी शुरुआत
सन् 1848 में ज्योतिबा और सावित्रीबाई फुले ने पुणे में देश का पहला लड़कियों का स्कूल खोला, जो पूरी तरह स्वदेशी प्रयास से चलाया जाता था। यह उस समय की सबसे बड़ी चुनौती थी क्योंकि लड़कियों को पढ़ाना समाज में पाप माना जाता था। फुले दंपति को पत्थरबाजी, गालियाँ और सामाजिक बहिष्कार तक झेलना पड़ा। 1852 तक उन्होंने तीन स्कूल खोल लिए थे, पर 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद आर्थिक तंगी के कारण 1858 तक ये स्कूल बंद हो गए। फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी और समाज सुधार का काम जारी रखा।
सत्यशोधक समाज की स्थापना
24 सितंबर 1873 को ज्योतिबा फुले ने अपने साथियों के साथ “सत्यशोधक समाज” की नींव रखी। इसका मुख्य उद्देश्य शूद्र और अतिशूद्र वर्गों को जातिवादी शोषण से मुक्ति दिलाना, उन्हें शिक्षा और आत्मसम्मान देना तथा ब्राह्मणवादी रूढ़ियों से दूर एक नया सामाजिक ढांचा तैयार करना था। इस समाज ने बिना पुरोहित के विवाह और अंतिम संस्कार जैसी व्यवस्थाएँ भी शुरू कीं।
इतना ही नहीं, ज्योतिबा फुले को पुणे नगरपालिका का आयुक्त भी नियुक्त किया गया और वे 1876 से 1883 तक इस पद पर रहे। उस समय नगरपालिका सदस्यों की नियुक्ति ब्रिटिश सरकार करती थी। यह उनके सामाजिक कार्यों की स्वीकार्यता का प्रमाण था।

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1848 – वो ऐतिहासिक साल जिसने भारत बदल दिया
- 3 जनवरी 1848: ज्योतिबा-सावित्रीबाई ने पुणे के भिडे वाड़ा में निचली जाति की लड़कियों के लिए भारत का पहला स्कूल खोला।
पहली छात्राएँ: 8-9 लड़कियाँ – जिनमें महार, मांग, चमार जाति की बच्चियाँ शामिल थीं। - 1 जनवरी 1848: पुणे में विधवाओं के लिए पहला आश्रय गृह खोला।
- 1851: शूद्र-अतिशूद्र लड़कों के लिए अलग स्कूल।
- 1853: गर्भवती बलात्कार पीड़िताओं के लिए अनाथालय (बालहत्या प्रतिबंधक गृह) – यहाँ पैदा होने वाले बच्चे को गोद लेने की व्यवस्था।
इन सबके लिए ज्योतिबा को ब्राह्मणों से जान का खतरा था। रूढ़िवादी लोग पत्थर मारते थे, गंदगी फेंकते थे, यहाँ तक कि उनके पिता ने भी घर से निकाल दिया।
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सत्यशोधक समाज – भारत का पहला गैर-ब्राह्मण आंदोलन (1873)
24 सितंबर 1873 को सत्यशोधक समाज की स्थापना।
उद्देश्य:
- ब्राह्मणवाद और पुरोहितवाद का विरोध
- सभी जातियों-धर्मों के लोगों को एक मंच पर लाना
- बिना पुरोहित के विवाह, अंतिम संस्कार कराना
- “सत्य” की खोज करना – न कि वेद-पुराणों को मानना
सत्यशोधक समाज का नारा:
“जाति नहीं, कर्म प्रधान”
ज्योतिबा फुले की प्रमुख रचनाएँ (जो आज भी पढ़ी जाती हैं)
| ज्योतिबा फुले की प्रमुख रचनाएँ | प्रकाशन वर्ष |
|---|---|
| तृतीय रत्न | 1855 |
| ब्राह्मणाचे कसब | 1869 |
| पोवाडा: छत्रपति शिवाजी राजे भोसले यांचा | 1869 |
| पोवाड़ा: विद्याख्यात बलीराजा | 1869 |
| मानव मोहम्मद पैगंबर अभंग | – |
| गुलामगिरी | 1873 |
| शेतकऱ्याचा आसूड (शेतकरी का कोड़ा) | 1881 |
| सत्सार | 1881 |
| किसान का कोड़ा | 1883 |
| इशारा | 1885 |
| सार्वजनिक सत्यधर्म पुस्तक | 1891 |
| अखण्डादी काव्यरचना | 1893 |
| अस्पृश्यांची कैफियत | 1893 |
फुले दंपत्ति पर हमले और सामाजिक बहिष्कार
- घर से निकाले गए
- रिश्तेदारों ने संबंध तोड़ लिए
- गाँव में घुसने पर पत्थर मारे गए
- सावित्रीबाई पर गोबर-कीचड़ फेंका गया
- 1888 में ज्योतिबा पर जानलेवा हमला हुआ – एक व्यक्ति ने उन्हें मारने की कोशिश की।
फिर भी उन्होंने कभी हार नहीं मानी।
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ज्योतिबा फुले के 10 क्रांतिकारी विचार (2025 में भी प्रासंगिक)
- “शिक्षा ही एकमात्र सीढ़ी है जिससे मनुष्य ऊपर उठ सकता है।”
- “जाति गुलामी का दूसरा नाम है।”
