Indus Valley Civilizationin- सिन्धु घाटी की सभ्यता, जिसे हड़प्पा सभ्यता (सैंधव सभ्यता, कांस्य युग की सभ्यता) भी कहा जाता है, विश्व की सबसे प्राचीन शहरी (नगरीय) सभ्यताओं में से एक है। यह लगभग 3300 ईसा पूर्व से 1300 ईसा पूर्व तक फली-फूली और वर्तमान पाकिस्तान तथा उत्तर-पश्चिमी भारत के क्षेत्रों में फैली हुई थी। सिन्धु नदी के किनारे स्थित सिन्धु घाटी इस सभ्यता का केंद्र थी। यह सभ्यता अपने सुव्यवस्थित शहरों, आधुनिक जल निकास प्रणाली, व्यापार और वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है। आज भी, यह सभ्यता हमारी मानव इतिहास की नींव को समझने का महत्वपूर्ण स्रोत है, क्योंकि यह दर्शाती है कि प्राचीन लोग कृषि, शहरी जीवन और सांस्कृतिक विकास में कितने कुशल हो चुके थे।
इस लेख में हम सिन्धु घाटी की सभ्यता के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करेंगे, जैसे इसकी खोज, भौगोलिक सीमाएँ, सामाजिक संरचना, अर्थव्यवस्था और यह कैसे समाप्त हुई। यह सभ्यता न केवल दक्षिण एशिया के इतिहास का हिस्सा है बल्कि वैश्विक स्तर पर प्राचीन सभ्यताओं की एक मिसाल है।

| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| काल | 3300 ई.पू. – 1300 ई.पू. (चरम काल: 2600–1900 ई.पू.) |
| प्रमुख नगर | हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, धोलावीरा, लोथल, कालीबंगन |
| खुदाईकर्ता (हड़प्पा) | दयाराम साहनी (1921) – पहली बार खोज, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण |
| खुदाईकर्ता (मोहनजोदड़ो) | राखाल दास बनर्जी (1922) – महास्नानघर, अनाज भंडार की खोज |
| खुदाईकर्ता (लोथल) | एस. आर. राव (1955–1962) – विश्व का पहला कृत्रिम बंदरगाह खोजा |
| खुदाईकर्ता (धोलावीरा) | जगत पति जोशी (1967–68, 1990–2003) – साइनबोर्ड, जल प्रबंधन की खोज |
| खुदाईकर्ता (कालीबंगन) | बी. बी. लाल & बी. के. थापर (1961–69) – हल की रेखाएँ, अग्नि-वेदियाँ |
| नगर नियोजन | ग्रिड पैटर्न, समकोण सड़कें, ढकी नालियाँ, मानक ईंटें (1:2:4) |
| प्रसिद्ध स्मारक | महास्नानघर (मोहनजोदड़ो), अनाज भंडार, लोथल बंदरगाह |
| व्यापार | मेसोपोटामिया, ओमान, अफगानिस्तान; ताँबा, सोना, पत्थर आयात |
| कृषि | गेहूँ, जौ, कपास (विश्व में पहली), दो फसल प्रणाली |
| लिपि | सिन्धु लिपि (अनपढ़, 400+ चिह्न), मुहरों पर, 1853 में पहला नमूना |
| पतन | 1900 ई.पू. बाद – जलवायु परिवर्तन, बाढ़, नदी मार्ग परिवर्तन |
Indus Valley Civilizationin: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
सिन्धु घाटी की सभ्यता की शुरुआत नवपाषाण युग (Neolithic Period) से होती है, जब लोग खेती और पशुपालन शुरू कर चुके थे। लगभग 7000 ईसा पूर्व से, सिन्धु घाटी में स्थायी बस्तियाँ मौजूद थीं, जहाँ लोग गेहूँ, जौ और कपास जैसी फसलों की खेती करते थे। यह सभ्यता मेसोपोटामिया (इराक की प्राचीन सभ्यता) और मिस्र की प्राचीन सभ्यता के समकालीन थी, लेकिन इसकी अपनी अनोखी विशेषताएँ थीं।
इस काल में मौसमी बरसात और सिन्धु नदी की प्रचुर जल आपूर्ति ने कृषि क्रांति को जन्म दिया। लोगों ने मिट्टी के बर्तन बनाना, धातुओं की नक्काशी और व्यापारिक मार्ग तैयार किए। शुरू में, यह सभ्यता छोटे गाँवों पर आधारित थी, जो धीरे-धीरे बड़े शहरों में बदल गई। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसे शहर इसकी महानता की निशानियाँ हैं, जहाँ हजारों लोग रहते थे। इस सभ्यता की परिपक्वता का दौर 2600 ईसा पूर्व से शुरू हुआ, जब शहरी योजना चरम पर पहुँच गई।
