Akbar Rajput policy: मुगल साम्राज्य के विस्तार में अकबर की राजपूत बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध हुई, यह नीति में विवाह के माध्यम से गठबंधन बनाना, राजपूत कुलीनों को दरबार में उच्च पद देना और धार्मिक सहिष्णुता को बढ़ावा देना शामिल था। इस नीति का उद्देश्य राजपूतों को वफादार सहयोगी बनाकर एक एकीकृत और स्थिर साम्राज्य की स्थापना करना था। अकबर की राजपूत नीति एक उदार, समावेशी और रणनीतिक दृष्टिकोण थी, जिसका लक्ष्य राजपूतों का समर्थन प्राप्त कर एक स्थिर और विशाल साम्राज्य की स्थापना करना था, और अकबर इसमें पूरी तरह सफल रहा। अकबर की यह नीति उसकी राजनीतिक दूरदृष्टि का उदाहरण है।
अकबर की राजपूत नीति उनके पूर्ववर्तियों से एक महत्वपूर्ण बदलाव थी। अकबर एक महान व्यावहारिक नेता थे। वे पथम मुस्लिम शासक थे जिन्होंने समझा कि भारत में स्थायी साम्राज्य की स्थापना के लिए राजपूतों (शासकों) का सहयोग अनिवार्य है। इसलिए अकबर ने कूटनीति और सैन्य रणनीतियों का मिश्रण अपनाया ताकि राजपूतों पर नियंत्रण प्राप्त करते हुए उनके साथ मित्रता भी स्थापित की जा सके। वह यह समझ चुका था कि बिना राजपूत शासकों के एक स्थायी साम्राज्य बनाना असंभव है।

| आयाम | विवरण | उदाहरण/तथ्य | रणनीतिक महत्व |
|---|---|---|---|
| नीति का मूल स्वरूप | उदार, समावेशी, कूटनीति-प्रधान | राजपूतों को शत्रु → साझेदार बनाना | स्थायी साम्राज्य की नींव |
| विकास के चरण | तीन चरणों में क्रमिक परिवर्तन | 1. 1562-70: विजय + विवाह 2. 1570-80: प्रशासन में शामिल 3. 1580+: धार्मिक समन्वय | दिल्ली सल्तनत → मुगल साम्राज्यवाद का संक्रमण |
| चरण-1: राजनीतिक गठबंधन (1562-70) | सैन्य दबाव + वैवाहिक प्रस्ताव | आमेर का भारमल → मारियम-उज़-ज़मानी (1562) | पहला ब्रेकथ्रू, राजपूत एकता में दरार |
| चरण-2: सैन्य-प्रशासनिक एकीकरण (1570-80) | राजपूत सेनापति, मनसबदार | मान सिंह → हल्दीघाटी (1576) में कमांडर | मुगल सेना की “राजपूत तलवार” |
| चरण-3: सांस्कृतिक समन्वय (1580-1605) | दीन-ए-इलाही, मंदिर संरक्षण | भगवंत दास, टोडर मल → उच्च पद | रूढ़िवाद से विद्रोह, हिंदू-मुस्लिम एकता |
| प्रमुख विशेषताएँ | 5-आयामी रणनीति | 1. वैवाहिक बंधन 2. मनसब प्रणाली 3. धार्मिक स्वतंत्रता 4. आंतरिक स्वायत्तता 5. दंड-पुरस्कार नीति | बहुआयामी नियंत्रण प्रणाली |
| अपनाने के कारण | 4 रणनीतिक आवश्यकताएँ | 1. राजनीतिक थकान (पूर्ववर्ती युद्ध) 2. भौगोलिक नियंत्रण (मेवाड़ पास) 3. विश्वास की कमी (दरबारी षड्यंत्र) 4. राष्ट्रीय एकीकरण (हिंदू-मुस्लिम संतुलन) | साम्राज्यवाद की “राजनीतिक कुशलता” |
| सकारात्मक प्रभाव | 5 क्षेत्रों में क्रांति | 1. साम्राज्य विस्तार (राजपूत सैन्य सहायता) 2. आर्थिक उछाल (शांति → व्यापार) 3. प्रशासनिक संतुलन (राजपूत मनसबदार) 4. सांस्कृतिक संश्लेषण (संस्कृत, इंडो-मुस्लिम कला) 5. राष्ट्रीय छवि (अकबर = चक्रवर्ती सम्राट) | “मुग़ल स्वर्ण युग” की नींव |
| दीर्घकालिक जोखिम | दोहरी रूढ़िवादिता का दबाव | राजपूत अभिजात + मुगल उलेमा का विरोध | औरंगजेब → नीति का अंत, विद्रोह |