- “बिना शिक्षा के समानता असंभव है।”
- “जो दूसरों को नीचा रखकर ऊँचा बनना चाहते हैं, वे सबसे नीच हैं।”
- “विधवा विवाह न हो तो बलात्कार बढ़ेंगे।”
- “ब्राह्मणों ने शूद्रों को गुलाम बनाकर रखा है।”
- “किसान देश की रीढ़ है, लेकिन उसे लूटा जा रहा है।”
- “महिलाएँ गुलामों की गुलाम हैं।”
- “सभी मनुष्य जन्म से समान हैं।”
- “धर्म का आधार सत्य और न्याय होना चाहिए, न कि अंधविश्वास।”
फुले को मिली उपाधियाँ
- महात्मा – 1888 में मुंबई में एक सभा में (डॉ. आंबेडकर से पहले किसी को महात्मा कहा गया)
- विद्या वीर
- महिला विद्या का पिता
- बहुजन समाज का मसीहा
महात्मा की उपाधि कैसे मिली
महात्मा ज्योतिबा फुले ने जातिवाद, छुआछूत, महिलाओं पर अत्याचार और विधवाओं की दयनीय स्थिति जैसी कुरीतियों के खिलाफ आजीवन संघर्ष किया। वे बालिका शिक्षा के पहले योद्धा थे और विधवा पुनर्विवाह के पक्षधर थे। उनके इन क्रांतिकारी कार्यों से प्रभावित होकर 11 मई 1888 को उनके एक प्रशंसक और सहयोगी विठ्ठलराव कृष्णाजी वंडेकर ने मुंबई में एक विशेष समारोह आयोजित किया और उन्हें औपचारिक रूप से “महात्मा” की उपाधि प्रदान की। बाद में स्वयं महात्मा गांधी ने भी उन्हें “सच्चा महात्मा” कहकर सम्मान दिया।
अंतिम दिन और विरासत
28 नवंबर 1890 को पुणे में 63 वर्ष की आयु में महात्मा ज्योतिबा फुले का देहांत हो गया। उनकी याद में पुणे के फुलेवाड़ा क्षेत्र में स्मारक बनाया गया है। उनकी जीवन-संगिनी सावित्रीबाई फुले ने उनके न रहने के बाद भी शिक्षा और समाज सुधार का कार्य पूरी निष्ठा से जारी रखा और खुद 1897 में प्लेग पीड़ितों की सेवा करते हुए इस दुनिया से विदा हुईं।
आज उनके नाम पर:
- महात्मा ज्योतिबा फुले रोहिलखंड विश्वविद्यालय, बरेली
- ज्योतिबा फुले नगर (अमरोहा)
- सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय
- हर साल 28 नवंबर को महिला मुक्ति दिवस मनाया जाता है।
2025 में ज्योतिबा फुले क्यों प्रासंगिक हैं?
- जातिगत हिंसा आज भी जारी है
- लड़कियों की शिक्षा में अभी भी ग्रामीण क्षेत्रों में कमी है
- किसान आत्महत्या का आंकड़ा बढ़ रहा है
- बहुजन राजनीति में फुले का नाम हर दल लेता है
- सावित्रीबाई फुले को 2024 में भारत रत्न देने की मांग तेज हुई
निष्कर्ष – फुले सिर्फ व्यक्ति नहीं, एक विचारधारा थे
ज्योतिबा फुले वो पहले भारतीय थे जिन्होंने:
- जाति को गुलामी कहा
- महिलाओं को शिक्षित करने के लिए स्कूल खोला
- शूद्र-अतिशूद्र को एकजुट किया
- ब्राह्मणवाद का खुलकर विरोध किया
- किसान-मजदूर की बात की
डॉ. आंबेडकर ने ठीक कहा था:
“ज्योतिबा फुले ने जो सपना देखा था, वह अभी पूरा नहीं हुआ है।”
2025 में भी फुले की पुकार गूंज रही है – “जाति तोड़ो, समाज जोड़ो। शिक्षा लो, अधिकार लो।”
महात्मा ज्योतिबा फुले – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
ज्योतिबा फुले का जन्म कहां हुआ था?
ज्योतिबा फुले का जन्म 11 अप्रैल, 1827 को महाराष्ट्र के सतारा जिले में हुआ था।
ज्योतिबा फुले कौन थे?
महात्मा ज्योतिबा फुले को महान समाज सुधारक, मानवतावादी विचारक, दार्शनिक और लेखक के रूप में याद किया जाता है।
महात्मा फुले का दूसरा नाम क्या था?
ज्योतिराव गोविंदराव फुले को ‘ज्योतिबा फुले’ के नाम से भी जाना जाता है।
ज्योतिबा फुले ने लड़कियों के लिए पहला स्कूल कब खोला था?
वर्ष 1848 में फुले दंपति ने लड़कियों के लिए पहला स्वदेशी रूप से संचालित स्कूल खोला था।
1873 में ज्योतिबा फुले ने किस भाषा में गुलामगिरी लिखी थी?
ज्योतिबा फुले ने मराठी भाषा में यह पुस्तक लिखी थी।
ज्योतिबा फुले की पत्नी का क्या नाम था?
उनकी पत्नी का नाम ‘सावित्रीबाई फुले’ था।
ज्योतिबा फुले की मृत्यु कब और कहां हुई थी?
महात्मा ज्योतिबा फुले का 63 साल की उम्र में 28 नवंबर, 1890 को पुणे में निधन हुआ था।