खोज और खुदाई
सिन्धु घाटी की सभ्यता की खोज 19वीं शताब्दी के अंत में हुई, जब ब्रिटिश काल में रेलवे लाइन बिछाने के दौरान हड़प्पा (वर्तमान पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में) में मिट्टी की मुहरें और अन्य अवशेष सामने आए। 1921 में, हड़प्पा की औपचारिक खुदाई शुरू हुई, जिसका नेतृत्व ब्रिटिश पुरातत्वविद् जॉन मार्शल ने किया।
1922 में, मोहनजोदड़ो (सिन्धु, पाकिस्तान) की खुदाई ने दुनिया को आश्चर्यचकित कर दिया। यहाँ से मिले महास्नानघर (Great Bath), महल और सड़कों की प्रणाली ने सिद्ध किया कि यह एक उच्च स्तर की नगरीय सभ्यता थी। 20वीं शताब्दी के दौरान, हजारों स्थलों की खुदाई हुई, जिनमें कालीबंगन (गुजरात, भारत) और लोथल (गुजरात) शामिल हैं। इन खुदाइयों से हजारों अवशेष मिले, जैसे मिट्टी के बर्तन, आभूषण, मूर्तियाँ और मोहरें, जो आज लाहौर, नेशनल म्यूज़ियम दिल्ली और पाकिस्तान के संग्रहालयों में सुरक्षित हैं।
यह खोज ने न केवल दक्षिण एशिया के इतिहास को बदल दिया बल्कि वैश्विक पुरातत्व को नई दिशा दी। आज भी, नई तकनीक जैसे सैटेलाइट इमेजिंग और डीएनए विश्लेषण से और रहस्य खुल रहे हैं। इस सभ्यता के उद्भव से पूर्व भारत का इतिहास वैदिक संस्कृति से शुरू होता था, मगर इस सभ्यता ने उसे कई हज़ार साल पीछे पहुंचा दिया।

हड़प्पा की नामोत्पत्ति
सिन्धु घाटी सभ्यता का नाम इसकी भौगोलिक स्थिति से प्रेरित है, जहाँ यह मुख्यतः प्राचीन इण्डस (Indus) नदी और उसकी सहायक नदियों के विशाल जलप्रवाह क्षेत्र में विकसित हुई। फारसी और यूनानी यात्रियों ने इस नदी को ‘इण्डस’ कहा, जो संस्कृत के ‘सिन्धु’ शब्द से विकसित हुआ। समय के साथ स्थानीय उच्चारण में यह ‘सिन्धु’ बन गया। यही कारण है कि इस क्षेत्र में बसने वाले लोगों को बाद में ‘हिन्दू’ कहा जाने लगा, क्योंकि फारसी में ‘स’ का उच्चारण ‘ह’ में बदल जाता है। इस प्रकार ‘सिन्धु → हिन्दू → हिन्दुस्तान’ की शब्द-यात्रा शुरू हुई। यूनानियों ने सम्भवतः इण्डस (Indus) से ही भारत को इंडिया (India) कहा।
प्रारम्भ में पुरातत्वविदों ने इसे ‘सिन्धु घाटी सभ्यता’ नाम दिया, क्योंकि हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसे खोजे गए प्राथमिक स्थल सिन्धु नदी के आसपास थे। लेकिन जैसे-जैसे खुदाई आगे बढ़ी, लोथल (गुजरात), कालीबंगन (राजस्थान), बनावली (हरियाणा), रोपड़ (पंजाब) और राखीगढ़ी (हरियाणा) जैसे स्थल सामने आए, जो सिन्धु जलप्रवाह से बहुत दूर थे। इससे सिद्ध हुआ कि यह सभ्यता केवल सिन्धु घाटी तक सीमित नहीं थी।
इसलिए कई विद्वान इसे ‘हड़प्पा सभ्यता’ कहना अधिक उपयुक्त मानते हैं, क्योंकि हड़प्पा इस सभ्यता का प्रथम औपचारिक रूप से खोजा गया और सबसे अधिक विशेषताओं के साथ मिला है। वास्तव में प्राचीन नदी का मूल नाम ‘अन्दुस’ (Andus) था, जिसका उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तत्कालीन महानिदेशक जॉन मार्शल ने 1924 में अपने तीन ऐतिहासिक शोध-ग्रंथों में इस सभ्यता को पहली बार ‘इण्डस सिविलाइज़ेशन’ की संज्ञा दी, जिसका हिंदी अनुवाद ‘सिन्धु घाटी सभ्यता’ हुआ। आज दोनों नाम प्रचलित हैं, पर ‘हड़प्पा सभ्यता’ अधिक वैज्ञानिक और व्यापक माना जाता है।