| तुलनात्मक विश्लेषण (मुगल शासक) | नीति की निरंतरता/परिवर्तन | बाबर → युद्ध हुमायूँ → अस्थायी गठजोड़ अकबर → समन्वय जहाँगीर/शाहजहाँ → निरंतरता औरंगजेब → विघटन | नीति का “उत्थान-पतन चक्र” |
Akbar Rajput policy | अकबर की राजपूत नीति का अवलोकन
अकबर की राजपूत नीति का मुख्य उद्देश्य राजपूतों के साथ शांति स्थापित करना था। उन्होंने महसूस किया कि भारत पर सफल शासन तभी संभव है जब राजपूतों को मुगल प्रशासन में एकीकृत किया जाए। उन्होंने राजपूतों के प्रति एक सुनियोजित रणनीति अपनाई। अकबर की राजपूत नीति कूटनीति, सहिष्णुता और वैवाहिक गठबंधनों पर आधारित थी। राजपूतों की वीरता, साहस, निष्ठा और युद्ध कौशल से अकबर बेहद प्रभावित थे। इसलिए उन्होंने उन्हें शत्रु बनाने के बजाय साझेदार बनाने का निर्णय लिया।

अकबर की राजपूत नीति का विकास
अकबर की राजपूत नीति राजपूतों और मुगलों के बीच संघर्षपूर्ण संबंधों की पृष्ठभूमि में विकसित हुई। अकबर के गठबंधन नीति के कारण यह संबंध मजबूत हुआ, लेकिन औरंगजेब के समय में यह कमजोर पड़ गया। विभिन्न मुगल शासकों के अधीन इसका विकास नीचे विस्तार से दिया गया है:
बाबर: मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर ने राजपूतों, विशेष रूप से मेवाड़ के राणा के खिलाफ युद्ध लड़ा।
हुमायूँ: बाबर के पुत्र हुमायूँ ने शेर शाह सूरी के खिलाफ कुछ राजपूत राज्यों से गठबंधन किया।
अकबर: उन्होंने राजपूतों के साथ गठबंधन और एकीकरण पर जोर दिया, विवाह संबंध स्थापित किए और उन्हें दरबार में उच्च पद दिए।
जहाँगीर और शाहजहाँ: उन्होंने राजपूतों के साथ गठबंधन और एकीकरण को जारी रखा, उन्हें ऊँचे पद और उपाधियाँ प्रदान कीं।
औरंगजेब: उनके शासन में संबंध बिगड़ गए, क्योंकि उन्होंने कट्टर इस्लामी नीति अपनाई और राजपूतों के विशेषाधिकार वापस ले लिए, जिससे असंतोष और टकराव बढ़ा।
अकबर की राजपूत नीति के चरण
अकबर की राजपूत नीति तीन चरणों में विकसित हुई। पहला चरण राजपूत शासकों के साथ राजनीतिक गठबंधन सुरक्षित करने का था। दूसरा चरण इन संबंधों को मजबूत करने का था। तीसरा चरण मुस्लिम रूढ़िवाद से अकबर के विचलन को दर्शाता है। इस दौरान राजपूत मुगल प्रशासन के साझेदार बन गए। ये नीतियाँ मुगल साम्राज्य के विस्तार और स्थिरता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हुईं।
पहला चरण: 1569-70 तक के इस चरण में अकबर ने दिल्ली सल्तनत की तरह सैन्य विजय और वैवाहिक गठबंधनों पर ध्यान दिया। उनका पहला गठबंधन आमेर के राजा भारमल के साथ हुआ।
दूसरा चरण: 1570 से आगे अकबर ने राजपूतों को मुगल प्रशासन और सेना में शामिल कर गठबंधन को मजबूत किया। राजपूत मुगल सेना की मुख्य शक्ति बन गए। इस चरण में राजपूत निर्णायक सहयोगी साबित हुए। उदाहरण के लिए, 1576 में अकबर ने राजा मान सिंह को राणा प्रताप के खिलाफ मुगल सेना का नेतृत्व सौंपा।
तीसरा चरण: 1580 के बाद इस चरण में अकबर की राजपूत नीति अधिक समावेशी और सहिष्णु हो गई, जो रूढ़िवादी उलेमा से अलगाव को दिखाती है। भगवंत सिंह और मान सिंह को उच्च पदों पर पदोन्नत किया गया। इस चरण में राजपूतों का मुगल शासन में गहरा एकीकरण हुआ।