हड़प्पा सभ्यता भौगोलिक विस्तार
सिन्धु घाटी सभ्यता का विस्तार दुनिया की किसी भी प्राचीन सभ्यता से कई गुना बड़ा था। इसका कुल क्षेत्रफल लगभग 20 लाख वर्ग किलोमीटर था, जो प्राचीन मिस्र और मेसोपोटामिया को मिलाकर भी उससे बड़ा था। तीसरी और दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व में पृथ्वी पर कोई भी सभ्यता इतनी विशाल नहीं थी। इसका मूल केंद्र पंजाब और सिन्ध में था, जहाँ हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसे पूर्ण विकसित नगर बसे। इसके बाद यह दक्षिण में महाराष्ट्र तक और पूर्व में मेरठ-कुरुक्षेत्र तक फैल गई।
इस सभ्यता का फैलाव त्रिभुजाकार था:
- उत्तर: जम्मू का माण्डा (चेनाब तट)
- दक्षिण: महाराष्ट्र का दैमाबाद
- पश्चिम: बलूचिस्तान का सुत्कागेनडोर (मकरान समुद्र तट)
- पूर्व: उत्तर प्रदेश का आलमगीरपुर (हिण्डन नदी, मेरठ)
इसमें पंजाब, सिन्ध, बलूचिस्तान के साथ-साथ गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के कुछ हिस्से शामिल थे। अब तक 1,500 से अधिक स्थल खोजे जा चुके हैं, जिनमें आरंभिक, परिपक्व और उत्तर-हड़प्पाई तीनों अवस्थाएँ हैं। परिपक्व अवस्था के मात्र 6–7 स्थल ही नगर कहलाने योग्य हैं, जिनमें हड़प्पा और मोहनजोदड़ो सर्वोच्च हैं। ये दोनों 483 किमी दूर थे और सिन्धु नदी से जुड़े हुए थे।
इस सभ्यता की खोज से पहले विद्वान मानते थे कि भारत में सभ्यता का आरंभ आर्यों से हुआ। लेकिन 1826 में चार्ल्स मैसन को हड़प्पा के अवशेष मिले, और 1921–22 में हड़प्पा-मोहनजोदड़ो की खुदाई ने साबित कर दिया कि आर्यों के आने से हजारों साल पहले भारत में उन्नत शहरी सभ्यता फल-फूल रही थी। इसीलिए इसे ‘सिन्धु घाटी सभ्यता’ या ‘हड़प्पा संस्कृति’ कहा गया।
हड़प्पा सभ्यता के प्रमुख नगर
| नगर | स्थान | विशेषता |
|---|---|---|
| हड़प्पा | पंजाब, पाकिस्तान | अनाज भंडार, कब्रिस्तान |
| मोहनजोदड़ो | सिन्ध, पाकिस्तान | महास्नानघर, नृत्यकारी कन्या |
| चन्हुदड़ो | सिन्ध, पाकिस्तान | मोतियों की फैक्ट्री, 130 किमी दक्षिण |
| लोथल | गुजरात, भारत | विश्व का पहला कृत्रिम बंदरगाह |
| कालीबंगन | राजस्थान | हल के निशान, अग्नि-वेदियाँ |
| बनावली | हरियाणा | जौ की खेती, किले जैसी दीवार |
| धोलावीरा | कच्छ, गुजरात | विशाल जलाशय, साइनबोर्ड |
| राखीगढ़ी | हरियाणा | सबसे बड़ा हड़प्पाई शहर |
अन्य महत्वपूर्ण स्थल
- अफगानिस्तान: शोर्तुगई (नहरें), मुन्दिगाक
- गुजरात: सुरकोटड़ा (नगर-दुर्ग), रंगपुर, रोजड़ी (उत्तर-हड़प्पाई)
- हरियाणा: भिरड़ाना, कुणाल, मीताथल
- पंजाब (भारत): रोपड़, संघोल
- महाराष्ट्र: दैमाबाद
- जम्मू: माण्डा
- उत्तर प्रदेश: आलमगीरपुर
यह विशाल क्षेत्र आधुनिक पाकिस्तान से कहीं बड़ा था और हिन्दुकुश से कच्छ की खाड़ी तक फैला हुआ था। इसकी विविधता और विस्तार ही इसे विश्व की सबसे बड़ी प्राचीन शहरी सभ्यता बनाता है।
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हड़प्पा सभ्यता की नगर निर्माण योजना
सिन्धु घाटी सभ्यता के भवनों में पक्की ईंटों का बड़े पैमाने पर प्रयोग हुआ था। निर्माण की विशेष आवश्यकताओं के लिए एल-आकार (L-shaped) ईंटें भी बनाई जाती थीं, जो कोनों में मजबूती प्रदान करती थीं। गारे के लिए मिट्टी और चूने का मिश्रण इस्तेमाल होता था।
मकान ऊँचे चबूतरे पर बनाए जाते थे ताकि बाढ़ और वर्षा के पानी से सुरक्षा रहे। अधिकांश मकान एक या दो मंजिला होते थे। नीचे की मंजिल में कुआँ और रसोईघर होता था, जबकि ऊपर जाने के लिए संकरी सीढ़ियाँ बनी होती थीं।
हर मकान की योजना केंद्रीय आंगन पर आधारित थी, जिसके चारों ओर कमरे व्यवस्थित होते थे। छतें लकड़ी और मिट्टी से बनाई जाती थीं। प्रत्येक मकान में स्नानघर अवश्य होता था, जो मकान के आगे की ओर बनाया जाता था ताकि पानी सीधे सड़क की ढकी नालियों में बह जाए। यह व्यवस्था स्वच्छता और जल-निकास में अद्वितीय थी।
दुर्ग और निचला शहर
- दुर्ग (Citadel): ऊँचे चबूतरे पर, शासक वर्ग के लिए।
- निचला शहर: सामान्य लोगों के लिए, ईंटों के मकान।

सिन्धु घाटी सभ्यता की सबसे अनोखी विशेषता थी इसकी उन्नत और सुनियोजित नगर निर्माण प्रणाली। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसे प्रमुख नगर दो भागों में बँटे थे: एक दुर्ग (ऊँचे चबूतरे पर बना, जहाँ शासक वर्ग या प्रशासक रहते थे) और दूसरा निचला शहर (जहाँ आम लोग पक्की ईंटों के मकानों में रहते थे)। सभी नगर जाल की तरह व्यवस्थित थे – सड़कें सीधी और समकोण पर मिलती थीं, जिससे पूरा शहर आयताकार खण्डों में विभाजित हो जाता था। यह योजना छोटी बस्तियों से लेकर बड़े नगरों तक एकसमान थी। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के विशाल भवन और स्मारक यह सिद्ध करते हैं कि शासक मजदूरों को संगठित करने, संसाधन जुटाने और कर प्रबंधन में अत्यंत कुशल थे। इतनी भव्य ईंटों की इमारतें देखकर आम जनता भी शासकों की शक्ति और प्रतिष्ठा से प्रभावित होती होगी।

| नगर | विशेष निर्माण |
|---|---|
| धोलावीरा | 16 जलाशय, स्टेडियम जैसी संरचना, साइनबोर्ड |
| लोथल | कृत्रिम बंदरगाह, गोदी, ईंटों का चबूतरा |
| कालीबंगन | अग्नि-वेदियाँ, हल के निशान (प्राक्-हड़प्पाई) |
मोहनजोदड़ो का सबसे प्रसिद्ध स्थल है विशाल सार्वजनिक स्नानघर (महास्नानघर), जो दुर्ग क्षेत्र में स्थित है। यह ईंटों के स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना है। इसका जलाशय 11.88 मीटर लंबा, 7.01 मीटर चौड़ा और 2.43 मीटर गहरा है। दोनों सिरों पर सीढ़ियाँ हैं जो तल तक जाती हैं, पास में कपड़े बदलने के कमरे हैं और फर्श पक्की ईंटों का बना है। एक बड़े कुएँ से पानी निकालकर हौज़ में डाला जाता था, जिसके कोने में निर्गम द्वार था – पानी नाले में बह जाता था। विद्वान मानते हैं कि यह धार्मिक अनुष्ठानों के लिए स्नान हेतु बना था, जैसा कि भारत में आज भी पवित्र नदियों में स्नान की परंपरा है। मोहनजोदड़ो में ही सबसे बड़ा अनाज भंडार मिला, जो 45.71 × 15.23 मीटर का था।

| स्थल | विशेषता |
|---|---|
| मोहनजोदड़ो | 700+ कुएँ, ढकी नालियाँ |
| कालीबंगन | प्रत्येक घर में कुआँ |
| बनावली | सड़क-नाली अवशेष |
हड़प्पा के दुर्ग में छः अनाज कोठार मिले, जो ईंटों के चबूतरे पर दो पंक्तियों में बने थे। प्रत्येक कोठार 15.23 मीटर लंबा और 6.09 मीटर चौड़ा था, नदी तट से कुछ मीटर दूर। कुल 12 इकाइयों का क्षेत्रफल लगभग 838 वर्ग मीटर था – मोहनजोदड़ो के कोठार जितना ही। कोठारों के दक्षिण में खुला फर्श था, जहाँ दो कतारों में गोल ईंट चबूतरे बने थे। फर्श की दरारों में गेहूँ और जौ के दाने मिले, जो बताते हैं कि यहाँ फसल सुखाई और दवाई जाती थी। हड़प्पा में दो कमरों वाले बैरक भी मिले, जो संभवतः मजदूरों के रहने के लिए थे। कालीबंगन के दक्षिणी भाग में भी ईंटों के चबूतरे मिले, जो कोठारों के अवशेष हो सकते हैं। इस प्रकार अनाज भंडारण हड़प्पा संस्कृति का अभिन्न अंग था।