अपने शासन के अंतिम दिनों में अकबर ने दीन-ए-इलाही नामक एक समन्वयवादी धर्म को बढ़ावा दिया, जो विभिन्न धर्मों के सर्वोत्तम तत्वों को मिलाने का प्रयास था।
अकबर के हिंदू जनता के लिए किए गए प्रमुख कार्य
| कार्य/नीति | तिथि | विवरण | प्रभाव |
|---|---|---|---|
| जजिया कर की समाप्ति | 1564 | गैर-मुस्लिमों (मुख्यतः हिंदुओं) पर लगने वाले भेदभावपूर्ण कर को समाप्त किया। | धार्मिक समानता और आर्थिक राहत मिली। |
| तीर्थ यात्रा कर की समाप्ति | 1563 | हिंदू तीर्थ यात्रा पर लगने वाले कर को हटा दिया। | हिंदू धार्मिक स्वतंत्रता को बढ़ावा। |
| हिंदू त्योहारों में भागीदारी (होली) | 1560 के दशक से | अकबर ने होली, दीपावली, राम नवमी आदि हिंदू त्योहारों में उत्साहपूर्वक भाग लिया। | सांस्कृतिक एकीकरण और सद्भाव बढ़ा। |
| इबादत खाना की स्थापना | 1575 | फतेहपुर सीकरी में सभी धर्मों के विद्वानों के लिए बहस का केंद्र स्थापित। | अंतरधार्मिक संवाद को प्रोत्साहन। |
| दीन-ए-इलाही का प्रारंभ | 1582 | हिंदू, इस्लाम आदि धर्मों के तत्वों से युक्त समन्वयवादी धर्म की शुरुआत। | धार्मिक सहिष्णुता का प्रतीक। |
| गौ-हत्या पर प्रतिबंध | 1560 के दशक से | हिंदू भावनाओं का सम्मान करते हुए कुछ दिनों में गौ-हत्या निषिद्ध की। | हिंदू समुदाय में विश्वास बढ़ा। |
| हिंदू मंदिरों का निर्माण/मरम्मत | 1560-1600 | हिंदुओं को नए मंदिर बनाने और पुराने की मरम्मत की अनुमति दी। | धार्मिक स्थलों की रक्षा। |
| हिंदुओं को उच्च पद प्रदान | 1560 के दशक से | राजा टोडर मल (वित्त मंत्री), बीरबल आदि को उच्च प्रशासनिक पद दिए। | समावेशी प्रशासन की स्थापना। |
| वैवाहिक गठबंधन (राजपूत राजकुमारियाँ) | 1562 से | राजा भारमल की पुत्री (मरियम-उज़-ज़मानी) से विवाह। | राजनीतिक-सामाजिक एकता मजबूत। |
| सती प्रथा पर प्रतिबंध | 1560 के अंत से | विधवाओं की रक्षा के लिए सती प्रथा को नियंत्रित/निषिद्ध किया। | सामाजिक सुधार और महिलाओं की सुरक्षा। |
अकबर की राजपूत नीति की विशेषताएँ
अकबर के राजपूत शासक मित्र और उनकी राजपूत रानियाँ
(अकबर ने मुख्य रूप से 3-4 प्रमुख राजपूत राजकुमारियों से विवाह किया, जो उनकी राजपूत नीति का आधार बने। )
| क्र.सं. | राजपूत शासक (मित्र) | राजपूत रानी का नाम | विवाह की तिथि | विशेष टिप्पणी |
|---|---|---|---|---|
| 1 | राजा भारमल (आमेर/अंबर) | हरखा बाई (मरियम-उज़-ज़मानी, जोधा बाई के नाम से भी जानी जातीं) | 6 फरवरी 1562 | अकबर की पहली प्रमुख राजपूत रानी; जहाँगीर की माता। आमेर के साथ मजबूत गठबंधन की शुरुआत। |
| 2 | राव कल्यान मल (बीकानेर) | राज कुंवरी (राज रानी) | 1570 | बीकानेर राज्य के साथ राजनीतिक एकीकरण; राजा कन्हा (कल्यान मल के भाई) की पुत्री। |
| 3 | राव चंद्रसेन (मारवाड़/जोधपुर) | नाम अज्ञात (मारवाड़ राजकुमारी) | 1583 | जोधपुर के साथ संधि; इस विवाह ने राजपूताना के पश्चिमी क्षेत्रों को मुगल साम्राज्य से जोड़ा। |
| 4 | राव हरि राज (जैसलमेर) | नाथिबाई (कुंवर कुमारी) | लगभग 1570 | जैसलमेर के साथ सहयोग; राव के पुत्र सुल्तान सिंह को मुगल दरबार में स्थान मिला। |