| स्थल | संख्या | कुल क्षेत्र |
|---|---|---|
| मोहनजोदड़ो | 1 | ~700 वर्ग मीटर |
| हड़प्पा | 6 | ~838 वर्ग मीटर |
इस सभ्यता में ईंटों का उपयोग अद्वितीय था। समकालीन मिस्र में सूखी ईंटें और मेसोपोटामिया में सीमित पक्की ईंटें प्रयोग होती थीं, लेकिन सिन्धु में बड़े पैमाने पर पक्की ईंटें बनीं। मोहनजोदड़ो की जल-निकास प्रणाली विश्व की सबसे उन्नत थी। हर घर में प्रांगण, स्नानघर और कुआँ होता था। कालीबंगन में कई घरों में निजी कुएँ थे। घर का पानी सड़कों के नीचे बनी नालियों (मोरियाँ) में जाता था, जो ईंटों और पत्थर की सिल्लियों से ढकी होती थीं। इन नालियों में निरीक्षण छिद्र भी थे। बनावली में भी सड़क और नाली के अवशेष मिले हैं। यह प्रणाली स्वच्छता और बाढ़ नियंत्रण में अद्भुत थी।
| नगर | सड़क चौड़ाई | ग्रिड पैटर्न |
|---|---|---|
| मोहनजोदड़ो | 9–12 मीटर | हाँ |
| हड़प्पा | 9 मीटर | हाँ |
| धोलावीरा | 10 मीटर | हाँ |
ग्रिड पैटर्न और सड़कें
- सड़कें: 9–12 मीटर चौड़ी, सीधी और समकोण पर काटती हुई।
- शहर का विभाजन: आयताकार खण्डों में, जैसे आज के मैनहट्टन।
- समानता: छोटी बस्तियों से लेकर बड़े नगरों तक एक ही योजना।
महान स्नानागार (Great Bath), मोहनजोदड़ो
- आकार: 11.88 × 7.01 × 2.43 मीटर
- निर्माण: जलरोधक पक्की ईंटें, बिटुमेन सीलिंग
- विशेषताएँ:
- दोनों तरफ सीढ़ियाँ
- कपड़े बदलने के कमरे
- पास में कुआँ → हौज़ → नाला (पूर्ण जल-निकास)
- उद्देश्य: धार्मिक स्नान (आज के कुंभ मेलों जैसा)
अनाज भंडार (Granaries)
| स्थल | संख्या | आकार | विशेषता |
|---|---|---|---|
| मोहनजोदड़ो | 1 | 45.71 × 15.23 मीटर | सबसे बड़ा |
| हड़प्पा | 6 (दो पंक्तियों में) | प्रत्येक 15.23 × 6.09 मीटर | नदी से 1 मीटर दूर, हवादार |
- हड़प्पा में: दक्षिण में खुला आंगन, ईंट के गोल चबूतरे – दाने सुखाने के लिए।
- कालीबंगन: दक्षिण में ईंटों के चबूतरे – संभावित कोठार।
| विशेषता | सिन्धु | मिस्र | मेसोपोटामिया |
|---|---|---|---|
| ग्रिड पैटर्न | हाँ | नहीं | नहीं |
| ढकी नालियाँ | हाँ | नहीं | सीमित |
| पक्की ईंटें | बड़े पैमाने पर | नहीं | सीमित |
| सार्वजनिक स्नान | हाँ | नहीं | नहीं |
शिल्प और तकनीकी ज्ञान

सिन्धु घाटी के कारीगर काँस्य युग के माहिर थे। पत्थर के औजार तो प्रचलित थे, पर ताँबा + टिन मिलाकर वे कांस्य बनाते थे – भले ही दोनों खनिज दूर से आयात होते थे। सूती कपड़े बुनना, नाव निर्माण, मुद्रा (सील) उकेरना, मूर्तिकला और चित्रित मिट्टी के बर्तन उनके प्रमुख शिल्प थे। मोहनजोदड़ो की कांस्य नर्तकी मूर्ति (कराची संग्रहालय) उनकी सूक्ष्म कारीगरी का जीता प्रमाण है। धोलावीरा के उत्तरी द्वार पर 2000 ई. में मिले 10 विशाल चिह्न (साइनबोर्ड) विश्व के सबसे पुराने विज्ञापन माने जाते हैं।

लेखन कला का आविष्कार हुआ। हड़प्पाई लिपि (385+ चिह्न) 1853 में पहली बार मिली, 1923 में पूरी तरह सामने आई – पर अब तक अनपढ़ है। यह व्यापार, संपत्ति और प्रशासन के लिए थी। मानक बाट-खरे (पत्थर के) मिले, जिनमें 16 का गुणज (16, 32, 64, 160, 320, 640, 1280) प्रणाली थी। हैरानी की बात: आधुनिक भारत में 1 रुपया = 16 आना, 1 किलो = 16 छटाँक – 5000 साल पुरानी परंपरा आज भी जीवित है!
| तकनीक | विशेषता |
|---|---|
| कांस्य | ताँबा (राजस्थान) + टिन (अफगानिस्तान) |
| माप-तौल | 16-आधारित (दशमलव नहीं) |
| लिपि | दाएँ-से-बाएँ, अपठनीय |
| कपड़ा | विश्व में पहली सूती वस्त्र |
आनुवंशिकी
2019 के राखीगढ़ी डीएनए विश्लेषण से पता चला:
- सैन्धव लोग आर्यों से पूरी तरह भिन्न थे।
- दो समूहों का मिश्रण:
- भारत के मूल निवासी (अंडमानी जैसे)
- प्राचीन ईरानी कृषक
- मिश्रण 10,000 ई.पू. से शुरू।
- आर1ए जीन (आर्य मार्कर) अनुपस्थित → आर्य-पूर्व सभ्यता की पुष्टि।
राजनैतिक जीवन
सिन्धु घाटी सभ्यता की भव्य नगर योजना, विशाल सार्वजनिक स्नानघर और दूर-दूर तक फैले व्यापारिक नेटवर्क यह साफ दर्शाते हैं कि किसी मजबूत केंद्रीय शक्ति के बिना यह सब संभव नहीं था। लेकिन आश्चर्यजनक बात यह है कि कोई राजमहल, मुकुट, तलवार या शिलालेख नहीं मिला जो किसी राजा या सम्राट की मौजूदगी बताए।
शहरों की एकरूपता, मानक ईंटें, एकसमान नालियाँ और अनाज भंडार बताते हैं कि शासन व्यवस्था अत्यंत संगठित और कुशल थी। विद्वान मानते हैं कि नगर-निगम जैसी स्थानीय स्वशासन प्रणाली रही होगी – जहाँ व्यापारी, कारीगर और पुजारी मिलकर निर्णय लेते थे। यह शांतिपूर्ण, सहकारी और जनकेंद्रित प्रशासन था, न कि राजतंत्र या तानाशाही।
समाज, संस्कृति और धर्म
सिन्धु घाटी सभ्यता में कोई भव्य मंदिर नहीं मिला, पर धार्मिक विश्वास गहरे और प्रकृति-केंद्रित थे। हड़प्पा से प्राप्त पकी मिट्टी की अनेक स्त्री मूर्तियाँ हैं। एक मूर्ति में महिला के गर्भ से पौधा निकलता दिखाया गया – विद्वान इसे पृथ्वी माता या उर्वरता देवी की प्रतीक मानते हैं। ठीक वैसे ही जैसे मिस्र में नील नदी की देवी आइसिस की पूजा होती थी। धोलावीरा के दुर्ग में एक गहरा कुआँ मिला, जिसमें सीढ़ियाँ और दीपक जलाने के निशान हैं। उसमें सरस्वती नदी का पानी आता था – संभवतः लोग कुएँ के माध्यम से नदी-देवी की पूजा करते थे।

एक प्रसिद्ध मुद्रा (सील) पर तीन-मुखी योगी का चित्र है, जो पशुओं से घिरा और ध्यानमुद्रा में है। कई विद्वान इसे प्रोटो-शिव (पशुपति) मानते हैं। मेवाड़ (जो कभी सिन्धु क्षेत्र के निकट था) में आज भी चतुर्मुखी एकलिंगनाथ शिव की पूजा होती है। स्वास्तिक चिह्न, हवन-कुण्ड (लोथल, कालीबंगन) और अग्नि-वेदियाँ मिली हैं, जो वैदिक परंपरा से जुड़ाव दर्शाते हैं।
शव संस्कार में दाह-क्रिया प्रचलित थी। मोहनजोदड़ो-हड़प्पा जैसे 50,000 जनसंख्या वाले नगरों में केवल 100 के करीब कब्रें मिलीं – बाकी शव जलाए जाते थे। कुछ विद्वान कहते हैं कि शिव-पूजा द्रविड़ परंपरा थी जिसे बाद में आर्यों ने अपनाया। जैन-बौद्ध विद्वान दावा करते हैं कि यह तपस्या और अहिंसा पर आधारित था, पर मुख्यधारा के इतिहासकार इन दावों को प्रमाणों के अभाव में खारिज करते हैं।