अकबर की राजपूत नीति में कूटनीति, वैवाहिक संबंध और सैन्य रणनीतियाँ शामिल थीं। इस रणनीति का उद्देश्य राजपूत राजाओं की निष्ठा सुनिश्चित करना और एक स्थिर, बहुसांस्कृतिक साम्राज्य बनाना था। अकबर की धार्मिक नीति की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
वैवाहिक गठबंधन: अकबर ने राजपूतों से वैवाहिक संबंध स्थापित किए। 1562 में आमेर के राजा भारमल की पुत्री मारियम-उज़-ज़मानी से विवाह कर अकबर ने आमेर के साथ संबंध बनाए।
कुलीन वर्ग में समावेश: अकबर ने योग्यता और क्षमता के आधार पर राजपूतों को प्रशासन में उच्च मनसब पद सौंपे, जैसे राजा भगवान दास और राजा टोडर मल।
धार्मिक सहिष्णुता: अकबर ने राजपूतों की धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान किया, उन्हें मंदिर बनाने, अपनी आस्था का पालन करने और त्योहार मनाने की अनुमति दी।
आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना: अकबर ने उन राजपूत राज्यों के आंतरिक प्रशासन में हस्तक्षेप नहीं किया जो उन्हें अपना शासक मानते थे।
लाठी और गाजर की नीति (किसी को प्रेरित करने या नियंत्रित करने के लिए पुरस्कार (गाजर) और दंड (छड़ी) दोनों का संयोजन इस्तेमाल करना।): अकबर ने अपनी संप्रभुता स्वीकार न करने वाले राजपूत शासकों के खिलाफ सैन्य अभियान चलाए, लेकिन हार के बाद उन्हें सम्मान और गरिमा के साथ व्यवहार किया।
अकबर के दरबार के प्रमुख राजपूत सहयोगी: मनसब, पद एवं योगदान
| क्र.सं. | राजपूत सहयोगी | राज्य/वंश | उच्चतम मनसब रैंक | प्रमुख पद/योगदान | विशेष टिप्पणी |
|---|---|---|---|---|---|
| 1 | राजा मान सिंह | आमेर (कछवाहा) | 7000 जात + 7000 सवार | – बिहार, बंगाल, काबुल का सूबेदार – हल्दीघाटी युद्ध (1576) में मुगल सेनापति – दक्कन अभियान | अकबर का सबसे विश्वसनीय सेनापति; जहाँगीर का मामा |
| 2 | राजा भगवान दास | आमेर (कछवाहा) | 5000 जात | – पंजाब का सूबेदार – अकबर के वैवाहिक गठबंधन का प्रथम सूत्रधार | मारियम-उज़-ज़मानी के पिता; दरबार में उच्च सम्मान |
| 3 | राजा टोडर मल | खत्री-राजपूत (लाहौर) | 4000 → 5000 जात | – वित्त मंत्री (दीवान-ए-आशरफ) – दबिस्तान-ए-मजाहिब लेखक – राजस्व सुधार (दहसाला प्रणाली) | अकबर का “राजस्व का जादूगर”; हिंदू मनसबदारों में सर्वोच्च |
| 4 | राय सिंह | बीकानेर (राठौड़) | 5000 जात | – गुजरात, दक्कन का सूबेदार – कंधार अभियान में नेतृत्व | बीकानेर की राजकुमारी से अकबर का वैवाहिक संबंध |
| 5 | राजा रायसल दर्शन | जैसलमेर (भाटी) | 3000 जात | – राजस्थान अभियानों में सहायक सेनापति | जैसलमेर को मुगल साम्राज्य में शामिल करने में भूमिका |
| 6 | कुंवर भगवंत सिंह | जोधपुर (राठौड़) | 5000 जात | – गुजरात का सूबेदार – दक्कन में सैन्य कमांडर | मारवाड़ के साथ बाद में गठबंधन; अकबर की नीति का लाभार्थी |
| 7 | राजा जसवंत सिंह (शाहजहाँ काल में प्रमुख, अकबर काल में प्रारंभिक) | जोधपुर | 4000 जात | – दरबार में उच्च पद (अकबर के अंतिम वर्षों में) | मारवाड़ के साथ संबंधों का प्रतीक |
अकबर की राजपूत नीति के कारण
अकबर की राजपूत नीति केवल कूटनीतिक कदम नहीं थी, बल्कि मुगल साम्राज्य के समेकन और विस्तार की रणनीतिक आवश्यकता थी। राजपूतों से गठबंधन कर अकबर ने राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित की, सैन्य समर्थन मजबूत किया, राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा दिया और उनकी प्रशासनिक कुशलता का लाभ उठाया।
राजनीतिक स्थिरता: अकबर नहीं चाहते थे कि राजपूतों से युद्ध हो, क्योंकि इससे पहले के मुगल शासक कमजोर हो चुके थे।
मुगल साम्राज्य का विस्तार: राजपूत मेवाड़ जैसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर नियंत्रण रखते थे, जिन्हें अकबर को अपने साम्राज्य के समेकन और विस्तार के लिए नियंत्रित करना जरूरी था।
वफादार साझेदार: अकबर को दरबार में षड्यंत्रों का सामना करना पड़ता था, इसलिए उन्होंने राजपूतों को विश्वसनीय मित्र माना जो उनके शासन की स्थिरता सुनिश्चित करेंगे।
राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा: अकबर राष्ट्रीय सम्राट बनना चाहते थे, इसके लिए हिंदू और मुस्लिम दोनों का सहयोग राजनीतिक शक्ति के लिए आवश्यक था।
अकबर की राजपूत नीति का प्रभाव
अकबर की राजपूत नीति ने राजपूतों के साथ दीर्घकालिक निष्ठा स्थापित कर मुगल साम्राज्य को मजबूत किया। इस निष्ठा ने राजनीतिक स्थिरता, सांस्कृतिक एकीकरण, कुशल प्रशासन और साम्राज्य के क्षेत्रीय विस्तार को सुनिश्चित किया। प्रभाव निम्नलिखित हैं:
मुगल साम्राज्य का विस्तार: राजपूत राजाओं से भारी सैन्य सहायता मिलने से अकबर कई क्षेत्रों पर विजय प्राप्त करने में सफल रहे।
आर्थिक समृद्धि: राजपूतों से मित्रता ने शांति और स्थिरता लाई, जिससे देश में आर्थिक समृद्धि बढ़ी।
अकबर की प्रतिष्ठा में वृद्धि: राजपूतों द्वारा अकबर को स्वीकार करने से वे राष्ट्रीय शासक बन सके।
समावेशी प्रशासन: राजपूत शासकों को उच्च मनसब और प्रशासन में महत्वपूर्ण पद दिए गए, जिससे संतुलित प्रशासन और राजनीति बनी।
सांस्कृतिक एकीकरण: अकबर की राजपूत नीति सांस्कृतिक एकीकरण का उदाहरण थी, जिसमें अन्य धर्मों के प्रति सहिष्णुता और संस्कृत तथा हिंदी जैसी भाषाओं को प्रोत्साहन दिया गया। उन्होंने हिंदू त्योहार भी मनाए, जो उनकी समावेशी नीतियों को दर्शाता है।
इसके अलावा, इससे इंडो-मुस्लिम कला नामक एक नई कला शैली का विकास हुआ।
निष्कर्ष
अकबर की राजपूत नीति शुरू में राजनीतिक गठबंधन के रूप में शुरू हुई, लेकिन बाद में यह हिंदू-मुस्लिमों के बीच घनिष्ठ संबंध में बदल गई, जो सभी के प्रति उदार और सहिष्णु नीति को बढ़ावा देती थी। न्याय की अवधारणा विस्तृत हुई, जिसमें धर्म, जाति या नस्ल के बावजूद सभी के लिए न्याय पर जोर दिया गया। अकबर की राजपूत नीति ने मुगल साम्राज्य के विस्तार में मदद की। हालांकि, राजपूतों और मुगल अभिजात वर्ग की रूढ़िवादिता के कारण यह नीति दबाव में आई, क्योंकि वे डरते थे कि उदार नीति उनकी प्रभुत्व स्थिति को नुकसान पहुँचाएगी, जिसके परिणामस्वरूप मुगल-राजपूत संबंधों में गिरावट आई।
Q1. राजपूत नीति किसने शुरू की?
Q2. राजपूत नीति क्या थी?
Q3. अकबर ने राजपूतों के प्रति उदार नीति क्यों अपनाई?
Q4. अकबर की राजपूत नीति का धार्मिक सहिष्णुता पर क्या प्रभाव पड़ा?
Q5. किस राजपूत शासक ने अकबर की राजपूत नीति में शामिल नहीं हुआ?
Sources-BajiramanandRavi
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