मंदिरों का अभाव आश्चर्यजनक है। मिस्र-मेसोपोटामिया में मंदिरों के ढेर हैं, पर सिन्धु में नहीं। जॉन मार्शल जैसे पुरातत्वविदों का मानना है कि लोग घर, खेत या नदी किनारे पूजा करते थे। महास्नानघर ही एकमात्र संरचना है जिसे पवित्रीकरण स्थल माना जाता है – जैसे आज हिन्दू गंगा-स्नान करते हैं, वैसे ही सैन्धव लोग सामूहिक स्नान से पवित्रता प्राप्त करते थे।
अर्थव्यवस्था और व्यापार
सिन्धु घाटी सभ्यता के लोग व्यापार-केंद्रित अर्थव्यवस्था चलाते थे। खुदाई में मिली मुद्राएँ (सील), मानक बाट-खरे और माप की इकाइयाँ यह सिद्ध करती हैं कि व्यापार उनके जीवन का आधार था। वे पत्थर, धातु, सीपियाँ और शंख का व्यापार करते थे। राजस्थान की खेतड़ी खानें ताँबे के लिए मशहूर थीं, वहीं जावर से चाँदी आती थी। सोना कर्नाटक से आयात होता था। ओमान से ताँबा और गुजरात के रास्ते ईरान-अफगानिस्तान से कीमती पत्थर लाए जाते थे। लोथल जैसे बंदरगाह समुद्री व्यापार के केंद्र थे।
कृषि: उर्वरता का रहस्य
सिन्धु क्षेत्र प्राचीन काल में अत्यधिक उपजाऊ था। सिकन्दर के इतिहासकार ने चौथी शताब्दी ई.पू. में लिखा कि सिन्ध सबसे समृद्ध कृषि क्षेत्रों में गिना जाता था। घने जंगल, भरपूर वर्षा और सिन्धु की वार्षिक बाढ़ मिट्टी को उर्वर बनाती थी। बाढ़ से बचने के लिए गाँवों के चारों ओर पक्की ईंटों की दीवारें बनाई जाती थीं। लोग नवम्बर में बाढ़ वाले मैदानों में बीज बोते और अप्रैल में फसल काट लेते थे – अगली बाढ़ से पहले। कालीबंगन में मिली हल की रेखाएँ बताती हैं कि हल से जुताई होती थी।
| फसलें | विशेषता |
|---|---|
| गेहूँ (दो प्रकार) | मुख्य भोजन |
| जौ (बनावली में उन्नत) | पशुचारा + भोजन |
| राई, मटर, ज्वार | विविधता |
| तिल, सरसों | तेल के लिए |
| कपास | विश्व में सबसे पहले यहीं उगाई गई – यूनानी इसे सिण्डन कहते थे |
पशुपालन
पशुपालन कृषि का पूरक था। लोग गाय, बैल, भैंस, बकरी, भेड़ और सूअर पालते थे – दूध, मांस, खेती और बोझ ढोने के लिए। खुदाई में मिली हड्डियाँ पालतू जानवरों की पुष्टि करती हैं। हाथी और गैंडे का ज्ञान था, पर घोड़े या लोहे का कोई प्रमाण नहीं।
उद्योग-धंधे
नगरों में कुटीर उद्योग फल-फूल रहे थे:
- मिट्टी के बर्तन: काले चित्रों वाले, कुशल कारीगरी।
- कपड़ा बुनाई: सूती वस्त्र निर्यात होते थे।
- आभूषण: मनके, ताबीज, जौहरी कला।
- कोई लोहा नहीं → काँस्य युग।
व्यापार नेटवर्क
आंतरिक: पत्थर, धातु, हड्डी।
बाहरी:
- अफगानिस्तान में उपनिवेश।
- मेसोपोटामिया में हड़प्पाई मुहरें → मेलुहा नाम से व्यापार।
- दिलमुन (बहरीन?) और माकन मध्यस्थ केंद्र।
- चक्का-युक्त वाहन (रथ जैसे)।
सिन्धु लिपि: विश्व की सबसे प्राचीन अनसुलझी पहेली
सिन्धु घाटी सभ्यता की लिपि को छोटे-छोटे चिह्नों के समूह के कारण सिन्धु लिपि या हड़प्पा लिपि कहते हैं। इसे सैंधवी लिपि भी पुकारा जाता है। यह लिपि 2600 ई.पू. से 2000 ई.पू. तक पूर्ण विकसित थी। अब तक इसे पढ़ा नहीं जा सका है – कई दावे हुए, पर कोई पुख्ता प्रमाण नहीं। संबंधित भाषा अज्ञात होने से विश्लेषण में भारी कठिनाई है। इसका सबसे पुराना नमूना 1853 ई. में मिला था। भारत में लेखन कला की शुरुआत 3300 ई.पू. में हुई, और सिन्धु लिपि सबसे प्राचीन थी – उसके बाद ब्राह्मी लिपि का विकास हुआ।
पतन और विरासत
सिन्धु घाटी सभ्यता लगभग 2600 ई.पू. से 1900 ई.पू. तक अपने चरम पर फली-फूली, लेकिन 1900 ई.पू. के बाद धीरे-धीरे पतन शुरू हुआ। अंतिम दौर में शहर सिकुड़ने लगे, लोग पुरानी ईंटें उठाकर मकान बनाते थे, और व्यवस्था कमजोर पड़ने के संकेत मिलते हैं। विद्वान पतन के एक कारण पर सहमत नहीं हैं – बल्कि कई कारकों का संयोजन मानते हैं। नदियों के किनारे बसी सभ्यता होने से वार्षिक बाढ़ स्वाभाविक थी, और कई विद्वान इसे मुख्य कारण मानते हैं। लेकिन केवल बाढ़ से इतनी विशाल सभ्यता का अंत असंभव लगता है। जलवायु परिवर्तन (मानसून कमजोर होना), जंगलों की अंधाधुंध कटाई, मिट्टी का कटाव, नदियों का मार्ग बदलना (घग्गर-हाकरा सूखना), आगजनी (मोहनजोदड़ो में जले घर), और आर्थिक संकट – ये सब धीरे-धीरे सभ्यता को खोखला करते गए। मोहनजोदड़ो में एक कमरे से 14 कंकाल मिले, जो हिंसा या आपदा की ओर इशारा करते हैं, पर शहर की उत्तम नालियाँ महामारी की संभावना कम करती हैं।
मॉर्टिमर व्हीलर ने “आर्य आक्रमण” का सिद्धांत दिया – मोहनजोदड़ो में 26 कंकालों पर तलवार के घाव, हड़प्पा की कब्रगाह H, और ऋग्वेद में “हरियूपिया” को प्रमाण बताया। लेकिन आधुनिक शोध ने इसे खारिज कर दिया। कंकाल पतन के सैकड़ों साल बाद के हैं, मोहनजोदड़ो के पतन और आर्यों के आगमन में 300–400 साल का अंतर है, और ऋग्वेद बहुत बाद में लिखा गया। कोई युद्ध के हथियार, किले या सामूहिक कब्रिस्तान नहीं मिले।
अंत में, सभ्यता अचानक नहीं मिटी – धीरे-धीरे गाँवों में बिखर गई। लोग पूर्वी पंजाब, गंगा घाटी की ओर चले गए। उनकी कपास, माप-तौल, कृषि और शिल्प की परंपराएँ बाद की संस्कृतियों में जीवित रहीं। यह कोई विनाश नहीं, बल्कि एक शांतिपूर्ण परिवर्तन था।
निष्कर्ष
सिन्धु घाटी की सभ्यता मानव प्रगति की एक शानदार मिसाल है, जो हमें बताती है कि प्राचीन काल में भी लोग आधुनिक जीवनशैली जी रहे थे। इसकी खोज ने इतिहास को नई आकृति दी, और आज यह हमारी साझा विरासत है। यदि आप इस सभ्यता के स्थलों का दौरा करें, तो अतीत की झलक अवश्य मिलेगी। अधिक जानने के लिए, संबंधित संग्रहालय और पुस्तकें अवश्य देखें।
स्रोत- विकिपीडिया







